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Lakhimpur Kheri News: सौ वर्षों का गौरवशाली इतिहास संजोए है मोहम्मदी की श्रीरामलीला
Wed, 17 Sep 2025 12:30 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Wed, 17 Sep 2025 12:30 AM IST
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मोहम्मदी की श्रीराम लीला में लीला मंचन करते हुए कलाकार। फाइल फोटो
मोहम्मदी। कस्बे की श्रीरामलीला 100 वर्षों का गौरवशाली इतिहास संजोए हुए है। अपनी अनूठी परंपरा और विशिष्ट शैली के लिए आसपास के जिलों में भी इसकी अलग पहचान है।
कस्बे के समाजसेवी अतुल रस्तोगी ने बताया कि क्षेत्र में श्रीरामलीला 1899 में शुरू हुई थी। उस समय स्व. बिंद्राप्रसाद भल्ला, स्व. बच्चू भट्ट व कुछ अन्य साधुओं ने कदंब शिव मंदिर मठिया निकट पुतन्नी तिराहे पर श्रीरामलीला शुरू करने के लिए बैठक की। विचार किया कि मेला कैसे प्रारंभ किया जाए। शुरुआत में चंदा एकत्र किया गया। राजा साहब ने रामलीला के लिए जगह दी। कहार बिरादरी के लोगों ने पालकी उठाई। किन्नरों ने नाच-गाने बाजे आदि की जिम्मेदारी ली। ब्राह्मणों ने लीला करवाने और पात्रों की व्यवस्था का जिम्मा उठाया। इस तरह मेला प्रारंभ होकर धीरे-धीरे ख्याति प्राप्त करने लगा।
स्व पं. लल्ला मिश्रा ने लंबे समय तक लीला करवाई। वर्ष 1950 में राजतिलक करवाते समय कार्यक्रम स्थल पर ही उनका निधन हो गया। लीला में चौपाई गायन की उनकी विशिष्ट शैली बहुत लोकप्रिय हुई। यहां बहुत सारे खेल-तमाशे, नाटक-नौटंकी, सर्कस, काला जादू, मौत की छलांग, नृत्यकला प्रदर्शनी, मिनी जू आदि लगने लगी। समय के साथ दंगल की शुरुआत हो गई। इसमें मोहम्मदी क्षेत्र, शाहजहांपुर, लखीमपुर, हरदोई, मुरादाबाद, मेरठ, अयोध्या, दिल्ली, गोरखपुर, पंजाब, नेपाल सहित देश भर से प्रसिद्ध पहलवान आने लगे।
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मेले की ख्याति बढ़ने के साथ ही इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो गए। इसमें जवाबी ख्याल, जवाबी कीर्तन, जवाबी कव्वाली, कवि सम्मेलन, मुशायरा, संगीत सम्मेलन, लोकनृत्य के कार्यक्रम लोगों के आकर्षण का केंद्र बने। यहां देशभर के कवि, शायर, ख्याल गायक और लोकगीत गायक आते हैं और अपनी कला से लोगों को प्रभावित करते हैं।
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प्रसिद्ध है श्रीराम और शिवजी की बरात
शारदीय नवरात्र के पहले दिन से ही मेला की स्थापना होती है। द्वीज के दिन शंकर जी की बरात मेला स्थल से निकलकर नगर भ्रमण करती है। पंचमी के दिन धनुष भंग की लीला होती है। रात्रि आठ बजे से श्रीराम बरात मेला स्थल से निकलकर नगर भ्रमण करती है। प्रातः 6 बजे अस्तल मंदिर में श्रीराम विवाह होता है। दोनों बरातों को देखने के लिए नगरवासी और बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों से लोग आते है। अधिकांश मार्गों पर दोनों ओर खड़े होकर बरात को देखते हैं व उसका स्वागत करते हैं। बरातों में हाथी, घोड़ा, ऊंट, नृत्यांगना, बैंड, लिल्ली घोड़ी, ढोल, डीजे और मनोरम झांकियां आदि चलती हैं। नगरपालिका के ओएसडी शिवनंदन रस्तोगी ने बताया कि सन 1988 से श्रीरामलीला नगरपालिका करा रही है। इस बार 22 सितंबर से आयोजन शुरू होगा।
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कस्बे के समाजसेवी अतुल रस्तोगी ने बताया कि क्षेत्र में श्रीरामलीला 1899 में शुरू हुई थी। उस समय स्व. बिंद्राप्रसाद भल्ला, स्व. बच्चू भट्ट व कुछ अन्य साधुओं ने कदंब शिव मंदिर मठिया निकट पुतन्नी तिराहे पर श्रीरामलीला शुरू करने के लिए बैठक की। विचार किया कि मेला कैसे प्रारंभ किया जाए। शुरुआत में चंदा एकत्र किया गया। राजा साहब ने रामलीला के लिए जगह दी। कहार बिरादरी के लोगों ने पालकी उठाई। किन्नरों ने नाच-गाने बाजे आदि की जिम्मेदारी ली। ब्राह्मणों ने लीला करवाने और पात्रों की व्यवस्था का जिम्मा उठाया। इस तरह मेला प्रारंभ होकर धीरे-धीरे ख्याति प्राप्त करने लगा।
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स्व पं. लल्ला मिश्रा ने लंबे समय तक लीला करवाई। वर्ष 1950 में राजतिलक करवाते समय कार्यक्रम स्थल पर ही उनका निधन हो गया। लीला में चौपाई गायन की उनकी विशिष्ट शैली बहुत लोकप्रिय हुई। यहां बहुत सारे खेल-तमाशे, नाटक-नौटंकी, सर्कस, काला जादू, मौत की छलांग, नृत्यकला प्रदर्शनी, मिनी जू आदि लगने लगी। समय के साथ दंगल की शुरुआत हो गई। इसमें मोहम्मदी क्षेत्र, शाहजहांपुर, लखीमपुर, हरदोई, मुरादाबाद, मेरठ, अयोध्या, दिल्ली, गोरखपुर, पंजाब, नेपाल सहित देश भर से प्रसिद्ध पहलवान आने लगे।
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मेले की ख्याति बढ़ने के साथ ही इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हो गए। इसमें जवाबी ख्याल, जवाबी कीर्तन, जवाबी कव्वाली, कवि सम्मेलन, मुशायरा, संगीत सम्मेलन, लोकनृत्य के कार्यक्रम लोगों के आकर्षण का केंद्र बने। यहां देशभर के कवि, शायर, ख्याल गायक और लोकगीत गायक आते हैं और अपनी कला से लोगों को प्रभावित करते हैं।
प्रसिद्ध है श्रीराम और शिवजी की बरात
शारदीय नवरात्र के पहले दिन से ही मेला की स्थापना होती है। द्वीज के दिन शंकर जी की बरात मेला स्थल से निकलकर नगर भ्रमण करती है। पंचमी के दिन धनुष भंग की लीला होती है। रात्रि आठ बजे से श्रीराम बरात मेला स्थल से निकलकर नगर भ्रमण करती है। प्रातः 6 बजे अस्तल मंदिर में श्रीराम विवाह होता है। दोनों बरातों को देखने के लिए नगरवासी और बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों से लोग आते है। अधिकांश मार्गों पर दोनों ओर खड़े होकर बरात को देखते हैं व उसका स्वागत करते हैं। बरातों में हाथी, घोड़ा, ऊंट, नृत्यांगना, बैंड, लिल्ली घोड़ी, ढोल, डीजे और मनोरम झांकियां आदि चलती हैं। नगरपालिका के ओएसडी शिवनंदन रस्तोगी ने बताया कि सन 1988 से श्रीरामलीला नगरपालिका करा रही है। इस बार 22 सितंबर से आयोजन शुरू होगा।