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नोटबंदी से आलू उत्पादक किसान संकट में
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
Updated Sat, 17 Dec 2016 11:14 PM IST
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farmar
- फोटो : amar ujala
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- करेंसी की किचकिच के चलते बो नहीं पाए आलू
- खेतों में सड़ गया कीमती बीज, रकबा घटा
नोटबंदी का असर उद्योग और व्यापार से ज्यादा खेती-किसानी पर पड़ा है। आलू की फसल की बुवाई के समय नोटबंदी हो जाने से किसान आलू की बुवाई नहीं कर पाए। बीज के लिए खरीदकर रखा गया आलू खेतों और घरों में सड़कर बर्बाद हो गया। इसके साथ ही आलू उत्पादक किसानों के अरमानों पर पानी फिर गया।
नोटबंदी ऐसे समय हुई जब आलू बुवाई का सीजन शुरू हुआ। बांकेगंज क्षेत्र के अधिकांश किसान बीज के लिए कोल्ड स्टोरेज से आलू खरीद चुके थे। इसी बीच नोटबंदी के बाद शुरू हुई कैश की क्राइसेस के चलते किसान आलू को बुवाई नहीं कर पाए। न उनके पास खेत की तैयारी को पैसे थे न मजदूरों को मजदूरी देने के पैसे। ऐसे मेें जैसे-तैसे थोड़ी आलू की बुवाई कर पाए वो कर दी। बाकी कैश का इंतजाम न हो पाने से आधे से ज्यादा मंहगे दामों में खरीदा गया बीज खेतों और घरों में पड़ा-पड़ा सड़ गया। इससे इस बार इलाके में रकबा भी घट गया।
क्या कहते है बांकेगंज क्षेत्र के आलू उत्पादक किसान
बांकेगंज। खैरताली गांव निवासी आलू उत्पादक किसान मनोज कुमार का कहना है कि आलू की खेती वैसे भी जोखिम भरी होती है। नोटबंदी के बाद आलू बुवाई ठप हो गई। नोटबंदी ने किसानों की कमर तोड़ दी है। कैश की कमी से सारी तैयारियों के बाद भी एक बीघा आलू बुवाई नहीं कर पाए।
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नोटबंदी ने घटाया रकबा
किसान देवा सिंह का कहना है कि एक एकड़ आलू बुवाई में लगभग पैंतीस हजार रुपये का खर्च आता है। मौसम अनुकूल होने पर लगभग 150 कुंटल आलू फसल का उत्पादन होता है। नोटबंदी के चलते सारी तैयारियों के बाद भी पांच एकड़ बुवाई नहीं कर पाए। इससे क्षेत्र में आधे से अधिक आलू बुवाई का रकबा घट गया।
नोटबंदी के बाद घरों में पड़ा सड़ गया आलू बीज
किसान अनवर अली का कहना है कि वह हर साल लगभग 12 एकड़ आलू फसल कर बुवाई करता था। इससे पहले उसने रकबा के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज से बीज खरीद लिया। बुवाई शुरू होने से पहले ही नोटबंदी हो गयी। बुवाई के लिए कैश का इंतजाम न होने से घर में रखा बीज सड़ गया।
नोटबंदी से किसानों का बेड़ा गर्क हुआ
किसान वीरेन्द्र सिंह का कहना है कि नोटबंदी ने आलू उत्पादक किसानों का बेड़ा गर्क कर दिया। ऐन बुवाई के समय हुई नोटबंदी से किसानों के हाथ खाली हो गए। कैश की कमी से किसान द्वारा जमा पूंजी से खरीद कर लाए गए मंहगे बीज की खेतों में बुवाई नहीं हो पाई। इससे उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ी।
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- खेतों में सड़ गया कीमती बीज, रकबा घटा
नोटबंदी का असर उद्योग और व्यापार से ज्यादा खेती-किसानी पर पड़ा है। आलू की फसल की बुवाई के समय नोटबंदी हो जाने से किसान आलू की बुवाई नहीं कर पाए। बीज के लिए खरीदकर रखा गया आलू खेतों और घरों में सड़कर बर्बाद हो गया। इसके साथ ही आलू उत्पादक किसानों के अरमानों पर पानी फिर गया।
नोटबंदी ऐसे समय हुई जब आलू बुवाई का सीजन शुरू हुआ। बांकेगंज क्षेत्र के अधिकांश किसान बीज के लिए कोल्ड स्टोरेज से आलू खरीद चुके थे। इसी बीच नोटबंदी के बाद शुरू हुई कैश की क्राइसेस के चलते किसान आलू को बुवाई नहीं कर पाए। न उनके पास खेत की तैयारी को पैसे थे न मजदूरों को मजदूरी देने के पैसे। ऐसे मेें जैसे-तैसे थोड़ी आलू की बुवाई कर पाए वो कर दी। बाकी कैश का इंतजाम न हो पाने से आधे से ज्यादा मंहगे दामों में खरीदा गया बीज खेतों और घरों में पड़ा-पड़ा सड़ गया। इससे इस बार इलाके में रकबा भी घट गया।
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क्या कहते है बांकेगंज क्षेत्र के आलू उत्पादक किसान
बांकेगंज। खैरताली गांव निवासी आलू उत्पादक किसान मनोज कुमार का कहना है कि आलू की खेती वैसे भी जोखिम भरी होती है। नोटबंदी के बाद आलू बुवाई ठप हो गई। नोटबंदी ने किसानों की कमर तोड़ दी है। कैश की कमी से सारी तैयारियों के बाद भी एक बीघा आलू बुवाई नहीं कर पाए।
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नोटबंदी ने घटाया रकबा
किसान देवा सिंह का कहना है कि एक एकड़ आलू बुवाई में लगभग पैंतीस हजार रुपये का खर्च आता है। मौसम अनुकूल होने पर लगभग 150 कुंटल आलू फसल का उत्पादन होता है। नोटबंदी के चलते सारी तैयारियों के बाद भी पांच एकड़ बुवाई नहीं कर पाए। इससे क्षेत्र में आधे से अधिक आलू बुवाई का रकबा घट गया।
नोटबंदी के बाद घरों में पड़ा सड़ गया आलू बीज
किसान अनवर अली का कहना है कि वह हर साल लगभग 12 एकड़ आलू फसल कर बुवाई करता था। इससे पहले उसने रकबा के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज से बीज खरीद लिया। बुवाई शुरू होने से पहले ही नोटबंदी हो गयी। बुवाई के लिए कैश का इंतजाम न होने से घर में रखा बीज सड़ गया।
नोटबंदी से किसानों का बेड़ा गर्क हुआ
किसान वीरेन्द्र सिंह का कहना है कि नोटबंदी ने आलू उत्पादक किसानों का बेड़ा गर्क कर दिया। ऐन बुवाई के समय हुई नोटबंदी से किसानों के हाथ खाली हो गए। कैश की कमी से किसान द्वारा जमा पूंजी से खरीद कर लाए गए मंहगे बीज की खेतों में बुवाई नहीं हो पाई। इससे उन्हें दोहरी मार झेलनी पड़ी।