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कोरोना: ‘महायुद्ध’ सा बीता साल... विजयश्री मिलेगी नए साल
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new year
लखीमपुर खीरी। वर्ष-2020 हर किसी के लिए बेहद संकट भरा रहा। सेहत से लेकर सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर तक हालात विचलित करने वाले रहे। हर किसी के मन में ‘महायुद्ध’ सा चलता रहा, हालांकि, बीतते साल के आखिर में कोरोना वैक्सीन आने की खबरों ने आने वाले साल में कोरोना से महायुद्ध पर विजयश्री की उम्मीद जरूर जगाई।
इस साल दिहाड़ी मजदूर से लेकर बड़े बड़े कारोबारी तक तीन माह के लिए घरों मेें कैद रहने को मजबूर हो गए। इस दौरान तमाम दुश्वारियों के बीच भी एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता और मानवता देखने को मिली। लोगों ने एक दूसरे का दर्द समझा और अपनी अपनी क्षमता अनुसार जरूरतमंदों की मदद भी की। कोरोना काल में लॉकडाउन और क्वारंटीन क्या होता है, लोग इसका नाम जानने के साथ इसके मायने तक जान गए। कुल मिलाकर यह साल बहुत कुछ खोने वाला तो कुछ पाने वाला भी साबित हुआ।
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कोरोना काल में स्कूल, कॉलेज बंद रहे। परीक्षाएं तक ठप हो र्गइं। तमाम युवाओं के सपनों पर भी ग्रहण लग गया। कोरोना ने तो पढ़ाई को चौपट ही करके रख दिया। हालांकि इस दौरान इसने ऑन लाइन क्लॉस और परीक्षा का नया अवसर भी दिया, जिससे पढ़ाई रुचिकर हुई। यह साल छात्रों और शिक्षकों को एक नया विकल्प देने वाला रहा।
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- डॉ. आरके जायसवाल, सेवानिवृत्त डीआईओएस
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कोरोना महामारी बनकर आया। इसने हर वर्ग को प्रभावित किया। मगर, इस दौरान बहुत कुछ नया जानने और सीखने का भी मौका मिला। इस बीच जो एक अच्छी चीज देखने को मिली, वह थी मानवता। लोगों ने एक दूसरे के दर्द को समझा। समाजसेवी से लेकर युवा तक पलायन करने वालों की सेवा करने में लगे रहे। इससे समाज का मजबूती मिली।
-डॉ. देवकी नंदन मालपानी, प्राचार्य वाईडी कॉलेज
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कोरोना आया तो था महामारी बनकर। इससे बचने के लिए तीन माह तक लॉकडाउन रहा। इस दौरान हर वर्ग को दिक्कत उठानी पड़ी। मगर, यह समय एक नया अनुभव भी देकर गया। लोगों को बहुत कुछ नया सीखने का मौका मिला। इससे लोगों की लाइफ स्टाइल तक बदल गया। आने वाले दिनों में इसके बेहतर परिणाम मिलेंगे।
-लेखनी सेठ प्रधानाचार्य सीएमएस
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लॉकडाउन की याद आते ही सड़कों पर पलायन करने वालों की भीड़ दिखने लगती है। वहीं कोरोना काल में जन्मा वर्क फ्रॉम होम, ऑन लाइन क्लास, वर्चुअल बैठक आदि हमारी आवश्यकता बन गए। कोरोना ने हम भारतीयों को पुरुषार्थ, आत्म सम्मान, मेधा सहित उन क्षमताओं की याद दिला दी, जिन्हें हम लगभग भूल ही चुके थे।
-आशीष अवस्थी अनल कवि
