{"_id":"670c2713bf2869165600e8d4","slug":"shops-will-be-opened-only-after-receipt-from-the-municipality-lakhimpur-news-c-120-1-lkh1002-131087-2024-10-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"Lakhimpur Kheri News: नगरपालिका से रसीद कटवाने के बाद ही लगेंगी दुकानें","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Lakhimpur Kheri News: नगरपालिका से रसीद कटवाने के बाद ही लगेंगी दुकानें
विज्ञापन
लखीमपुर खीरी। डेढ़ सौ साल पुराने रामलीला मेले पर संकट के बादल कुछ हद तक हट गए हैं। रविवार को जिला प्रशासन की मौजूदगी में सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट के सरवराकार और नगर पालिका के ईओ, चेयरमैन के बीच घंटों वार्ता हुई। दुकानदार भी मौजूद रहे। तय हुआ कि कोर्ट का फैसला आने तक दुकानदार कुछ धनराशि नगर पालिका में जमाकर दुकानें लगा सकते हैं।
हर बार दशहरे से पहले नगर पालिका की ओर से रसीदें कटवाने के बाद दुकानें लगाई जाती थीं। इस बार रामलीला मेला कराने और दुकानों का आवंटन कराने को लेकर सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट और नगर पालिका के बीच रार छिड़ गई। मामला इतना बढ़ा कि नगर पालिका ने मेला कराने से ही मना कर दिया। इस पर दुकानदारों ने ट्रस्ट के सरवराकार से संपर्क साधा और रसीदें कटवाईं।
ट्रस्ट की ओर से करीब 90 प्रतिशत दुकानदारों ने रसीदें भी कटवा लीं, लेकिन दुकानदार जब दुकानें लगाने पहुंचे तो नगर पालिका ने विरोध किया। अभी तक मैदान में एक भी दुकान नहीं लग पाई है। रविवार की सुबह जिला प्रशासन और नगर पालिका की टीम मेला मैदान पहुंची तो वहां पर ट्रस्ट के सरवराकार विपुल सेठ से तीखी नोंकझोंक हुई।
विज्ञापन
कई घंटे वार्ता का दौर चलता रहा, लेकिन दोनों पक्ष किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच सके। दुकानों का आवंटन न होने से दुकानदार परेशान दिखाई दिए। नगर पालिका के ईओ संजय कुमार और पालिका अध्यक्ष डाॅ. इरा श्रीवास्तव ने यह स्पष्ट कह दिया कि नगर पालिका इतने सालों से मेला कराती आई है, इस बार भी नगर पालिका ही कराएगी।
जो दुकानदार नगर पालिका से रसीदें कटवाएगा, उसी को दुकान लगाने की अनुमति दी जाएगी। इधर ट्रस्ट के सरवराकार विपुल सेठ ने नाराजगी जताते हुए जिला प्रशासन और नगर पालिका पर दबाव बनाकर मेले का नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मामले में 16 अक्टूबर को कोर्ट का फैसला आना है। फैसला पक्ष में न आने पर काटी गई रसीदों का भुगतान वापस कर दिया जाएगा।
फिलहाल देर शाम दोनों पक्षों ने दुकानदारों को इस शर्त पर मना लिया कि वे कुछ धनराशि जमा करके अपनी दुकानें लगा सकते हैं। बाकी कोर्ट के फैसले के बाद निर्णय लिया जाएगा।
जनता का सवाल... जब घाटे में मेला, तो पालिका छोड़ क्यों नहीं देती नियंत्रण
नगर पालिका के अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक मेले के आयोजन में लाखों रुपये खर्च होने की बात कहते हैं। अधिकारियों के अनुसार, मेले में आने वाली धनराशि खर्च होने वाली धनराशि से काफी कम होती है। लिहाजा घाटे में मेला संपन्न कराया जाता है। अब जनता भी सवाल उठाने लगी है। लोगों का कहना है कि जब मेला घाटे में होता है तो नगर पालिका मेले से अपना नियंत्रण छोड़ क्यों नहीं देती।
