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बैंक लिमिट कम होने से ईंट भट्ठा कारोबार चौपट
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
Updated Tue, 13 Dec 2016 11:07 PM IST
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भट्ठा
- फोटो : अमर उजाला
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नोटबंदी के बाद से बने हालात से ईंट बिक्री घटी
पांच फीसदी ईंट भट्ठा पर ही शुरू हो सकी पथाई
नोटबंदी के बाद बैंकों से रुपये निकालने की लिमिट कम किए जाने से ईंट भट्ठों का कारोबार भी प्रभावित हुआ है। मजदूरों को भुगतान देने के लिए भट्ठा स्वामियों के पास नकदी नहीं हैं। वहीं भट्ठों पर ईंट की बिक्री लगभग न के बराबर रह गई है। इन हालात में ईंट कारोबार बंदी की कगार पर है। एक भट्ठे पर मजदूरों को भुगतान के लिए सप्ताह में करीब चार लाख से अधिक रुपये की आवश्यकता है, लेकिन बैंक से 24 से 50 हजार रुपये प्रति सप्ताह मिल रहे हैं। इसमें भी अनिश्चितता का माहौल है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक इतना भुगतान भी नहीं कर पा रहीं हैं।
जिले में करीब 200 ईंट भट्ठे स्थापित हैं, जिनसे करीब 50 से 60 हजार मजदूर परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है। ज्यादातर भट्ठे ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित हैं, जिन पर आसपास के गांवों के अलावा पूर्वांचल से भी मजदूर काम करने आते हैं। इस बार इन्हें मजदूरी के लाले पड़ गए हैं, क्योंकि नोटबंदी के बाद कैश की किल्लत झेल रहे भट्ठा स्वामियों ने बाहर से आने वाले मजदूरों को वापस कर दिया या काम पर अभी बुलाया ही नहीं है। दूसरा पहलू यह है कि भट्ठों पर ईंट की बिक्री बिल्कुल न के बराबर रह गई हैं, क्योंकि आम नागरिकों के पास भी नकदी की समस्या आड़े आ रही है। ऐसे हालात में लोग किसी तरह खाने-पीने का सामान ही जुटा पा रहे हैं। सूत्रों की माने तो ईंटों की बिक्री न होने से मजदूरों को भुगतान देने के लिए परेशानी आड़े आ रही है। वहीं बैंकों से भी पर्याप्त कैश नहीं मिल रहा है।
चेक लेने को तैयार नहीं मजदूर
भट्ठों पर काम करने वाले मजदूर नकद भुगतान ही चाहते हैं। क्योंकि बैंकों के बाहर लंबी कतार और कैश न होने की शोहरत से मजदूर बैंक जाना नहीं चाहते हैं। तमाम मजदूरों के बैंक में खाते भी नहीं हैं।
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95 फीसदी भट्ठों पर काम ठप
जिले भर के 95 फीसदी भट्ठों पर इस सीजन में काम शुरू नहीं हो सका है। बैंक में भुगतान की लिमिट कम होने के चलते मजदूरों को देने के लिए पर्याप्त कैश नहीं मिल पा रहा है।
-डॉ नरेंद्र सिंह, अध्यक्ष, लखीमपुर ईंट निर्माता समिति
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पांच फीसदी ईंट भट्ठा पर ही शुरू हो सकी पथाई
नोटबंदी के बाद बैंकों से रुपये निकालने की लिमिट कम किए जाने से ईंट भट्ठों का कारोबार भी प्रभावित हुआ है। मजदूरों को भुगतान देने के लिए भट्ठा स्वामियों के पास नकदी नहीं हैं। वहीं भट्ठों पर ईंट की बिक्री लगभग न के बराबर रह गई है। इन हालात में ईंट कारोबार बंदी की कगार पर है। एक भट्ठे पर मजदूरों को भुगतान के लिए सप्ताह में करीब चार लाख से अधिक रुपये की आवश्यकता है, लेकिन बैंक से 24 से 50 हजार रुपये प्रति सप्ताह मिल रहे हैं। इसमें भी अनिश्चितता का माहौल है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक इतना भुगतान भी नहीं कर पा रहीं हैं।
जिले में करीब 200 ईंट भट्ठे स्थापित हैं, जिनसे करीब 50 से 60 हजार मजदूर परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है। ज्यादातर भट्ठे ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित हैं, जिन पर आसपास के गांवों के अलावा पूर्वांचल से भी मजदूर काम करने आते हैं। इस बार इन्हें मजदूरी के लाले पड़ गए हैं, क्योंकि नोटबंदी के बाद कैश की किल्लत झेल रहे भट्ठा स्वामियों ने बाहर से आने वाले मजदूरों को वापस कर दिया या काम पर अभी बुलाया ही नहीं है। दूसरा पहलू यह है कि भट्ठों पर ईंट की बिक्री बिल्कुल न के बराबर रह गई हैं, क्योंकि आम नागरिकों के पास भी नकदी की समस्या आड़े आ रही है। ऐसे हालात में लोग किसी तरह खाने-पीने का सामान ही जुटा पा रहे हैं। सूत्रों की माने तो ईंटों की बिक्री न होने से मजदूरों को भुगतान देने के लिए परेशानी आड़े आ रही है। वहीं बैंकों से भी पर्याप्त कैश नहीं मिल रहा है।
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चेक लेने को तैयार नहीं मजदूर
भट्ठों पर काम करने वाले मजदूर नकद भुगतान ही चाहते हैं। क्योंकि बैंकों के बाहर लंबी कतार और कैश न होने की शोहरत से मजदूर बैंक जाना नहीं चाहते हैं। तमाम मजदूरों के बैंक में खाते भी नहीं हैं।
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95 फीसदी भट्ठों पर काम ठप
जिले भर के 95 फीसदी भट्ठों पर इस सीजन में काम शुरू नहीं हो सका है। बैंक में भुगतान की लिमिट कम होने के चलते मजदूरों को देने के लिए पर्याप्त कैश नहीं मिल पा रहा है।
-डॉ नरेंद्र सिंह, अध्यक्ष, लखीमपुर ईंट निर्माता समिति