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वैसे तो कोरोना ने बहुत कुछ उठा पटक मचाते हुए काफी कुछ चौपट किया पर कोरोना काल में हमें बहुत कुछ सीखने को भी मिला। इस दौरान जरूरी कामों के लिए वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल बैठक आदि का जो विकल्प मिला इसकी शायद किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी। इससे आने वाले दिनों में बहुत कुछ आसान होगा।
-सुरचना त्रिवेदी प्राचार्य आर्य कन्या डिग्री कॉलेज
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कोरोना काल हर किसी के लिए एक परीक्षा की घड़ी था। संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन रहा। इस दौरान लोग घर में रहे। आपदा की इस घड़ी में जब हर कोई अनजाने खतरे से डरा सहमा था। तब कई ऐसे लोग थे, जिन्होंने अपनी परवाह न कर जरूरतमंदों के साथ संक्रमितों की सेवा की। लोगों ने भी कोरोना योद्धाओं के प्रति सहानुभूति दिखाई दी। बीतते साल में वैक्सीन की उम्मीदें नए साल को जरूर नए पंख देंगी।
-डॉ. रविंद्र शर्मा एसीएमओ
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कोरोना काल काल ने जिला क्या पूरे देश की व्यापारिक स्थिति चौपट कर दी थी। करीब तीन महीने लंबे चले लॉकडाउन में व्यापार बिल्कुल शून्य पर आ गया था। हमारे स्टाफ की कौतुहल भरी नजरें भी हम पर थीं, कि आगे क्या होगा। एक अजब सी शून्यता के दौर में थे हम सब। धीरे-धीरे संकट के बादल छंटे, अनलॉक होना शुरू हुआ और कुछ महीने बीतने के बाद दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार आए, जिनसे पूरे जिले का व्यापार दोबारा पटरी पर लौटना शुरू हुआ, लेकिन व्यापारियों की स्थिति अब भी नाजुक है। पूरे स्टाफ के साथ आत्मीयता और अपनेपन के रिश्ते की वजह से हमारी प्रेरणा कहीं से कमजोर नहीं हुई और हम मिलकर आगे बढ़ते रहे। सही मायनों में व्यापार की नींव भरोसे पर टिकी होती है, उसमें हम कहीं कमजोर नहीं पड़े। पारिवारिक व्यापारिक पृष्ठभूमि होने के नाते हम मुश्किल दौर से निपटने में सक्षम रहे। इस दौरान अपनी जड़ें कितनी मजबूत होनी चाहिए, यह बात भी मालूम हुई। बीता साल व्यापारिक दृष्टि से नाजुक तो रहा, लेकिन उम्मीद है कि 2021 में हम व्यापारी जरूर नुकसान की भरपाई कर लेंगे।
-प्रेम शंकर अग्रवाल, समाजसेवी एवं कारोबारी
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वकालत के लिहाज से यह साल काफी उठा-पटक वाला रहा। हर तबके के साथ साथ वकीलों की भी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई। हालांकि, लंबे वक्त तक लॉकडाउन और उसके बाद धीरे धीरे अनलॉक के क्रम में देश के कई राज्यों में न्याय का नया दौर चला और मुकदमों की डिजिटल सुनवाई शुरू हुई, जो कि वाकई में एक महत्वपूर्ण और सार्थक पहल है। अपने लखीमपुर कोर्ट में भी अच्छा काम हुआ कि कोर्ट में नई डिजिटल प्रणाली शुरू हो गई। लखीमपुर सिविल कोर्ट में बहुत सी चीजों को डिजिटलाइज किया गया। मुकदमा दायर करने पर मोबाइल पर मेसेज आ जाता था कि फलां का मुकदमा इस तारीख को लगा। जब तारीख आई तो उसकी भी सूचना मिल गई। मुश्किल वक्त के दौरान डिजिटल व्यवस्था ने वाकई एक नई उम्मीद दी है, जो आने वाले नए साल में और भी परवान चढ़ेगी।
-केवल कृष्ण, एडवोकेट
