{"_id":"6244bf3d5345bb23d652f825","slug":"mahadev-appeared-in-chhoti-kashi-on-chaitra-krishna-chaturdashi-lakhimpur-news-bly479747527","type":"story","status":"publish","title_hn":"चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को छोटी काशी में प्रकट हुए थे महादेव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को छोटी काशी में प्रकट हुए थे महादेव
सार
गोकर्णेश्वर शिव के प्राकट्य दिवस पर विशेष
विज्ञापन
भगवान विष्णु द्वारा स्थापित गोकर्णेश्वर शिव श्रंग।
विस्तार
चैत्र माहात्म्य के कारण ही गोला गोकर्णनाथ में लगता है चैती मेला
गोला गोकर्णनाथ (लखीमपुर खीरी)। चैत्र मास की कृष्ण चतुर्दशी गोला गोकर्णनाथ में भगवान शंकर की आराधना और दर्शन के लिए विशेष महत्व रखती है। इस दिन गोकर्णेश्वर शिव इस पुण्यस्थली पर प्रथम बार एक ब्राह्मण सदानंद के समक्ष प्रकट हुए थे और उसकी मनोकामना पूरी की थी। चैत्र माहात्म्य के कारण ही गोला गोकर्णनाथ में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी और चैती का मेला लगने लगा।
गोला गोकर्णनाथ छोटी काशी पर शोध प्रबंध लिख रहे साहित्यकार लोकेश कुमार गुप्त ने बताया कि पद्म पुराण में वर्णन है कि प्राचीन काल में कोटद्वार नगर (अब कोटवारा गांव) में गरीब ब्राह्मण सदानंद की प्रिय गाय को उसकी पत्नी ने मारकर खा लिया था। इस पाप से उसका एकमात्र पुत्र धर्म गूंगा हो गया। सदानंद ने प्रायश्चित करने के लिए वन गमन किया, लेकिन रात हो जाने के कारण वह हिंसक पशुओं के भय से कटीले बेल वृक्ष पर जाकर बैठ गया और रात्रि जागरण के उद्देश्य से बेलपत्र तोड़कर नीचे डालने लगा। इस दौरान वह शिव के पंचाक्षर मंत्र ‘ओम नम: शिवाय’ का उच्चारण करने लगा। पद्म पुराण के मुताबिक, जिस बेल वृक्ष पर सदानंद बैठा था उसके नीचे ही भगवान विष्णु द्वारा स्थापित मृग रूप धारी शिव का श्रंग था। सदानंद के बेल पत्रों से शिव श्रंग की पूजा और ओम नम: शिवाय जप से शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गए। उन्होंने सदानंद से वरदान मांगने को कहा तो सदानंद ने अपनी गाय का पुर्नजीवन और पुत्र धर्म का गूंगापन दूर करने का वरदान मांग कर पाप निवारण का उपाय पूछा। इस पर शिवजी ने उससे पंच तीर्थों की स्थापना करने को कहा।
ब्राह्मण सदानंद ने शिवजी के कहे अनुसार, गोकर्णेश्वर महादेव के समीप ही गोकर्णतीर्थ, ग्राम भवानीगंज में कोणार्क तीर्थ, पुनर्भू ग्रंट में पुनर्भू तीर्थ, त्रिलोक गिरिस्थल के समीप भद्र तीर्थ और ग्राम अहमदनगर में मांड तीर्थ की स्थापना की। पंच तीर्थों में स्नान कर जब सदानंद ने गोकर्णेश्वर शिव के दर्शन किए तो सदानंद की पत्नी के पापों का निवारण हो गया। गाय को पुनर्जीवन मिला। शिव जी ने यह वरदान दिया कि क्षेत्र की कृष्ण चतुर्दशी को मीन राशि में सूर्य होने पर जो भक्त पंच तीर्थों में स्नान और मुंडन करवाकर बेलपत्र अर्पण कर मेरा दर्शन कर रात्रि जागरण करेगा उसकी मन की कामना अवश्य पूर्ण होगी।
विज्ञापन
भगवान शिव के वरदान के फल की प्राप्ति के लिए पंचकोसीय परिक्रमा शुरू हुई और चैती का मेला लगने लगा, लेकिन अब पंचकोसीय परिक्रमा, पंच तीर्थों में से कई तीर्थों के दूषित होने के कारण उनका अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।
चैत्र की कृष्ण चतुर्दशी इस बार 31 मार्च को है, लेकिन यहां शिव भक्तों और विभिन्न नदियों से जल भरकर कांवड़ लाने वाले कांवड़ियों के जयकारों की गूंज अभी से ही सुनाई देने लगी है। बताते चलें कि शिवलिंग का आकार गाय के कान जैसा है। इसलिए इस दिव्य शिवलिंग का नाम गोकर्णेश्वर पड़ा है।
आज है चैत्र कृष्ण चतुर्दशी
