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संकट में प्रकृति के सफाई कर्मी कछुआ
अनिल मिश्र बांकेगंज।
Updated Tue, 01 Aug 2017 11:29 PM IST
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कछुअा
- फोटो : अमर उजाला
गिद्धों के बाद अब कछुओं पर भी संकट के बादल
जिले से बड़े पैमाने पर हो रही कछुआ की तस्करी
जल की सफाई का काम करने वाले कछुओं का वजूद संकट में है। कभी भोजन के लिए तो कभी तंत्र-मंत्र के लिए इनका शिकार हो रहा है। हाल ही में मोहम्मदी क्षेत्र में एक तस्कर के पास से कछुओं की बरामदगी ने इस बात की पुष्टि की है कि खीरी जिले से बड़े पैमाने पर कछुओं की तस्करी हो रही है।
खीरी जिले में घाघरा और शारदा नदियों के अलावा दक्षिण खीरी वन प्रभाग में जंगल से होकर गुजरने वाली उल्ल नदी, गोमती नदी, बरौंछा नाला, नगरिया, सेमरई झील समेत सभी तालाबों में बड़ी संख्या में अच्छी प्रजाति के कछुए मिलते हैं। ये कछुए पानी के हानिकारक जीवों, मृत कीड़ों-मकीड़ों और इनमें पड़ने वाली गंदगी को खाकर नष्ट कर देते है। कछुए जलीय जैव विविधता को संतुलित करते है। जलीय जीवों और वनस्पतियों के लिए स्वस्थ वातावरण तैयार करते है। इसीलिए इन्हें प्रकृति का सफाई कर्मी कहा जाता है।
अंधविश्वास के चलते लोगों को तंत्र-मंत्र के लिए कछुओं की तलाश रहती है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल समेत दक्षिण के कई प्रांतों में इनका मांस बड़े चाव से खाया जाता है। विदेशों में भी इनकी बड़ी मांग है। कछुआ तस्करों के जाल खीरी तक फैले हुए है। शिकारी इन कछुओं को पकड़कर तस्करों के हवाले कर देते है। यह तस्कर इनका बड़े पैमाने पर कारोबार कर रहे है।
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इसके अलावा अवैध खनन से भी कछुओं को भारी नुकसान पहुंच रहा है। कछुआ नदी और तालाबों के किनारे रेत में अंडे देते हैं। खनन करते समय कछुओं के अंडे नष्ट हो जातेे हैं। इससे भी कछुओं की आबादी में कमी आ रही है। जिले में इससे पहले भी कई बार कछुआ तस्कर पकड़े जा चुके है। लेकिन वन विभाग इनके प्रति उतना संवेदनशील नहीं है, जितना होना चाहिए।
वन्यजीव विशेषज्ञ एवं राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि जिस तरह गिद्ध धरती पर सफाई कर्मी हैं, उसी तरह कछुओं को जलीय सफाई कर्मी माना जाता है। गिद्धों के साथ कछुओं की हो रही कमी से प्रकृति के लिए बड़ा खतरा बढ़ रहा है। इनके संरक्षण के लिए ठोस उपाय किए जाने की जरूरत है।
बनारस की गंगा नदी में कछुओं के लिए बनी टर्टिल सेंक्चुरी
कछुओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए बनारस में गंगा नदी पर राजघाट से अस्सी घाट तक बरसों पहले टर्टिल सेंक्चुरी स्थापित की गई है। बनारस में बड़ी संख्या में शव गंगा नदी में प्रवाहित होते है। कछुए इन शवों को खाकर नदी के पानी को शुद्ध करते है।
दक्षिण खीरी वन प्रभाग के सभी रेंजों में स्थित नदियों और तालाबों में मौजूद कछुओं की निगरानी के लिए वन विभाग की टीमें गठित कर दी गई है। वन कर्मियों को जंगल के बाहरी रास्तों पर गश्त के निर्देश जारी किए गए है। विभाग कछुओं के संरक्षण और संवर्धन के प्रति पूरी तरह गंभीर है।
- अखिलेश पांडे, डीएफओ, साउथ, खीरी
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जिले से बड़े पैमाने पर हो रही कछुआ की तस्करी
जल की सफाई का काम करने वाले कछुओं का वजूद संकट में है। कभी भोजन के लिए तो कभी तंत्र-मंत्र के लिए इनका शिकार हो रहा है। हाल ही में मोहम्मदी क्षेत्र में एक तस्कर के पास से कछुओं की बरामदगी ने इस बात की पुष्टि की है कि खीरी जिले से बड़े पैमाने पर कछुओं की तस्करी हो रही है।
खीरी जिले में घाघरा और शारदा नदियों के अलावा दक्षिण खीरी वन प्रभाग में जंगल से होकर गुजरने वाली उल्ल नदी, गोमती नदी, बरौंछा नाला, नगरिया, सेमरई झील समेत सभी तालाबों में बड़ी संख्या में अच्छी प्रजाति के कछुए मिलते हैं। ये कछुए पानी के हानिकारक जीवों, मृत कीड़ों-मकीड़ों और इनमें पड़ने वाली गंदगी को खाकर नष्ट कर देते है। कछुए जलीय जैव विविधता को संतुलित करते है। जलीय जीवों और वनस्पतियों के लिए स्वस्थ वातावरण तैयार करते है। इसीलिए इन्हें प्रकृति का सफाई कर्मी कहा जाता है।
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अंधविश्वास के चलते लोगों को तंत्र-मंत्र के लिए कछुओं की तलाश रहती है। इसके अलावा पश्चिम बंगाल समेत दक्षिण के कई प्रांतों में इनका मांस बड़े चाव से खाया जाता है। विदेशों में भी इनकी बड़ी मांग है। कछुआ तस्करों के जाल खीरी तक फैले हुए है। शिकारी इन कछुओं को पकड़कर तस्करों के हवाले कर देते है। यह तस्कर इनका बड़े पैमाने पर कारोबार कर रहे है।
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इसके अलावा अवैध खनन से भी कछुओं को भारी नुकसान पहुंच रहा है। कछुआ नदी और तालाबों के किनारे रेत में अंडे देते हैं। खनन करते समय कछुओं के अंडे नष्ट हो जातेे हैं। इससे भी कछुओं की आबादी में कमी आ रही है। जिले में इससे पहले भी कई बार कछुआ तस्कर पकड़े जा चुके है। लेकिन वन विभाग इनके प्रति उतना संवेदनशील नहीं है, जितना होना चाहिए।
वन्यजीव विशेषज्ञ एवं राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि जिस तरह गिद्ध धरती पर सफाई कर्मी हैं, उसी तरह कछुओं को जलीय सफाई कर्मी माना जाता है। गिद्धों के साथ कछुओं की हो रही कमी से प्रकृति के लिए बड़ा खतरा बढ़ रहा है। इनके संरक्षण के लिए ठोस उपाय किए जाने की जरूरत है।
बनारस की गंगा नदी में कछुओं के लिए बनी टर्टिल सेंक्चुरी
कछुओं के संरक्षण और संवर्धन के लिए बनारस में गंगा नदी पर राजघाट से अस्सी घाट तक बरसों पहले टर्टिल सेंक्चुरी स्थापित की गई है। बनारस में बड़ी संख्या में शव गंगा नदी में प्रवाहित होते है। कछुए इन शवों को खाकर नदी के पानी को शुद्ध करते है।
दक्षिण खीरी वन प्रभाग के सभी रेंजों में स्थित नदियों और तालाबों में मौजूद कछुओं की निगरानी के लिए वन विभाग की टीमें गठित कर दी गई है। वन कर्मियों को जंगल के बाहरी रास्तों पर गश्त के निर्देश जारी किए गए है। विभाग कछुओं के संरक्षण और संवर्धन के प्रति पूरी तरह गंभीर है।
- अखिलेश पांडे, डीएफओ, साउथ, खीरी