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कोरोना से लड़ाई में पर्यावरण की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है, यह इस साल लगभग हर आम और खास ने समझ लिया होगा। इस साल सबने देखा कि लॉकडाउन के दौरान यातायात थमने से ऐसा लगा कि प्रकृति ने जैसे नया जन्म ले लिया हो। दूर दूर तक साफ हवा और आसमान के अलावा पक्षियों के कलरव ने हमें वापस अपनी नीड़ की ओर देखने और सोचने को विवश किया। वैसे भी जनपद का काफी भू-भाग तराई क्षेत्र में आता है, जिसमें दुधवा नेशनल पार्क भी है। जंगल क्षेत्र होने के कारण जनपद की जलवायु महानगरों की अपेक्षाकृत काफी बेहतर है, जनपद की नदियां और पर्यावरण इसे प्राकृतिक रूप से भरपूर धनवान बनाते हैं। यदि हम लॉकडाउन की तरह हमेशा से ही अपने आप को कुछ दिनों के लिए संभाल लें और पर्यावरण का ख्याल रख सकें, तो उम्मीद है कि नए साल का सूरज और बेहतर चमकेगा।
-डॉ वीपी सिंह, पर्यावरणविद
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इस साल कोरोना ने लोगों को योग ओर आयुर्वेद की उपयोगिता का एहसास करा दिया। एलोपैथ के आगे लोग प्राचीन चिकित्सा पद्धति को भूल ही गए थे। मगर, कोरोना ने लोगों को बता दिया कि आयुर्वेद एवं योग ही हर बीमारी से लड़ने और उससे निजात दिलाने में सहायक है। कोरोना काल में रोग प्रतिरोधक क्षमता क्या होती है, यह भी लोगों ने जाना। गिलोय, तुलसी, अदरक समेत घरेलू मसालों के जरिये कैसे प्रतिरोधक क्षमता मजबूत की जा सकती है, इस ओर भी लोगों का ध्यान गया। सूर्य नमस्कार, ताड़ासन, तिर्यक ताड़ासन जैसे योग के आसनों के साथ साथ प्राणायाम जैसे महत्वपूर्ण श्वांस के व्यायाम पर लोगों की नजरें रहीं। कोरोना काल ने जहां हमें काफी मुश्किलें दीं तो हमें अपने स्व की ओर लौटना भी सिखाया, उम्मीद है कि आने वाले साल में हमारा यह स्व और विस्तार पाएगा।
-प्रिंस रंजन बरनवाल, योग प्रशिक्षक
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इस साल दिहाड़ी मजदूर से लेकर बड़े बड़े कारोबारी तक तीन माह के लिए घरों मेें कैद रहने को मजबूर हो गए। इस दौरान तमाम दुश्वारियों के बीच भी एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता और मानवता देखने को मिली। लोगों ने एक दूसरे का दर्द समझा और अपनी अपनी क्षमता अनुसार जरूरतमंदों की मदद भी की। कोरोना काल में लॉकडाउन और क्वारंटीन क्या होता है, लोग इसका नाम जानने के साथ इसके मायने तक जान गए। कुल मिलाकर यह साल बहुत कुछ खोने वाला तो कुछ पाने वाला भी साबित हुआ।
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कोरोना काल में स्कूल, कॉलेज बंद रहे। परीक्षाएं तक ठप हो र्गइं। तमाम युवाओं के सपनों पर भी ग्रहण लग गया। कोरोना ने तो पढ़ाई को चौपट ही करके रख दिया। हालांकि इस दौरान इसने ऑन लाइन क्लॉस और परीक्षा का नया अवसर भी दिया, जिससे पढ़ाई रुचिकर हुई। यह साल छात्रों और शिक्षकों को एक नया विकल्प देने वाला रहा।
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- डॉ. आरके जायसवाल, सेवानिवृत्त डीआईओएस
