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तन झूमत था मन गावत था लेकिन........
विकास शुक्ल लखीमपुर खीरी।
Updated Sun, 05 Jun 2016 11:29 PM IST
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forest
- फोटो : अमर उजाला
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पर्यावरण दिवस पर विशेष :
स्वार्थ और आधुनिकता, आंखों से छीन रही मनमोहक नजारे
हरे भरे पेड़ों की कोमलता, स्वच्छ हवा, शुद्ध पेयजल, पक्षियों की चहचहाहट किसे अच्छी नहीं लगती। इस मनोरम दृश्य से हर किसी का मन प्रफुल्लित हो उठता है। सौभाग्य की बात है कि अपने जिले में अभी पर्याप्त हरियाली है, लेकिन सोचने का वक्त है, अब ऐसे नजारे तमाम शहरों में क्यों दिखाई नहीं देते? ऐसे नजारे मिलें भी कैसे? प्रदूषित जल, सड़ांध फैलाते कूड़ा करकट के ढेर, अस्पतालों और कारखानों से निकलने वाला कचरा, वाहनों से निकलता जहरीला धुआं, पॉलीथिन का बढ़ता इस्तेमाल और लगातार कम होती हरियाली वातावरण में जहर जो घोल रहे है। अगर यूं ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचता रहे तो वह वक्त ज्यादा दूर नहीं है जब सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी न मिलेगी।
ऐसा नहीं कि अपने जिले में पर्यावरण संसाधनों में कोई कमी हो। हां, इतना जरूर है कि इन संसाधनों के रखरखाव में कमी का फायदा हरियाली के दुश्मन उठाते आ रहे हैं। नतीजे में स्वार्थवश पेड़ों पर कुल्हाड़ी की बेरहम धार सितम ढा रही है। आधुनिकता की दौड़ और मुनाफे की बढ़ती ललक से रसायनों का बढ़ता इस्तेमाल पानी और हवा को दूषित कर रहा है। पर्यावरण के दुश्मन नुकसान पहुंचाने का कोई मौका नहीं चूक रहे। जरूरत के मुताबिक पौधारोपण नहीं हो रहा है, जितना हो रहा है उसकी पर्याप्त देखभाल नहीं हो रही। नदियां प्रदूषण से भरी पड़ी हैं। अवैध खनन, पोखरों और तालाबों की देखभाल का अभाव जैसे तमाम पहलू पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कहना गलत न होगा कि पर्यावरण सुरक्षा के प्रयास अपने शहर में नाकाफी हैं। नतीजे में हृदयघात, दमा, एलर्जी, ब्रेन हेमरेज के रोगियों की संख्या बढ़ रही है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर तथाकथित संगठन गोष्ठियों में चर्चाएं करते हैं। बात इससे आगे नहीं बढ़ पाती। यदाकदा पौधारोपड़ अभियान चलते हैं मगर पौधों की देखभाल नहीं हो पाती। जिसकी वजह से सैकड़ों पौधे जवान होने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। विचारणीय सवाल यह है कि क्या इतने ही से पर्यावरण संरक्षण की परिकल्पना साकार हो सकेगी। इस पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण प्रेमियों को महाराष्ट्र के रायगढ़ निवासी भरत मंसाता, असम के जोराहाट निवासी जादव पायेंग और उत्तराखंड के चमोली निवासी नारायण सिंह नेगी सरीखे लोगों का अनुसरण करने का संकल्प लेने की जरूरत है। जिन्होंने सैकड़ों एकड़ में वन संपदा को संरक्षित करने में अपना जीवन लगा दिया है।
एक नजर इधर भी
वाहनों के साइलेंसरों और कारखानों से निकलने वाला धुंआ प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ा मददगार है। डीजल से संचालित होने वाले वाहनों में मानक के अनुरूप कार्बन डाई आक्साइड की अधिकतम मात्रा 65 हार्टिजेड यूनिट होनी चाहिए। पेट्रोल से चलने वाले वाहनों में लेड की मात्रा अधिकतम 3 से 4.5 प्रतिशत तक होना मानक के अंदर माना जाता है। हकीकत के पैमाने पर सैकड़ों वाहन खरे नहीं हैं। जबकि उन्हें प्रदूषण नियंत्रण के प्रमाण पत्र आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
