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Lakhimpur Kheri News: इतिहास के पन्नों में खोजी जा रही जंगली जल भैंसों की वापसी की राह

Sun, 10 May 2026 11:47 PM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Updated Sun, 10 May 2026 11:47 PM IST
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Searching the pages of history for the return of wild water buffalo
असम के जंगल में विचरण करती जंगली जलभैंस। स्रोत : वन विभाग
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लखीमपुर खीरी/बांकेगंज।
दुधवा टाइगर रिजर्व (डीटीआर) में जंगली जल भैंसों के पुनर्वासन के लिए इनके इतिहास को भी खंगाला जा रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि कभी दुधवा का जंगल जल भैंसों का पसंदीदा प्राकृतवास था, जिससे यहां इनके पुनर्वासन को बल मिला है।

जंगली जल भैंसों और एक सींग वाले गैंडों का प्राकृतवास एक जैसा होता है। आमतौर पर जहां गैंडे बहुतायत में पाए जाते हैं, वहां जल भैंसों का भी आस्तित्व मिलता है। यह अधिकांश समय पानी में रहते हैं, लेकिन नम भूमि में भी विचरण करते देखे जाते हैं। यह वही वनस्पतियां खाते हैं, जो गैंडे पसंद करते हैं। अध्ययन में यह पाया गया है कि दुधवा में इनके लिए अनुकूल सुरक्षित प्राकृतवास और पर्याप्त मात्रा में भोजन उपलब्ध है।
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डीटीआर में जंगली जल भैंसों की मौजूदगी के कोई दस्तावेज या प्रमाण नहीं हैं, लेकिन बताया जाता है कि 18 व 19वीं शताब्दी में नेपाल सीमा से सटे भारतीय जंगलों में जल भैंसें बड़ी संख्या में पाई जाती थीं, जो कि शिकार और पालतू भैंसों के संपर्क में आने से धीरे-धीरे इनकी संख्या कम हो गई। जो बचीं, वह स्थानीय भैंसों के संपर्क में आकर दुधारू भैंसों में बदल गईं। संवाद
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दक्षिण सोनारीपुर रेंज में मिला सबसे अनुकूल प्राकृतवास
पिछले दिनों भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून की दो सदस्यीय टीम ने दुधवा में दो दिन रुककर जल भैंसों के लिए अनुकूल प्राकृतवास, सुरक्षा और भोजन संबंधित संभावनाओं का जो जायजा लिया था। उनके अनुसार, दक्षिण सोनारीपुर रेंज जल भैंसों के लिए सबसे अनुकूल प्राकृतवास पाया गया।
दुधवा टाइगर रिजर्व के एफडी डॉ. एच राजामोहन के अनुसार पहले चरण में तीन मादा और एक नर जल भैंस लाने की योजना है। इन्हें सौर ऊर्जा चालित बाड़े में रखा जाएगा। इनकी सुरक्षा के लिए फील्ड स्टाफ की कमी नहीं है। सभी निर्णय केंद्रीय पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन मंत्रालय को लेना है। यह निर्णय आने में छह माह से एक साल का समय लग सकता है। पुनर्वासन योजना की सफलता के बाद अन्य और जल भैंसों को लाने की योजना पर विचार किया जा सकता है।

पुराणों के अनुसार जल भैंस से जन्मा था महिषासुर

पुराणों के जानकार और छोटी काशी गोला के ज्योतिषी पं. रामदेव मिश्र शास्त्री का कहना है कि जल भैंस का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर का पिता रंभ असुरों का प्रमुख था। जो किसी जंगली जल भैंस से प्रेम कर बैठा और इससे महिषासुर का जन्म हुआ। महिषासुर दो शब्दों से बना है एक महिष यानी भैंस और दूसरा असुर। जिसका वध मां दुर्गा ने किया था।



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जंगली जलभैंसों के पुनर्वासन के लिए अध्ययन का काम पूरा हो चुका है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से हरी झंडी मिलते ही जल भैंसों को असम काजीरंगा व मानस वन्यजीव अभयारण्य से लाकर यहां बसाया जाएगा।

- डॉ. एच राजामोहन, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व
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