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शक के दायरे में गांवों से भेजी गई जांच रिपोर्ट
अमर उजाला ब्यूरो/लखीमपुर खीरी।
Updated Tue, 14 Jun 2016 11:50 PM IST
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water
- फोटो : amar ujala
- मनमाने ढंग से अंकित कर दी आर्सेनिक की रिपोर्ट
- 2013 में प्रत्येक ग्राम पंचायत को दी गई थी टेस्ट किट
- हैंडपंपों की जांच के नतीजे नहीं हो सके सार्वजनिक
राज्य पेयजल एवं स्वच्छता मिशन के तहत ग्राम पंचायतों में लगे हैंडपंपों के पेयजल गुणवत्ता की जांच वर्ष 2013-14 में कराई गई थी, जिसकी रिपोर्ट अभी फाइलों में ही कैद है। वजह यह है कि गांवों से ब्लाकों के माध्यम से प्राप्त रिपोर्ट शक के दायरे में आ चुकी है, क्योंकि पानी की जांच करने वाले कर्मचारियों ने मनमाने ढंग से तैैयार की गई रिपोर्ट में खामियों ने कलई खोल दी हैै। फील्ड टेस्टिंग किट (एफटीके) में आर्सेनिक की जांच करने का कोई रसायन नहीं था, फिर भी तमाम रिपोर्ट में आर्सेनिक की मात्रा अंकित कर दी गई।
बता दें कि हैंडपंप के पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित कराने के लिए जिला पेयजल एवं स्वच्छता मिशन का वर्ष 2012 में कार्यालय खोला गया, जिसमें नए स्टाफ की तैनाती भी की गई। ताकि गांवों में पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित कराते हुए खराब हैंडपंपों को चिह्नित किया जा सके। 2013 में इस कार्य के लिए 995 ग्राम पंचायतों को रासायनिक जांच के लिए फील्ड टेस्टिंग किट और जैविक जांच के लिए हाईड्रोजन सल्फाइड का वायल दिया गया था। जांच करने के लिए रोजगार सेवक समेत कर्मचारियों-अधिकारियों को विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण दिया था। किट के माध्यम से जल में टरबीडिटी, पीएच, हार्डनेस, क्लोराइड, आयरन, फ्लोराइड, नाइट्रेट, अवशिष्ट क्लोरीन और एचटूएस के वायल से जैविक जांच की जानी थी। ग्राम पंचायतों के हैंडपंपों की जांच करने के लिए मुख्यता रोजगार सेवकों को जिम्मेदारी सौैंपी गई थी, जिन्हें प्रति हैंडपंप 10 रुपये का भुगतान भी दिया गया है।
जांच रिपोर्ट में उठ रहे सवाल
गांवों से भेजी गई रिपोर्ट में अलग-अलग हैंडपंपों की जांच में पाए गए तत्वों की मात्रा एक जैसी ही अंकित की गई है। मसलन बेहजम ब्लाक की ग्राम पंचायत रारी में छह हैैंडपंपों की जांच रिपोर्ट में जांचकर्ता ने सामान्य कैटेगिरी के मुताबिक ही एक जैसी मात्रा लिखी है। इसके अलावा हैंडपंप की भौतिक रिपोर्ट में सब कुछ ओके दर्शाया गया है। इससे जांच रिपोर्ट संदिग्ध प्रतीत हो रही है। जबकि अधिकांश हैंडपंपों के आसपास कई खामियां मिल जाएंगी। शहर में कलक्ट्रेट के पीछे मस्जिद के पास लगा हैंडपंप अर्से से खराब है, जिसकी कई शिकायतों के बाद भी मरम्मत नहीं कराई गई।
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आर्सेनिक की कैसे दे दी रिपोर्ट
मोहम्मदी की ग्राम पंचायत बैदा की जल जांच रिपोर्ट में आर्सेनिक की मात्रा 0.02 मिग्रा दर्शाई गई है। जबकि ग्राम पंचायतों को दी गई फील्ड टेस्ट किट में आर्सेनिक की जांच के लिए कोई रसायन दिया ही नहीं गया। इससे भी इन रिपोर्ट्स की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ चुकी है।
लाखों खर्च के बाद भी नतीजा सिफर
जिला पेयजल एवं स्वच्छता मिशन के तहत पेयजल की गुणवत्ता जांच के नाम पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाए गए, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला है। मसलन जिले में कितने हैंडपंप की जांच हुई और नतीजों में कितने हैंडपंप दूषित पाए गए? इसके आंकड़े विभागीय अधिकारियों के पास नहीं हैै। जिला सलाहकार रामनरेश ने बताया कि ब्लाकों से जांच रिपोर्ट देर से प्राप्त हुई थी। इसलिए अभी संकलित रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी।
