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‘कुचक्र’ में फंसकर दम तोड़ रही सरकारी धान खरीद
अमित गुप्ता लखीमपुर खीरी।
Updated Sun, 13 Nov 2016 12:02 AM IST
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- फोटो : amar ujala
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रोज नए फसाने से धान खरीद ठप, हांफ रहा किसान
नमी, हड़ताल, बंदी, बोरों की खरीद में घोटाले ने अटकाए रोड़े
शासन-प्रशासन ने भी मुंह मोड़ा, जनप्रतिनिधि मौन
सरकारी धान खरीद के पिछले कुछ वर्षों के रिकार्ड के मुकाबले यह साल किसानों के लिए बेहद खराब रहा है। अक्तूबर से ही धान खरीद पटरी पर नहीं आई, जिसके बाद नवंबर का पहला पखवाड़ा भी किसानों के लिए अच्छा नहीं रहा। सरकारी धान खरीद की दयनीय हालत के लिए राज्य सरकार की पालिसी में खामियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, क्योंकि कमीशन एजेंट को धान खरीद से बाहर रखा गया है। सिर्फ सरकारी एजेंसियों के सहारे धान खरीद का दांव खेला गया, जो चारों खाने चित्त हो चुका है। 97 में से अधिकतर क्रय केंद्रों पर खरीद नहीं हो रही है।
इस वर्ष धान की अच्छी पैदावार होने के चलते सरकार ने भी अक्तूबर में दो लाख 65 हजार मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य रखा था, जिसके बाद बिगड़ते हालात से धान खरीद पटरी पर नहीं आ सकी। लिहाजा नवंबर में लक्ष्य को घटाकर एक लाख 64 हजार 240 मीट्रिक टन कर दिया गया है। वहीं अच्छी आय की उम्मीद लगाए किसानों की खुशी काफूर हो चुकी है, क्योंकि उनके सामने एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति हो गई है। क्रय केंद्रों पर उनका धान खरीदा नहीं जा रहा है, तो खुले बाजार में उनकी लागत भी वसूल नहीं हो रही है। डेढ़ माह बीतने को हैं, लेकिन किसानों की समस्या पर शासन-प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। किसानों के हिमायती बनने का दावा करने वाले जनप्रतिनिधि भी मौन साधे हैं। कमीशन एजेंट को अभी धान खरीद से दूर रखा गया है, जिससे बाजार में धान के रेट को लेकर प्रतिस्पर्धा की उम्मीद खत्म है। इन हालात के पीछे दोषी कौन है? इस पर सस्पेंस बना हुआ है। खरीद की शुरुआत में किसानों के सामने धान में नमी ने रोड़े अटकाए, जिसके बाद राइस मिलों की हड़ताल, एजेंसियों की बंदी, बोरों की खराब गुणवत्ता ने किसानों की हालत और पतली कर दी है। अफसरों ने खरीद न करने वाले केंद्र प्रभारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की चेतावनी दी, लेकिन किसी पर कार्रवाई नहीं हुई। इन कुचक्रों के बीच राइस मिल इंडस्ट्री भी दम तोड़ रही है, जिससे खीरी के चावल उद्योग को झटका लगा है।
पिछले साल हुई थी रिकार्ड खरीद
खरीफ विपणन वर्ष 2015-16 में किसानों से 1,29,640 मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य रखा गया था। नवंबर माह में 50 आढ़तियों को भी कमीशन एजेंट बनाया गया था। एजेंसियों और आढ़तियों ने मिलकर लक्ष्य के बैरियर को क्रॉस करते हुए एक लाख 72 हजार 475 मीट्रिक टन धान खरीदा था। इसमें सरकारी एजेंसियों ने 48,908 और आढ़तियों ने एक लाख 23 हजार 567 मीट्रिक टन धान खरीदा था।
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शून्य में तब्दील हुए क्रय केंद्रों के आंकड़े
इस वर्ष धान खरीद अब तक फ्लॉप साबित हुई है। पीसीएफ ने 120 मीट्रिक टन धान खरीदकर क्रय केंद्र बंद कर रखे हैं। जबकि 51 केंद्र होने के साथ ही सबसे ज्यादा 39640 मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य पीसीएफ के जिम्मे है। इसके अलावा एग्रो, एसएफसी, कर्मचारी कल्याण निगम, एनसीसीएफ, यूपी कोआपरेटिव यूनियन ने कई दिनों से धान खरीद बंद कर रखी है। 10 नवंबर 2016 तक 856 किसानों का 8540 मीट्रिक टन धान खरीदा गया है, जो कुल लक्ष्य के सापेक्ष पांच फीसदी है।