अगर कुछ हुआ तो नगर पालिका और प्रशासन होगा जिम्मेदार
ट्रस्ट के सरवराकार विपुल सेठ ने बताया कि प्रशासन दबाव बनाकर मेले का नियंत्रण नगर पालिका के हाथों में देना चाहता है। बेवजह बनाए जा रहे दबाव से वह काफी क्षुब्ध हैं। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कुछ हुआ तो इसका जिम्मेदार जिला प्रशासन और नगर पालिका होगी। फिलहाल इस बयान को लेकर लोग तरह तरह की चर्चाएं कर रहे हैं।
विज्ञापन
हर बार दशहरे से पहले नगर पालिका की ओर से रसीदें कटवाने के बाद दुकानें लगाई जाती थीं। इस बार रामलीला मेला कराने और दुकानों का आवंटन कराने को लेकर सेठ गया प्रसाद ट्रस्ट और नगर पालिका के बीच रार छिड़ गई। मामला इतना बढ़ा कि नगर पालिका ने मेला कराने से ही मना कर दिया। इस पर दुकानदारों ने ट्रस्ट के सरवराकार से संपर्क साधा और रसीदें कटवाईं।
विज्ञापन
ट्रस्ट की ओर से करीब 90 प्रतिशत दुकानदारों ने रसीदें भी कटवा लीं, लेकिन दुकानदार जब दुकानें लगाने पहुंचे तो नगर पालिका ने विरोध किया। अभी तक मैदान में एक भी दुकान नहीं लग पाई है। रविवार की सुबह जिला प्रशासन और नगर पालिका की टीम मेला मैदान पहुंची तो वहां पर ट्रस्ट के सरवराकार विपुल सेठ से तीखी नोंकझोंक हुई।
विज्ञापन
कई घंटे वार्ता का दौर चलता रहा, लेकिन दोनों पक्ष किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच सके। दुकानों का आवंटन न होने से दुकानदार परेशान दिखाई दिए। नगर पालिका के ईओ संजय कुमार और पालिका अध्यक्ष डाॅ. इरा श्रीवास्तव ने यह स्पष्ट कह दिया कि नगर पालिका इतने सालों से मेला कराती आई है, इस बार भी नगर पालिका ही कराएगी।
जो दुकानदार नगर पालिका से रसीदें कटवाएगा, उसी को दुकान लगाने की अनुमति दी जाएगी। इधर ट्रस्ट के सरवराकार विपुल सेठ ने नाराजगी जताते हुए जिला प्रशासन और नगर पालिका पर दबाव बनाकर मेले का नियंत्रण अपने हाथ में लेने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि मामले में 16 अक्टूबर को कोर्ट का फैसला आना है। फैसला पक्ष में न आने पर काटी गई रसीदों का भुगतान वापस कर दिया जाएगा।
फिलहाल देर शाम दोनों पक्षों ने दुकानदारों को इस शर्त पर मना लिया कि वे कुछ धनराशि जमा करके अपनी दुकानें लगा सकते हैं। बाकी कोर्ट के फैसले के बाद निर्णय लिया जाएगा।
जनता का सवाल... जब घाटे में मेला, तो पालिका छोड़ क्यों नहीं देती नियंत्रण
नगर पालिका के अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक मेले के आयोजन में लाखों रुपये खर्च होने की बात कहते हैं। अधिकारियों के अनुसार, मेले में आने वाली धनराशि खर्च होने वाली धनराशि से काफी कम होती है। लिहाजा घाटे में मेला संपन्न कराया जाता है। अब जनता भी सवाल उठाने लगी है। लोगों का कहना है कि जब मेला घाटे में होता है तो नगर पालिका मेले से अपना नियंत्रण छोड़ क्यों नहीं देती।
अगर कुछ हुआ तो नगर पालिका और प्रशासन होगा जिम्मेदार
ट्रस्ट के सरवराकार विपुल सेठ ने बताया कि प्रशासन दबाव बनाकर मेले का नियंत्रण नगर पालिका के हाथों में देना चाहता है। बेवजह बनाए जा रहे दबाव से वह काफी क्षुब्ध हैं। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि अगर उन्हें कुछ हुआ तो इसका जिम्मेदार जिला प्रशासन और नगर पालिका होगी। फिलहाल इस बयान को लेकर लोग तरह तरह की चर्चाएं कर रहे हैं।