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संकटा देवी के स्वरूप में स्थापित हैं मां महालक्ष्मी
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प्राचीन संकटादेवी मंदिर में स्थापित दिव्य प्रतिमा।
शारदीय और वासंतिक नवरात्र के अलावा आषाढ़ मास में गुप्त नवरात्र पर भी लगता है मेला
लखीमपुर खीरी। मां संकटा देवी का प्राचीन मंदिर न केवल लखीमपुर खीरी, बल्कि आसपास के जिलों के लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। पूरे नवरात्र यहां मेला लगता है।
मां संकटा देवी की पूजा मां महालक्ष्मी के रूप में होती है। मां लक्ष्मी के नाम पर ही इस शहर का नाम लक्ष्मीपुर पड़ा, जो बाद में बदलकर लखीमपुर हो गया। संकटादेवी मंदिर जहां स्थित है उस मोहल्ले का नाम भी संकटादेवी है। लोगों की इस प्राचीन देवी प्रतिमा में गहन आस्था है।
मान्यता है कि मां संकटादेवी की उपासना करने से सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। मां संकटादेवी की आराधना करने के बाद यहां लोग शुभ कार्यों की शुरुआत करते हैं। विवाह के बाद नववधुओं को मां के दर्शन के बाद ही घर में प्रवेश कराया जाता है।
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यहां शारदीय और वासंतिक नवरात्र के अलावा आषाढ़ मास में गुप्त नवरात्र पर भी मेला लगता है। कभी यहां देवी को पशु बलि देने की प्रथा थी, जो बाद में धीरे-धीरे समाप्त हो गई। मंदिर आज भी महेवा स्टेट के स्वामित्व में है। यूं तो यहां दर्शनार्थियों की पूरे साल भीड़ भाड़ रहती है। लोग बच्चों के मुंडन और अन्नप्रासन संस्कार कराते हैं। नवरात्र में यहां शहर के अलावा पूरे जिले और दूसरे जिले से श्रद्धालु आकर पूजा अर्चना करते हैं और मनौतियां मानते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने की थी मां संकटादेवी की स्थापना
मां संकटादेवी की यह प्राचीन प्रतिमा भगवान श्रीकृष्ण ने स्थापित की थी। महाभारत युद्ध के बाद भगवान कृष्ण, रुकमणि और पांडव पशुपतिनाथ दर्शन को जाते समय इसी रास्ते से होकर गुजरे थे। प्राचीन काल में यह क्षेत्र नैमिषारण्य क्षेत्र में आता था। यहां के रमणीक वन क्षेत्र को देख रुकमणि ने यहीं पर कुछ समय बिताने की इच्छा जताई तो भगवान श्रीकृष्ण उन्हें यहां प्रवास की अनुमति देकर पांडवों के साथ पशुपतिनाथ दर्शन के लिए नेपाल रवाना हो गए। लौटते समय भगवान कृष्ण ने महालक्ष्मी की पाषाण प्रतिमा बनाकर यहां स्थापित की और पांडवों के साथ भगवान कृष्ण ने भी उनकी विधिवत पूजा अर्चना की।
यह भी मान्यता है कि राजा वेन के यहां आदि शक्ति ने देवी के सात स्वरूपों ने सात कन्याओं के रूप में जन्म लिया था। उन्हीं में से महालक्ष्मी स्वरूपणी संकटादेवी यहां स्थापित और पूजित हैं। हालांकि इनका कोई पौराणिक उल्लेख शास्त्रों में नहीं मिलता है लेकिन यह प्रतिमा हजारों साल पुरानी है, इसकी पुष्टि इतिहास के विशेषज्ञ भी करते हैं।
हजारों साल बाद जब यहां आबादी बढ़ने लगी और जंगल कटे तो यह प्राचीन प्रतिमा प्रकट हुई। तत्कालीन महेवा स्टेट के शासकों ने दिव्य देवी प्रतिमा पाकर इसी स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
भूरे रंग के पत्थर की देवी प्रतिमा
प्राचीन संकटादेवी की प्रतिमा भूरे रंग के पत्थर की है। इस पर चांदी का कवच पहना कर मूर्ति को सुंदर आकृति प्रदान की गई है। मूर्ति मंदिर के गर्भगृह के अंदर सिंहासन पर विराजमान है। मंदिर का मुख्य द्वार पूरब की ओर है। दक्षिण दिशा में भी एक विशाल द्वार सुविधा के लिए बनाया गया है। मुख्य मंदिर के सामने विशाल बरामदा है, जिसमें यज्ञस्थल निर्मित है। मंदिर के चारों ओर छायादार प्रदक्षिणा पथ है। मंदिर विशाल प्रांगण में है। मंदिर परिसर में शिव, हनुमान मंदिर भी हैं।