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नमी, हड़ताल, बंदी, बोरों की खरीद में घोटाले ने अटकाए रोड़े
शासन-प्रशासन ने भी मुंह मोड़ा, जनप्रतिनिधि मौन
सरकारी धान खरीद के पिछले कुछ वर्षों के रिकार्ड के मुकाबले यह साल किसानों के लिए बेहद खराब रहा है। अक्तूबर से ही धान खरीद पटरी पर नहीं आई, जिसके बाद नवंबर का पहला पखवाड़ा भी किसानों के लिए अच्छा नहीं रहा। सरकारी धान खरीद की दयनीय हालत के लिए राज्य सरकार की पालिसी में खामियों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, क्योंकि कमीशन एजेंट को धान खरीद से बाहर रखा गया है। सिर्फ सरकारी एजेंसियों के सहारे धान खरीद का दांव खेला गया, जो चारों खाने चित्त हो चुका है। 97 में से अधिकतर क्रय केंद्रों पर खरीद नहीं हो रही है।
इस वर्ष धान की अच्छी पैदावार होने के चलते सरकार ने भी अक्तूबर में दो लाख 65 हजार मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य रखा था, जिसके बाद बिगड़ते हालात से धान खरीद पटरी पर नहीं आ सकी। लिहाजा नवंबर में लक्ष्य को घटाकर एक लाख 64 हजार 240 मीट्रिक टन कर दिया गया है। वहीं अच्छी आय की उम्मीद लगाए किसानों की खुशी काफूर हो चुकी है, क्योंकि उनके सामने एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई वाली स्थिति हो गई है। क्रय केंद्रों पर उनका धान खरीदा नहीं जा रहा है, तो खुले बाजार में उनकी लागत भी वसूल नहीं हो रही है। डेढ़ माह बीतने को हैं, लेकिन किसानों की समस्या पर शासन-प्रशासन ने कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। किसानों के हिमायती बनने का दावा करने वाले जनप्रतिनिधि भी मौन साधे हैं। कमीशन एजेंट को अभी धान खरीद से दूर रखा गया है, जिससे बाजार में धान के रेट को लेकर प्रतिस्पर्धा की उम्मीद खत्म है। इन हालात के पीछे दोषी कौन है? इस पर सस्पेंस बना हुआ है। खरीद की शुरुआत में किसानों के सामने धान में नमी ने रोड़े अटकाए, जिसके बाद राइस मिलों की हड़ताल, एजेंसियों की बंदी, बोरों की खराब गुणवत्ता ने किसानों की हालत और पतली कर दी है। अफसरों ने खरीद न करने वाले केंद्र प्रभारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की चेतावनी दी, लेकिन किसी पर कार्रवाई नहीं हुई। इन कुचक्रों के बीच राइस मिल इंडस्ट्री भी दम तोड़ रही है, जिससे खीरी के चावल उद्योग को झटका लगा है।
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पिछले साल हुई थी रिकार्ड खरीद
खरीफ विपणन वर्ष 2015-16 में किसानों से 1,29,640 मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य रखा गया था। नवंबर माह में 50 आढ़तियों को भी कमीशन एजेंट बनाया गया था। एजेंसियों और आढ़तियों ने मिलकर लक्ष्य के बैरियर को क्रॉस करते हुए एक लाख 72 हजार 475 मीट्रिक टन धान खरीदा था। इसमें सरकारी एजेंसियों ने 48,908 और आढ़तियों ने एक लाख 23 हजार 567 मीट्रिक टन धान खरीदा था।
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शून्य में तब्दील हुए क्रय केंद्रों के आंकड़े
इस वर्ष धान खरीद अब तक फ्लॉप साबित हुई है। पीसीएफ ने 120 मीट्रिक टन धान खरीदकर क्रय केंद्र बंद कर रखे हैं। जबकि 51 केंद्र होने के साथ ही सबसे ज्यादा 39640 मीट्रिक टन धान खरीद का लक्ष्य पीसीएफ के जिम्मे है। इसके अलावा एग्रो, एसएफसी, कर्मचारी कल्याण निगम, एनसीसीएफ, यूपी कोआपरेटिव यूनियन ने कई दिनों से धान खरीद बंद कर रखी है। 10 नवंबर 2016 तक 856 किसानों का 8540 मीट्रिक टन धान खरीदा गया है, जो कुल लक्ष्य के सापेक्ष पांच फीसदी है।