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यह हैं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियम
किसी भी प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाई को आबादी क्षेत्र में चलाने की अनुमति नहीं है। जिस उद्योग-व्यावसाय से खनिज तेल को तेज ताप पर गर्म किया जाता है उस उद्योग को भी आबादी में संचालित नहीं किया जा सकता। नियमों का पालन न करने पर एक लाख का जुर्माना और पांच वर्ष तक कारावास का भी प्रावधान है।
अंकुश बिना संरक्षण महज कोरी कल्पना
कूड़े के ढेर और पॉलिथीन जलाने से वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड, मोनोआक्साइड, मिथेन, सल्फर डाई आक्साइड और नाइट्रोजन जैसी घातक गैसों का उत्सर्जन होता है। यह गैसें सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह हैं। इन पर प्रभावी अंकुश के बिना पर्यावरण संरक्षण महज कोरी कल्पना है।
- डॉ अनिल कुमार, जिला समन्वयक, जिला विज्ञान क्लब।
मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक
मानव जीवन के लिए 10 साल से अधिक उम्र के वृक्ष काफी उपयोगी होते है, उन्हें नहीं काटा जाना चाहिए। वहीं प्रदूषण फैलाने वाली कोई भी इकाई या संयंत्र मानव जीवन के लिए खतरनाक हैं। हानिकारक गैसों का उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाता है। कार्निया, आंखों का अल्सर, सांस की नली में सूजन बढ़ जाती है। स्किन एलर्जी, कैंसर, हृदयघात, दमा, एलर्जी, ब्रेनहेमरेज में भी इजाफा हो रहा है।
- डॉ रविन्द्र नाथ, वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ।
स्वार्थ और आधुनिकता, आंखों से छीन रही मनमोहक नजारे
हरे भरे पेड़ों की कोमलता, स्वच्छ हवा, शुद्ध पेयजल, पक्षियों की चहचहाहट किसे अच्छी नहीं लगती। इस मनोरम दृश्य से हर किसी का मन प्रफुल्लित हो उठता है। सौभाग्य की बात है कि अपने जिले में अभी पर्याप्त हरियाली है, लेकिन सोचने का वक्त है, अब ऐसे नजारे तमाम शहरों में क्यों दिखाई नहीं देते? ऐसे नजारे मिलें भी कैसे? प्रदूषित जल, सड़ांध फैलाते कूड़ा करकट के ढेर, अस्पतालों और कारखानों से निकलने वाला कचरा, वाहनों से निकलता जहरीला धुआं, पॉलीथिन का बढ़ता इस्तेमाल और लगातार कम होती हरियाली वातावरण में जहर जो घोल रहे है। अगर यूं ही पर्यावरण को नुकसान पहुंचता रहे तो वह वक्त ज्यादा दूर नहीं है जब सांस लेने के लिए शुद्ध हवा भी न मिलेगी।
ऐसा नहीं कि अपने जिले में पर्यावरण संसाधनों में कोई कमी हो। हां, इतना जरूर है कि इन संसाधनों के रखरखाव में कमी का फायदा हरियाली के दुश्मन उठाते आ रहे हैं। नतीजे में स्वार्थवश पेड़ों पर कुल्हाड़ी की बेरहम धार सितम ढा रही है। आधुनिकता की दौड़ और मुनाफे की बढ़ती ललक से रसायनों का बढ़ता इस्तेमाल पानी और हवा को दूषित कर रहा है। पर्यावरण के दुश्मन नुकसान पहुंचाने का कोई मौका नहीं चूक रहे। जरूरत के मुताबिक पौधारोपण नहीं हो रहा है, जितना हो रहा है उसकी पर्याप्त देखभाल नहीं हो रही। नदियां प्रदूषण से भरी पड़ी हैं। अवैध खनन, पोखरों और तालाबों की देखभाल का अभाव जैसे तमाम पहलू पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं। कहना गलत न होगा कि पर्यावरण सुरक्षा के प्रयास अपने शहर में नाकाफी हैं। नतीजे में हृदयघात, दमा, एलर्जी, ब्रेन हेमरेज के रोगियों की संख्या बढ़ रही है। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर तथाकथित संगठन गोष्ठियों में चर्चाएं करते हैं। बात इससे आगे नहीं बढ़ पाती। यदाकदा पौधारोपड़ अभियान चलते हैं मगर पौधों की देखभाल नहीं हो पाती। जिसकी वजह से सैकड़ों पौधे जवान होने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। विचारणीय सवाल यह है कि क्या इतने ही से पर्यावरण संरक्षण की परिकल्पना साकार हो सकेगी। इस पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण प्रेमियों को महाराष्ट्र के रायगढ़ निवासी भरत मंसाता, असम के जोराहाट निवासी जादव पायेंग और उत्तराखंड के चमोली निवासी नारायण सिंह नेगी सरीखे लोगों का अनुसरण करने का संकल्प लेने की जरूरत है। जिन्होंने सैकड़ों एकड़ में वन संपदा को संरक्षित करने में अपना जीवन लगा दिया है।
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एक नजर इधर भी
वाहनों के साइलेंसरों और कारखानों से निकलने वाला धुंआ प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ा मददगार है। डीजल से संचालित होने वाले वाहनों में मानक के अनुरूप कार्बन डाई आक्साइड की अधिकतम मात्रा 65 हार्टिजेड यूनिट होनी चाहिए। पेट्रोल से चलने वाले वाहनों में लेड की मात्रा अधिकतम 3 से 4.5 प्रतिशत तक होना मानक के अंदर माना जाता है। हकीकत के पैमाने पर सैकड़ों वाहन खरे नहीं हैं। जबकि उन्हें प्रदूषण नियंत्रण के प्रमाण पत्र आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।
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यह हैं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियम
किसी भी प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाई को आबादी क्षेत्र में चलाने की अनुमति नहीं है। जिस उद्योग-व्यावसाय से खनिज तेल को तेज ताप पर गर्म किया जाता है उस उद्योग को भी आबादी में संचालित नहीं किया जा सकता। नियमों का पालन न करने पर एक लाख का जुर्माना और पांच वर्ष तक कारावास का भी प्रावधान है।
अंकुश बिना संरक्षण महज कोरी कल्पना
कूड़े के ढेर और पॉलिथीन जलाने से वातावरण में कार्बन डाई आक्साइड, मोनोआक्साइड, मिथेन, सल्फर डाई आक्साइड और नाइट्रोजन जैसी घातक गैसों का उत्सर्जन होता है। यह गैसें सेहत के लिए बेहद नुकसानदेह हैं। इन पर प्रभावी अंकुश के बिना पर्यावरण संरक्षण महज कोरी कल्पना है।
- डॉ अनिल कुमार, जिला समन्वयक, जिला विज्ञान क्लब।
मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक
मानव जीवन के लिए 10 साल से अधिक उम्र के वृक्ष काफी उपयोगी होते है, उन्हें नहीं काटा जाना चाहिए। वहीं प्रदूषण फैलाने वाली कोई भी इकाई या संयंत्र मानव जीवन के लिए खतरनाक हैं। हानिकारक गैसों का उत्सर्जन ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाता है। कार्निया, आंखों का अल्सर, सांस की नली में सूजन बढ़ जाती है। स्किन एलर्जी, कैंसर, हृदयघात, दमा, एलर्जी, ब्रेनहेमरेज में भी इजाफा हो रहा है।
- डॉ रविन्द्र नाथ, वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ।