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गोष्ठी और कृषि मेले के नाम पर लाखों का खर्च
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
Updated Thu, 03 Aug 2017 11:04 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
सवा साल में 29.82 लाख हुए खर्च पर किसान बेहाल
21.45 लाख की गोष्ठी और 8.25 लाख प्रदर्शनी में खर्चे
गिनती के चहेते किसान ही गोष्ठियों में बुलाए जाते
70 साल में कई सरकारें बदली और सभी ने किसानों को खुशहाल बनाने के दावे किए। किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने के लिए कई नीतियां बनीं, लेकिन सिस्टम में बैठे अफसर और कर्मचारियों की मनमानी के चलते न तो सरकार की कोई नीति ठीक ढंग से लागू हुई और न ही किसानों को उसका फायदा मिल सका। नेता से लेकर अफसर तक ये कहते नहीं थकते कि किसान खुशहाल हो रहे हैं। उनकी आय दोगुनी करने के लिए काम किया जा रहा है। मगर सिस्टम सुधरने को तैयार नहीं है।
किसानों की जागरूकता के लिए होने वाली रबी और खरीफ की गोष्ठियों और कृषि मेलों को देखें, तो सवा साल में इन पर 29.80 लाख बजट खर्च हो चुका है। लेकिन किसानों को गोष्ठियों से कोई फायदा हुआ न मेले ही से लाभ मिला। प्रत्येक गोष्ठी में कुछ गिने चुने किसान आए और रजिस्टर में कई गुना अधिक किसानों की इंट्री कर बजट ठिकाने लगा दिया गया। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016-17 में जैविक एवं उन्नत खेती को बढ़ावा देने और नई कृषि योजनाओं की जानकारी किसानों तक पहुंचाने के लिए 40 गोष्ठियां-मेले और 300 प्रदर्शनी कराई गईं, जिनमें अलग-अलग योजनाओं में 20.70 लाख बजट खर्च हुआ। इन गोष्ठियों में गिनती के चार-पांच किसान ही बुलाए गए। अधिकांश किसानों तक इसकी जानकारी ही नहीं पहुंची। अगर कोई बिना बुलाए किसान गोष्ठियों में पहुंचा, तो भाषणबाजी और चाय-नाश्ता कराकर गोष्ठी खत्म कर दी गई। केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों के बारे में भी किसानों को जानकारी नहीं दी गईं। एक-दो गाष्ठियों में शामिल हुए किसान बताते हैं कि कृषि विभाग ने गोष्ठियों और मेले में कुछ गिने-चुने किसानों को ही बुलाया जाता है। वही अधिकांश गोष्ठियों में दिखाई पड़ते हैं। कृषि मेले कब और कहां लगने हैं, जिसकी जानकारी किसानों तक नहीं पहुंचती, जबकि बड़ी रकम जागरूकता के लिए खर्च की जाती है। वर्ष 2017-18 में भी 16 गोष्ठियां कराई जा चुकी है, जिन पर 9.12 लाख बजट खर्च हुआ है।
योजना का नाम-गोष्ठियां-प्रति गोष्ठी खर्च-कुल खर्च
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-300-2750-8.25 लाख
तिलहन योजना-10-12000-1.20 लाख
कृषि सूचना तंत्र योजना-15-60 हजार-नौ लाख
आत्मा योजना 15-15 हजार-2.25 लाख
कुल बजट 340 20.70 लाख
कृषि गोष्ठी और मेले के माध्यम से किसानों को योजनाओं की जानकारी देने के साथ ही उन्नत खेती के लिए तकनीकी जानकारी दिया जाना मकसद होना चाहिए, लेकिन इनमें किसानों को बुलाया नहीं जाता। सिर्फ गिने-चुने किसानों को बुलाकर बजट को ठिकाने लगाया जाता है। इसमें ऊपर से नीचे तक अधिकारी शामिल हैं, जिससे अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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उपेंद्र सिंह, प्रगतिशील किसान, लल्हौआ
कृषि गोष्ठियों और मेले की जानकारी हम किसानों तक नहीं पहुंचती हैं। ब्लाक और तहसील स्तर पर साल में एक बार गोष्ठी कराई भी जाती है, तो महज औपचारिकता भर होती है। किसानों की जरूरत के मुताबिक जानकारी नहीं मिल पाती। खासकर ग्रामीण क्षेत्र के किसानों को इनका पता ही नहीं चलता कि कब गोष्ठी हुई और कहां मेला लगाया गया। कुछ योजनाओं में वितरित की जाने वाली किट भी अपात्रों को दी जाती हैं।