श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर के पुजारी दयानंद पांडे के अनुसार मीन राशि में सूर्य का प्रवेश और चैत्र का कृष्ण पक्ष चल रहा है। चतुर्दशी तिथि 30 मार्च को दोपहर 1:19 बजे से लेकर 31 दिसंबर को दोपहर 12:22 बजे तक रहेगी। दयानंद पांडेय के अनुसार उदया तिथि 31 मार्च को है, इसलिए चतुर्दशी का पर्व 31 मार्च को होना शुभ है।
विज्ञापन
गोला गोकर्णनाथ (लखीमपुर खीरी)। चैत्र मास की कृष्ण चतुर्दशी गोला गोकर्णनाथ में भगवान शंकर की आराधना और दर्शन के लिए विशेष महत्व रखती है। इस दिन गोकर्णेश्वर शिव इस पुण्यस्थली पर प्रथम बार एक ब्राह्मण सदानंद के समक्ष प्रकट हुए थे और उसकी मनोकामना पूरी की थी। चैत्र माहात्म्य के कारण ही गोला गोकर्णनाथ में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी और चैती का मेला लगने लगा।
गोला गोकर्णनाथ छोटी काशी पर शोध प्रबंध लिख रहे साहित्यकार लोकेश कुमार गुप्त ने बताया कि पद्म पुराण में वर्णन है कि प्राचीन काल में कोटद्वार नगर (अब कोटवारा गांव) में गरीब ब्राह्मण सदानंद की प्रिय गाय को उसकी पत्नी ने मारकर खा लिया था। इस पाप से उसका एकमात्र पुत्र धर्म गूंगा हो गया। सदानंद ने प्रायश्चित करने के लिए वन गमन किया, लेकिन रात हो जाने के कारण वह हिंसक पशुओं के भय से कटीले बेल वृक्ष पर जाकर बैठ गया और रात्रि जागरण के उद्देश्य से बेलपत्र तोड़कर नीचे डालने लगा। इस दौरान वह शिव के पंचाक्षर मंत्र ‘ओम नम: शिवाय’ का उच्चारण करने लगा। पद्म पुराण के मुताबिक, जिस बेल वृक्ष पर सदानंद बैठा था उसके नीचे ही भगवान विष्णु द्वारा स्थापित मृग रूप धारी शिव का श्रंग था। सदानंद के बेल पत्रों से शिव श्रंग की पूजा और ओम नम: शिवाय जप से शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हो गए। उन्होंने सदानंद से वरदान मांगने को कहा तो सदानंद ने अपनी गाय का पुर्नजीवन और पुत्र धर्म का गूंगापन दूर करने का वरदान मांग कर पाप निवारण का उपाय पूछा। इस पर शिवजी ने उससे पंच तीर्थों की स्थापना करने को कहा।
विज्ञापन
ब्राह्मण सदानंद ने शिवजी के कहे अनुसार, गोकर्णेश्वर महादेव के समीप ही गोकर्णतीर्थ, ग्राम भवानीगंज में कोणार्क तीर्थ, पुनर्भू ग्रंट में पुनर्भू तीर्थ, त्रिलोक गिरिस्थल के समीप भद्र तीर्थ और ग्राम अहमदनगर में मांड तीर्थ की स्थापना की। पंच तीर्थों में स्नान कर जब सदानंद ने गोकर्णेश्वर शिव के दर्शन किए तो सदानंद की पत्नी के पापों का निवारण हो गया। गाय को पुनर्जीवन मिला। शिव जी ने यह वरदान दिया कि क्षेत्र की कृष्ण चतुर्दशी को मीन राशि में सूर्य होने पर जो भक्त पंच तीर्थों में स्नान और मुंडन करवाकर बेलपत्र अर्पण कर मेरा दर्शन कर रात्रि जागरण करेगा उसकी मन की कामना अवश्य पूर्ण होगी।
विज्ञापन
भगवान शिव के वरदान के फल की प्राप्ति के लिए पंचकोसीय परिक्रमा शुरू हुई और चैती का मेला लगने लगा, लेकिन अब पंचकोसीय परिक्रमा, पंच तीर्थों में से कई तीर्थों के दूषित होने के कारण उनका अस्तित्व ही खत्म हो चुका है।
चैत्र की कृष्ण चतुर्दशी इस बार 31 मार्च को है, लेकिन यहां शिव भक्तों और विभिन्न नदियों से जल भरकर कांवड़ लाने वाले कांवड़ियों के जयकारों की गूंज अभी से ही सुनाई देने लगी है। बताते चलें कि शिवलिंग का आकार गाय के कान जैसा है। इसलिए इस दिव्य शिवलिंग का नाम गोकर्णेश्वर पड़ा है।
आज है चैत्र कृष्ण चतुर्दशी
श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर के पुजारी दयानंद पांडे के अनुसार मीन राशि में सूर्य का प्रवेश और चैत्र का कृष्ण पक्ष चल रहा है। चतुर्दशी तिथि 30 मार्च को दोपहर 1:19 बजे से लेकर 31 दिसंबर को दोपहर 12:22 बजे तक रहेगी। दयानंद पांडेय के अनुसार उदया तिथि 31 मार्च को है, इसलिए चतुर्दशी का पर्व 31 मार्च को होना शुभ है।