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लखीमपुर खीरी। मां संकटा देवी का प्राचीन मंदिर न केवल लखीमपुर खीरी, बल्कि आसपास के जिलों के लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है। पूरे नवरात्र यहां मेला लगता है।
मां संकटा देवी की पूजा मां महालक्ष्मी के रूप में होती है। मां लक्ष्मी के नाम पर ही इस शहर का नाम लक्ष्मीपुर पड़ा, जो बाद में बदलकर लखीमपुर हो गया। संकटादेवी मंदिर जहां स्थित है उस मोहल्ले का नाम भी संकटादेवी है। लोगों की इस प्राचीन देवी प्रतिमा में गहन आस्था है।
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मान्यता है कि मां संकटादेवी की उपासना करने से सभी संकट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। मां संकटादेवी की आराधना करने के बाद यहां लोग शुभ कार्यों की शुरुआत करते हैं। विवाह के बाद नववधुओं को मां के दर्शन के बाद ही घर में प्रवेश कराया जाता है।
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यहां शारदीय और वासंतिक नवरात्र के अलावा आषाढ़ मास में गुप्त नवरात्र पर भी मेला लगता है। कभी यहां देवी को पशु बलि देने की प्रथा थी, जो बाद में धीरे-धीरे समाप्त हो गई। मंदिर आज भी महेवा स्टेट के स्वामित्व में है। यूं तो यहां दर्शनार्थियों की पूरे साल भीड़ भाड़ रहती है। लोग बच्चों के मुंडन और अन्नप्रासन संस्कार कराते हैं। नवरात्र में यहां शहर के अलावा पूरे जिले और दूसरे जिले से श्रद्धालु आकर पूजा अर्चना करते हैं और मनौतियां मानते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने की थी मां संकटादेवी की स्थापना
मां संकटादेवी की यह प्राचीन प्रतिमा भगवान श्रीकृष्ण ने स्थापित की थी। महाभारत युद्ध के बाद भगवान कृष्ण, रुकमणि और पांडव पशुपतिनाथ दर्शन को जाते समय इसी रास्ते से होकर गुजरे थे। प्राचीन काल में यह क्षेत्र नैमिषारण्य क्षेत्र में आता था। यहां के रमणीक वन क्षेत्र को देख रुकमणि ने यहीं पर कुछ समय बिताने की इच्छा जताई तो भगवान श्रीकृष्ण उन्हें यहां प्रवास की अनुमति देकर पांडवों के साथ पशुपतिनाथ दर्शन के लिए नेपाल रवाना हो गए। लौटते समय भगवान कृष्ण ने महालक्ष्मी की पाषाण प्रतिमा बनाकर यहां स्थापित की और पांडवों के साथ भगवान कृष्ण ने भी उनकी विधिवत पूजा अर्चना की।
यह भी मान्यता है कि राजा वेन के यहां आदि शक्ति ने देवी के सात स्वरूपों ने सात कन्याओं के रूप में जन्म लिया था। उन्हीं में से महालक्ष्मी स्वरूपणी संकटादेवी यहां स्थापित और पूजित हैं। हालांकि इनका कोई पौराणिक उल्लेख शास्त्रों में नहीं मिलता है लेकिन यह प्रतिमा हजारों साल पुरानी है, इसकी पुष्टि इतिहास के विशेषज्ञ भी करते हैं।
हजारों साल बाद जब यहां आबादी बढ़ने लगी और जंगल कटे तो यह प्राचीन प्रतिमा प्रकट हुई। तत्कालीन महेवा स्टेट के शासकों ने दिव्य देवी प्रतिमा पाकर इसी स्थान पर एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया।
भूरे रंग के पत्थर की देवी प्रतिमा
प्राचीन संकटादेवी की प्रतिमा भूरे रंग के पत्थर की है। इस पर चांदी का कवच पहना कर मूर्ति को सुंदर आकृति प्रदान की गई है। मूर्ति मंदिर के गर्भगृह के अंदर सिंहासन पर विराजमान है। मंदिर का मुख्य द्वार पूरब की ओर है। दक्षिण दिशा में भी एक विशाल द्वार सुविधा के लिए बनाया गया है। मुख्य मंदिर के सामने विशाल बरामदा है, जिसमें यज्ञस्थल निर्मित है। मंदिर के चारों ओर छायादार प्रदक्षिणा पथ है। मंदिर विशाल प्रांगण में है। मंदिर परिसर में शिव, हनुमान मंदिर भी हैं।