मुकुल मिश्रा, प्रगतिशील किसान
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21.45 लाख की गोष्ठी और 8.25 लाख प्रदर्शनी में खर्चे
गिनती के चहेते किसान ही गोष्ठियों में बुलाए जाते
70 साल में कई सरकारें बदली और सभी ने किसानों को खुशहाल बनाने के दावे किए। किसानों की आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने के लिए कई नीतियां बनीं, लेकिन सिस्टम में बैठे अफसर और कर्मचारियों की मनमानी के चलते न तो सरकार की कोई नीति ठीक ढंग से लागू हुई और न ही किसानों को उसका फायदा मिल सका। नेता से लेकर अफसर तक ये कहते नहीं थकते कि किसान खुशहाल हो रहे हैं। उनकी आय दोगुनी करने के लिए काम किया जा रहा है। मगर सिस्टम सुधरने को तैयार नहीं है।
किसानों की जागरूकता के लिए होने वाली रबी और खरीफ की गोष्ठियों और कृषि मेलों को देखें, तो सवा साल में इन पर 29.80 लाख बजट खर्च हो चुका है। लेकिन किसानों को गोष्ठियों से कोई फायदा हुआ न मेले ही से लाभ मिला। प्रत्येक गोष्ठी में कुछ गिने चुने किसान आए और रजिस्टर में कई गुना अधिक किसानों की इंट्री कर बजट ठिकाने लगा दिया गया। कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016-17 में जैविक एवं उन्नत खेती को बढ़ावा देने और नई कृषि योजनाओं की जानकारी किसानों तक पहुंचाने के लिए 40 गोष्ठियां-मेले और 300 प्रदर्शनी कराई गईं, जिनमें अलग-अलग योजनाओं में 20.70 लाख बजट खर्च हुआ। इन गोष्ठियों में गिनती के चार-पांच किसान ही बुलाए गए। अधिकांश किसानों तक इसकी जानकारी ही नहीं पहुंची। अगर कोई बिना बुलाए किसान गोष्ठियों में पहुंचा, तो भाषणबाजी और चाय-नाश्ता कराकर गोष्ठी खत्म कर दी गई। केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों के बारे में भी किसानों को जानकारी नहीं दी गईं। एक-दो गाष्ठियों में शामिल हुए किसान बताते हैं कि कृषि विभाग ने गोष्ठियों और मेले में कुछ गिने-चुने किसानों को ही बुलाया जाता है। वही अधिकांश गोष्ठियों में दिखाई पड़ते हैं। कृषि मेले कब और कहां लगने हैं, जिसकी जानकारी किसानों तक नहीं पहुंचती, जबकि बड़ी रकम जागरूकता के लिए खर्च की जाती है। वर्ष 2017-18 में भी 16 गोष्ठियां कराई जा चुकी है, जिन पर 9.12 लाख बजट खर्च हुआ है।
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योजना का नाम-गोष्ठियां-प्रति गोष्ठी खर्च-कुल खर्च
प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना-300-2750-8.25 लाख
तिलहन योजना-10-12000-1.20 लाख
कृषि सूचना तंत्र योजना-15-60 हजार-नौ लाख
आत्मा योजना 15-15 हजार-2.25 लाख
कुल बजट 340 20.70 लाख
कृषि गोष्ठी और मेले के माध्यम से किसानों को योजनाओं की जानकारी देने के साथ ही उन्नत खेती के लिए तकनीकी जानकारी दिया जाना मकसद होना चाहिए, लेकिन इनमें किसानों को बुलाया नहीं जाता। सिर्फ गिने-चुने किसानों को बुलाकर बजट को ठिकाने लगाया जाता है। इसमें ऊपर से नीचे तक अधिकारी शामिल हैं, जिससे अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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उपेंद्र सिंह, प्रगतिशील किसान, लल्हौआ
कृषि गोष्ठियों और मेले की जानकारी हम किसानों तक नहीं पहुंचती हैं। ब्लाक और तहसील स्तर पर साल में एक बार गोष्ठी कराई भी जाती है, तो महज औपचारिकता भर होती है। किसानों की जरूरत के मुताबिक जानकारी नहीं मिल पाती। खासकर ग्रामीण क्षेत्र के किसानों को इनका पता ही नहीं चलता कि कब गोष्ठी हुई और कहां मेला लगाया गया। कुछ योजनाओं में वितरित की जाने वाली किट भी अपात्रों को दी जाती हैं।
मुकुल मिश्रा, प्रगतिशील किसान