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मिर्ची के धुएं से घबराए हाथी, जंगल में भागे
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बांकेगंज/मैलानी (लखीमपुर खीरी)। नेपाल के शुक्ला फाटा नेशनल पार्क से आया हाथियों का एक दल दक्षिण खीरी वन प्रभाग के सहजनिया बीट तक जाकर लौट आया है। सहजनिया जंगल काफी छोटा है और चारों तरफ आबादी है। यहां उत्पाती जंगली हाथियों का रुकना इंसानों के लिए खतरे से खाली नहीं था। इसके मद्देनजर वन विभाग ने ड्रमों में तो ग्रामीणों ने कूड़े-करकट के ढ़ेर में आग जलाकर रात भर मिर्च का धुंआ किया। इससे घबराकर हाथी सोमवार सुबह एनएच 730 रोड पार कर बफरजोन की मैलानी रेंज के खरेहटा जंगल में आकर यहां पहले से आराम कर रहे हाथियों के दल में मिल गया है। उधर हाथियों का तीसरा झुंड किशनपुर सेंक्चुरी की मैलानी रेंज (वन्यजीव विहार) के घने जंगलों में गुम है। वन विभाग को इस झुंड की लोकेशन नहीं मिल पा रही है।
छह दिन पहले शारदा नदी पार कर नेपाल के शुक्ला फाटा नेशनल पार्क से आए जंगली हाथी वन विभाग के लिए मुसीबत बनते जा रहे हैं। छुपे रुस्तम की तरह एक से दूसरे जंगल में आवाजाही लगाए यह हाथी अफसरों को खूब छका रहे हैं। लगातार जान-जोखिम में डालकर हाथियों की निगरानी कर पाना वन कर्मियों और अधिकारियों के लिए मुश्किल हो रहा है। उधर हाथी लगातार वन विभाग को चकमा देकर अपने ठिकाने और रास्ते बदल रहे हैं। 30 हाथियों का यह झुंड तीन हिस्सों में बंटकर अलग-अलग रुख करते हैं, तो कभी एक साथ आकर उत्पात मचाना शुरू कर देते हैं। अब तक हाथी कम से कम 15-20 एकड़ धान और गन्ने की फसलें रौंद चुके हैं। जंगल के आसपास बसे लोग खेेतों की ओर जाने से डर रहे हैं।
इन नेपाल कें जंगली हाथियों की मौजूदगी से किशनपुर सेंक्चुरी और डीटीआर बफरजोन के आसपास बसे इलाकों में मानव-बाघ संघर्ष के साथ-साथ हाथी-मानव संघर्ष दस्तक देने लगा है। वन विभाग भले ही हाथियों के आने से परेशान हो, दूसरी तरफ अधिकारी इस बात को लेकर भी खुश हैं कि जंगल में मौजूद हाथियों की वजह से जंगल की सुरक्षा स्वत: हो रही है। वन विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि जंगल में हाथियों की मौजूदगी के चलते चोरी से पेड़ काटने वाले, धरती के फूल बीनने वाले और शिकारी जंगल में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। वन विभाग का यह प्रयास है कि हाथी जंगल से बाहर की तरफ अपना रुख न करने पाएं। इसके लिए ग्रामीणों को जागरूक करने के साथ प्रशिक्षित भी किया जा रहा है।
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हाथियों में गजब की होती है संवाद शक्ति
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि हाथियों में गजब की संवाद शक्ति होती है। यह 100 किलोमीटर दूर रह रहे अपने साथियों को अपना संवाद पहुंचा सकते हैं। कहा इंसान तो जीपीएस सिस्टम की अब खोज कर पाए हैं, जबकि हाथियों के यह जन्मजात होता है। हाथी जब अपने साथियों को बुलाते हैं तब यह हाथी उसी जगह पहुंच जाते हैं, जहां उनके साथी मौजूद होते हैं।
नेपाल से आए हाथियों का एक झुंड रविवार को मोहम्मदी रेंज की सहजनिया बीट जंगल में पहुंचा था। जहां से सोमवार भोर लौटकर वापस फिर मैलानी रेंज के खरेहटा जंगल में आ गया है। किशनपुर सेंक्चुरी की मैलानी रेंज (वन्यजीव विहार) में मौजूद हाथियों के झुंड की लोकेशन नहीं मिल रही है। हाथियों की लगातार निगरानी की जा रही है।
- डॉ. अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन।
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छह दिन पहले शारदा नदी पार कर नेपाल के शुक्ला फाटा नेशनल पार्क से आए जंगली हाथी वन विभाग के लिए मुसीबत बनते जा रहे हैं। छुपे रुस्तम की तरह एक से दूसरे जंगल में आवाजाही लगाए यह हाथी अफसरों को खूब छका रहे हैं। लगातार जान-जोखिम में डालकर हाथियों की निगरानी कर पाना वन कर्मियों और अधिकारियों के लिए मुश्किल हो रहा है। उधर हाथी लगातार वन विभाग को चकमा देकर अपने ठिकाने और रास्ते बदल रहे हैं। 30 हाथियों का यह झुंड तीन हिस्सों में बंटकर अलग-अलग रुख करते हैं, तो कभी एक साथ आकर उत्पात मचाना शुरू कर देते हैं। अब तक हाथी कम से कम 15-20 एकड़ धान और गन्ने की फसलें रौंद चुके हैं। जंगल के आसपास बसे लोग खेेतों की ओर जाने से डर रहे हैं।
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इन नेपाल कें जंगली हाथियों की मौजूदगी से किशनपुर सेंक्चुरी और डीटीआर बफरजोन के आसपास बसे इलाकों में मानव-बाघ संघर्ष के साथ-साथ हाथी-मानव संघर्ष दस्तक देने लगा है। वन विभाग भले ही हाथियों के आने से परेशान हो, दूसरी तरफ अधिकारी इस बात को लेकर भी खुश हैं कि जंगल में मौजूद हाथियों की वजह से जंगल की सुरक्षा स्वत: हो रही है। वन विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि जंगल में हाथियों की मौजूदगी के चलते चोरी से पेड़ काटने वाले, धरती के फूल बीनने वाले और शिकारी जंगल में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। वन विभाग का यह प्रयास है कि हाथी जंगल से बाहर की तरफ अपना रुख न करने पाएं। इसके लिए ग्रामीणों को जागरूक करने के साथ प्रशिक्षित भी किया जा रहा है।
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हाथियों में गजब की होती है संवाद शक्ति
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि हाथियों में गजब की संवाद शक्ति होती है। यह 100 किलोमीटर दूर रह रहे अपने साथियों को अपना संवाद पहुंचा सकते हैं। कहा इंसान तो जीपीएस सिस्टम की अब खोज कर पाए हैं, जबकि हाथियों के यह जन्मजात होता है। हाथी जब अपने साथियों को बुलाते हैं तब यह हाथी उसी जगह पहुंच जाते हैं, जहां उनके साथी मौजूद होते हैं।
नेपाल से आए हाथियों का एक झुंड रविवार को मोहम्मदी रेंज की सहजनिया बीट जंगल में पहुंचा था। जहां से सोमवार भोर लौटकर वापस फिर मैलानी रेंज के खरेहटा जंगल में आ गया है। किशनपुर सेंक्चुरी की मैलानी रेंज (वन्यजीव विहार) में मौजूद हाथियों के झुंड की लोकेशन नहीं मिल रही है। हाथियों की लगातार निगरानी की जा रही है।
- डॉ. अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन।