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आर्थिक तंगी से जूझ रहीं थारू महिलाएं
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कोरोना संक्रमण के चलते ठप है हस्तशिल्प कला का कारोबार, कोरोना के चलते दो सालों से प्रभावित है कमाई
पलियाकलां। आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र की हस्तशिल्प कला को कुछ सालों में शिल्प महोत्सवों में अच्छा कारोबार मिला था, लेकिन कोरोना काल में कोई प्रदर्शनी, स्टॉल और महोत्सव जैसे कार्यक्रम न होने के कारण थारू क्षेत्र की महिलाओं को आर्थिक तंगी से जूझना पड़ रहा है।
आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र की महिलाएं हस्तशिल्प कला के तहत बैग, मोबाइल कवर, कैप, पेपर स्टैंड, मैगजीन बैग, वालहैंकग बैग, पायदान, फ्लावर पॉट, चप्पल और रोटी की टोकरी, फूल टोकरी, डलिया, डलवा, हैंडलूम से निर्मित बेडशीट, कुशन हाथ का पंखा, पारंपरिक थारू ड्रेस, इंब्राइडर साड़ी, सूट बार्डर, बंदनवार, सुई धागा व बांस घूघी से हाथ के पंखे, लकड़ी की चौकी और झूला आदि बनाती हैं।
बीते दो सालों से कोरोना काल में इन महिलाओं को काफी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। इन उत्पादों का बाजार न होने के कारण महोत्सव, प्रदर्शनी, मेलों आदि जगहों का आयोजन कोरोना काल में पूरी तरह से बंद है। बताया जाता है कि पहले महोत्सव, मेलों में स्टॉल लगाकर अच्छी कमाई हो जाती थी, लेकिन दो सालों में कमाई प्रभावित हुई है।
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बड़े शहरों में होती थी कमाई, अब सब बंद
आरती राना ने बताया कि कोरोना काल में महोत्सव, प्रदर्शनी व मेलों के आयोजन न होने के कारण उनकी कमाई भी प्रभावित हुई है। लोकल स्तर पर उत्पादों का ज्यादा मांग नहीं है। ऐसे में उनके उत्पाद बाहर ही ज्यादा बेचे जाते हैं।
सहबनिया कहती हैं कि थारू महिलाओं को मुख्यधारा से हस्तशिल्प कला जोड़ती है, लेकिन बेहतर बाजार न होना और कोरोना की वजह से हस्तशिल्प कला का कार्य काफी प्रभावित हुआ है। उत्पादों की बिक्री भी नहीं हो रही है।
किशन कुमारी ने बताया कि वह दरी और गुलदस्ते तो अच्छे बनाती हैं, जिनकी लोग तारीफ भी करते हैं, लेकिन खरीदार थरूहाट में नहीं है। खरीदार बड़े शहरों में रहते हैं, जो गांव नहीं आते हैं। कोरोना काल में महोत्सव व स्टॉल भी नहीं लगे।
पार्वती राणा बताती हैं कि दरी, गमले वगैरह तो बन रहे हैं, लेकिन कोरोना ने काफी प्रभावित किया है। कोरोना काल में बाकी सामान की डिमांड नहीं है। दो साल से मेले-तमाशे बंद हैं। कोई बाजार उपलब्ध न होने से दिक्कतें आ रही हैं।
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पलियाकलां। आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र की हस्तशिल्प कला को कुछ सालों में शिल्प महोत्सवों में अच्छा कारोबार मिला था, लेकिन कोरोना काल में कोई प्रदर्शनी, स्टॉल और महोत्सव जैसे कार्यक्रम न होने के कारण थारू क्षेत्र की महिलाओं को आर्थिक तंगी से जूझना पड़ रहा है।
आदिवासी जनजाति थारू क्षेत्र की महिलाएं हस्तशिल्प कला के तहत बैग, मोबाइल कवर, कैप, पेपर स्टैंड, मैगजीन बैग, वालहैंकग बैग, पायदान, फ्लावर पॉट, चप्पल और रोटी की टोकरी, फूल टोकरी, डलिया, डलवा, हैंडलूम से निर्मित बेडशीट, कुशन हाथ का पंखा, पारंपरिक थारू ड्रेस, इंब्राइडर साड़ी, सूट बार्डर, बंदनवार, सुई धागा व बांस घूघी से हाथ के पंखे, लकड़ी की चौकी और झूला आदि बनाती हैं।
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बीते दो सालों से कोरोना काल में इन महिलाओं को काफी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। इन उत्पादों का बाजार न होने के कारण महोत्सव, प्रदर्शनी, मेलों आदि जगहों का आयोजन कोरोना काल में पूरी तरह से बंद है। बताया जाता है कि पहले महोत्सव, मेलों में स्टॉल लगाकर अच्छी कमाई हो जाती थी, लेकिन दो सालों में कमाई प्रभावित हुई है।
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बड़े शहरों में होती थी कमाई, अब सब बंद
आरती राना ने बताया कि कोरोना काल में महोत्सव, प्रदर्शनी व मेलों के आयोजन न होने के कारण उनकी कमाई भी प्रभावित हुई है। लोकल स्तर पर उत्पादों का ज्यादा मांग नहीं है। ऐसे में उनके उत्पाद बाहर ही ज्यादा बेचे जाते हैं।
सहबनिया कहती हैं कि थारू महिलाओं को मुख्यधारा से हस्तशिल्प कला जोड़ती है, लेकिन बेहतर बाजार न होना और कोरोना की वजह से हस्तशिल्प कला का कार्य काफी प्रभावित हुआ है। उत्पादों की बिक्री भी नहीं हो रही है।
किशन कुमारी ने बताया कि वह दरी और गुलदस्ते तो अच्छे बनाती हैं, जिनकी लोग तारीफ भी करते हैं, लेकिन खरीदार थरूहाट में नहीं है। खरीदार बड़े शहरों में रहते हैं, जो गांव नहीं आते हैं। कोरोना काल में महोत्सव व स्टॉल भी नहीं लगे।
पार्वती राणा बताती हैं कि दरी, गमले वगैरह तो बन रहे हैं, लेकिन कोरोना ने काफी प्रभावित किया है। कोरोना काल में बाकी सामान की डिमांड नहीं है। दो साल से मेले-तमाशे बंद हैं। कोई बाजार उपलब्ध न होने से दिक्कतें आ रही हैं।