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कोरोना महामारी बनकर आया। इसने हर वर्ग को प्रभावित किया। मगर, इस दौरान बहुत कुछ नया जानने और सीखने का भी मौका मिला। इस बीच जो एक अच्छी चीज देखने को मिली, वह थी मानवता। लोगों ने एक दूसरे के दर्द को समझा। समाजसेवी से लेकर युवा तक पलायन करने वालों की सेवा करने में लगे रहे। इससे समाज का मजबूती मिली।
-डॉ. देवकी नंदन मालपानी, प्राचार्य वाईडी कॉलेज
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कोरोना आया तो था महामारी बनकर। इससे बचने के लिए तीन माह तक लॉकडाउन रहा। इस दौरान हर वर्ग को दिक्कत उठानी पड़ी। मगर, यह समय एक नया अनुभव भी देकर गया। लोगों को बहुत कुछ नया सीखने का मौका मिला। इससे लोगों की लाइफ स्टाइल तक बदल गया। आने वाले दिनों में इसके बेहतर परिणाम मिलेंगे।
-लेखनी सेठ प्रधानाचार्य सीएमएस
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लॉकडाउन की याद आते ही सड़कों पर पलायन करने वालों की भीड़ दिखने लगती है। वहीं कोरोना काल में जन्मा वर्क फ्रॉम होम, ऑन लाइन क्लास, वर्चुअल बैठक आदि हमारी आवश्यकता बन गए। कोरोना ने हम भारतीयों को पुरुषार्थ, आत्म सम्मान, मेधा सहित उन क्षमताओं की याद दिला दी, जिन्हें हम लगभग भूल ही चुके थे।
-आशीष अवस्थी अनल कवि
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वैसे तो कोरोना ने बहुत कुछ उठा पटक मचाते हुए काफी कुछ चौपट किया पर कोरोना काल में हमें बहुत कुछ सीखने को भी मिला। इस दौरान जरूरी कामों के लिए वर्क फ्रॉम होम, वर्चुअल बैठक आदि का जो विकल्प मिला इसकी शायद किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी। इससे आने वाले दिनों में बहुत कुछ आसान होगा।
-सुरचना त्रिवेदी प्राचार्य आर्य कन्या डिग्री कॉलेज
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कोरोना काल हर किसी के लिए एक परीक्षा की घड़ी था। संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन रहा। इस दौरान लोग घर में रहे। आपदा की इस घड़ी में जब हर कोई अनजाने खतरे से डरा सहमा था। तब कई ऐसे लोग थे, जिन्होंने अपनी परवाह न कर जरूरतमंदों के साथ संक्रमितों की सेवा की। लोगों ने भी कोरोना योद्धाओं के प्रति सहानुभूति दिखाई दी। बीतते साल में वैक्सीन की उम्मीदें नए साल को जरूर नए पंख देंगी।
-डॉ. रविंद्र शर्मा एसीएमओ
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कोरोना काल काल ने जिला क्या पूरे देश की व्यापारिक स्थिति चौपट कर दी थी। करीब तीन महीने लंबे चले लॉकडाउन में व्यापार बिल्कुल शून्य पर आ गया था। हमारे स्टाफ की कौतुहल भरी नजरें भी हम पर थीं, कि आगे क्या होगा। एक अजब सी शून्यता के दौर में थे हम सब। धीरे-धीरे संकट के बादल छंटे, अनलॉक होना शुरू हुआ और कुछ महीने बीतने के बाद दशहरा और दिवाली जैसे त्योहार आए, जिनसे पूरे जिले का व्यापार दोबारा पटरी पर लौटना शुरू हुआ, लेकिन व्यापारियों की स्थिति अब भी नाजुक है। पूरे स्टाफ के साथ आत्मीयता और अपनेपन के रिश्ते की वजह से हमारी प्रेरणा कहीं से कमजोर नहीं हुई और हम मिलकर आगे बढ़ते रहे। सही मायनों में व्यापार की नींव भरोसे पर टिकी होती है, उसमें हम कहीं कमजोर नहीं पड़े। पारिवारिक व्यापारिक पृष्ठभूमि होने के नाते हम मुश्किल दौर से निपटने में सक्षम रहे। इस दौरान अपनी जड़ें कितनी मजबूत होनी चाहिए, यह बात भी मालूम हुई। बीता साल व्यापारिक दृष्टि से नाजुक तो रहा, लेकिन उम्मीद है कि 2021 में हम व्यापारी जरूर नुकसान की भरपाई कर लेंगे।
