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Lakhimpur Kheri: 80 दिन बाद आज घर पहुंचेगा मंजीत... जलेंगे दीपक, मनेंगी खुशियां; गांव में स्वागत की तैयारी

Fri, 01 Dec 2023 10:27 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Published by: बरेली ब्यूरो Updated Fri, 01 Dec 2023 10:27 AM IST
सार

उत्तरकाशी की टनल में 17 दिन तक फंस रहे मंजीत 80 दिन बाद अपने घर आ रहा है। कागजी प्रक्रिया पूरी करने के बाद ऋषिकेश से बृहस्पतिवार की शाम चार बजे डिस्चार्ज किया गया। इसके बाद वहां से निजी बस से लखनऊ के लिए रवाना हो गया। मां और बहनें उसका बेसब्री से इंतजार कर रही हैं। 

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Uttarkashi tunnel rescue news Manjeet will reach home after 80 days in Lakhimpur kheri
मंजीत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लखीमपुर खीरी की निघासन तहसील के भैरमपुर गांव निवासी मंजीत आज अपने घर लौटेगा। उत्तरकाशी की टनल में 17 दिन तक फंस रहे मंजीत के मंगलवार को बाहर आने के बाद से घर पर मीडिया और लोगों का जमावड़ा लगा है। उधर, मंजीत की मां और दोनों बहनें अपने भाई और पिता का इंतजार कर रही हैं। मंजीत 80 दिन बाद घर पहुंचेगा।

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मंजीत की मां चौधराइन ने बताया कि पति और बेटा उत्तराखंड से निकल चुके हैं। परिजन धूमधाम से स्वागत की तैयारी में जुटे हैं, लेकिन हालात ये हैं कि उनके पास मिठाई खरीदने तक के पैसे नहीं हैं। कुछ ग्रामीणों और तहसील प्रशासन की मदद से उनके घर में चूल्हा जल पा रहा है। हालांकि, अभी तक किसी जनप्रतिनिधि का दिल नहीं पसीजा है। 
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टनल से निकाले जाने के बाद मंजीत समेत 41 अन्य श्रमिकों और उनके परिजनों के साथ ऋषिकेश एम्स में भर्ती कराया गया था। कागजी प्रक्रिया पूरी करने के बाद ऋषिकेश से बृहस्पतिवार की शाम चार बजे डिस्चार्ज किया गया। मंजीत ने फोन पर बताया कि स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान सेहत ठीक निकली है। कहा कि पिता समेत यूपी के जितने लोग हैं, वह सब एक निजी बस से लखनऊ पहुंचाए जा रहे हैं। 

लखनऊ पहुंचने के बाद वहां से सभी को उनके घरों तक पहुंचाया जाएगा। मंजीत ने बताया कि उम्मीद है कि शुक्रवार दोपहर बाद तक अपनी मां के पास पहुंच जाएंगे। वहीं 17 दिन की दास्तां बताते हुए मंजीत भावुक हो उठे। कई बार कहा कि उन्होंने उम्मीद छोड़ दी थी, लेकिन मां और पिता की दुआओं ने बचा लिया। 

 

भाई दूज पर लौटने की थी योजना
ऋषिकेश से लखनऊ की ओर लौट रहे मंजीत ने बस से ही फोन पर बात करते हुए बताया कि 17 दिन की कहानी बेहद दर्द भरी है। पूरी बातें बताएं तो बहुत समय लग जाएगा। वह बताते हैं कि दो महीना पहले 10 सितंबर को वह उत्तरकाशी में काम करने गए थे, लेकिन ठीक दो महीने बाद हादसा हो गया। उन्होंने सोचा था कि 12 नवंबर को वह काम निपटाकर भाई दूज के त्योहार पर अपने घर जाएंगे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। हम लोग जीवन और मौत के संघर्ष से जूझते रहे। 

चार इंची पाइप के जरिये भेजे जाते थे खाद्य पदार्थ
मंजीत ने फोन पर बताया कि 17 दिन वह काजू, किशमिश, चना, बिस्किट आदि खाकर रहे। चार इंच के पाइप के जरिये खाद्य पदार्थ सुरंग में भेजे जाते थे। इसके लिए बाहर से पाइप में हवा का तगड़ा प्रेशर दिया जाता था, ताकि खाद्य पदार्थ सुरंग में हम लोग तक पहुंच जाएं। मंजीत ने फोन पर बताया कि सभी साथी मुश्किल वक्त में एक परिवार के तौर पर रहे। सब एक दूसरे का हौसला बढ़ाते रहे। 

उन्होंने बताया कि खाने के बाद पीने के पानी के लिए टनल के पड़ोस एक पहाड़ से रिसता हुआ जल प्यास बुझाता था। जबकि, दैनिक क्रिया के लिए दूर टनल में जाते थे। जहां फंसे थे, वहां से दो किमी तक लंबी टनल थी। इसलिये वह खाली समय में वहां पर चहलकदमी करते थे। मंजीत ने बताया कि पहले तो पाइप के जरिये ही तेज आवाज में टनल के अंदर से चिल्लाकर बात करते थे। 

सुरंग के बाहर फोन रखा जाता था, जिससे दूसरे तरफ की आवाज पाइप के जरिये हम तक आती थी और बाद में हम लोग चिल्लाकर अपनी बात पाइप के माध्यम से सुरंग के बाहर रखे फोन को पहुंचाते थे। मंजीत ने बताया कि इसके बाद माइक्रोफोन की व्यवस्था की गई थी, जो पाइप के जरिये टनल में आता था और फिर हम लोग रेस्क्यू में लगे लोगों व परिवार वालों से बात करते थे। 

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