-प्रेम शंकर अग्रवाल, समाजसेवी एवं कारोबारी
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वकालत के लिहाज से यह साल काफी उठा-पटक वाला रहा। हर तबके के साथ साथ वकीलों की भी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई। हालांकि, लंबे वक्त तक लॉकडाउन और उसके बाद धीरे धीरे अनलॉक के क्रम में देश के कई राज्यों में न्याय का नया दौर चला और मुकदमों की डिजिटल सुनवाई शुरू हुई, जो कि वाकई में एक महत्वपूर्ण और सार्थक पहल है। अपने लखीमपुर कोर्ट में भी अच्छा काम हुआ कि कोर्ट में नई डिजिटल प्रणाली शुरू हो गई। लखीमपुर सिविल कोर्ट में बहुत सी चीजों को डिजिटलाइज किया गया। मुकदमा दायर करने पर मोबाइल पर मेसेज आ जाता था कि फलां का मुकदमा इस तारीख को लगा। जब तारीख आई तो उसकी भी सूचना मिल गई। मुश्किल वक्त के दौरान डिजिटल व्यवस्था ने वाकई एक नई उम्मीद दी है, जो आने वाले नए साल में और भी परवान चढ़ेगी।
-केवल कृष्ण, एडवोकेट
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कोरोना से लड़ाई में पर्यावरण की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है, यह इस साल लगभग हर आम और खास ने समझ लिया होगा। इस साल सबने देखा कि लॉकडाउन के दौरान यातायात थमने से ऐसा लगा कि प्रकृति ने जैसे नया जन्म ले लिया हो। दूर दूर तक साफ हवा और आसमान के अलावा पक्षियों के कलरव ने हमें वापस अपनी नीड़ की ओर देखने और सोचने को विवश किया। वैसे भी जनपद का काफी भू-भाग तराई क्षेत्र में आता है, जिसमें दुधवा नेशनल पार्क भी है। जंगल क्षेत्र होने के कारण जनपद की जलवायु महानगरों की अपेक्षाकृत काफी बेहतर है, जनपद की नदियां और पर्यावरण इसे प्राकृतिक रूप से भरपूर धनवान बनाते हैं। यदि हम लॉकडाउन की तरह हमेशा से ही अपने आप को कुछ दिनों के लिए संभाल लें और पर्यावरण का ख्याल रख सकें, तो उम्मीद है कि नए साल का सूरज और बेहतर चमकेगा।
-डॉ वीपी सिंह, पर्यावरणविद
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इस साल कोरोना ने लोगों को योग ओर आयुर्वेद की उपयोगिता का एहसास करा दिया। एलोपैथ के आगे लोग प्राचीन चिकित्सा पद्धति को भूल ही गए थे। मगर, कोरोना ने लोगों को बता दिया कि आयुर्वेद एवं योग ही हर बीमारी से लड़ने और उससे निजात दिलाने में सहायक है। कोरोना काल में रोग प्रतिरोधक क्षमता क्या होती है, यह भी लोगों ने जाना। गिलोय, तुलसी, अदरक समेत घरेलू मसालों के जरिये कैसे प्रतिरोधक क्षमता मजबूत की जा सकती है, इस ओर भी लोगों का ध्यान गया। सूर्य नमस्कार, ताड़ासन, तिर्यक ताड़ासन जैसे योग के आसनों के साथ साथ प्राणायाम जैसे महत्वपूर्ण श्वांस के व्यायाम पर लोगों की नजरें रहीं। कोरोना काल ने जहां हमें काफी मुश्किलें दीं तो हमें अपने स्व की ओर लौटना भी सिखाया, उम्मीद है कि आने वाले साल में हमारा यह स्व और विस्तार पाएगा।
-प्रिंस रंजन बरनवाल, योग प्रशिक्षक