गांवों में जल की गुणवत्ता जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन रिपोर्ट में कई खामियां पाई गईं है। तत्कालीन अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। 2013 के बाद से गांवों को फील्ड टेस्टिंग किट नहीं दी गई हैं, जिससे पुन: जांच नहीं कराई जा सकी है।
- अनिल कुमार सिंह, जिला विकास अधिकारी
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- 2013 में प्रत्येक ग्राम पंचायत को दी गई थी टेस्ट किट
- हैंडपंपों की जांच के नतीजे नहीं हो सके सार्वजनिक
राज्य पेयजल एवं स्वच्छता मिशन के तहत ग्राम पंचायतों में लगे हैंडपंपों के पेयजल गुणवत्ता की जांच वर्ष 2013-14 में कराई गई थी, जिसकी रिपोर्ट अभी फाइलों में ही कैद है। वजह यह है कि गांवों से ब्लाकों के माध्यम से प्राप्त रिपोर्ट शक के दायरे में आ चुकी है, क्योंकि पानी की जांच करने वाले कर्मचारियों ने मनमाने ढंग से तैैयार की गई रिपोर्ट में खामियों ने कलई खोल दी हैै। फील्ड टेस्टिंग किट (एफटीके) में आर्सेनिक की जांच करने का कोई रसायन नहीं था, फिर भी तमाम रिपोर्ट में आर्सेनिक की मात्रा अंकित कर दी गई।
बता दें कि हैंडपंप के पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित कराने के लिए जिला पेयजल एवं स्वच्छता मिशन का वर्ष 2012 में कार्यालय खोला गया, जिसमें नए स्टाफ की तैनाती भी की गई। ताकि गांवों में पेयजल की गुणवत्ता सुनिश्चित कराते हुए खराब हैंडपंपों को चिह्नित किया जा सके। 2013 में इस कार्य के लिए 995 ग्राम पंचायतों को रासायनिक जांच के लिए फील्ड टेस्टिंग किट और जैविक जांच के लिए हाईड्रोजन सल्फाइड का वायल दिया गया था। जांच करने के लिए रोजगार सेवक समेत कर्मचारियों-अधिकारियों को विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण दिया था। किट के माध्यम से जल में टरबीडिटी, पीएच, हार्डनेस, क्लोराइड, आयरन, फ्लोराइड, नाइट्रेट, अवशिष्ट क्लोरीन और एचटूएस के वायल से जैविक जांच की जानी थी। ग्राम पंचायतों के हैंडपंपों की जांच करने के लिए मुख्यता रोजगार सेवकों को जिम्मेदारी सौैंपी गई थी, जिन्हें प्रति हैंडपंप 10 रुपये का भुगतान भी दिया गया है।
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जांच रिपोर्ट में उठ रहे सवाल
गांवों से भेजी गई रिपोर्ट में अलग-अलग हैंडपंपों की जांच में पाए गए तत्वों की मात्रा एक जैसी ही अंकित की गई है। मसलन बेहजम ब्लाक की ग्राम पंचायत रारी में छह हैैंडपंपों की जांच रिपोर्ट में जांचकर्ता ने सामान्य कैटेगिरी के मुताबिक ही एक जैसी मात्रा लिखी है। इसके अलावा हैंडपंप की भौतिक रिपोर्ट में सब कुछ ओके दर्शाया गया है। इससे जांच रिपोर्ट संदिग्ध प्रतीत हो रही है। जबकि अधिकांश हैंडपंपों के आसपास कई खामियां मिल जाएंगी। शहर में कलक्ट्रेट के पीछे मस्जिद के पास लगा हैंडपंप अर्से से खराब है, जिसकी कई शिकायतों के बाद भी मरम्मत नहीं कराई गई।
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आर्सेनिक की कैसे दे दी रिपोर्ट
मोहम्मदी की ग्राम पंचायत बैदा की जल जांच रिपोर्ट में आर्सेनिक की मात्रा 0.02 मिग्रा दर्शाई गई है। जबकि ग्राम पंचायतों को दी गई फील्ड टेस्ट किट में आर्सेनिक की जांच के लिए कोई रसायन दिया ही नहीं गया। इससे भी इन रिपोर्ट्स की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ चुकी है।
लाखों खर्च के बाद भी नतीजा सिफर
जिला पेयजल एवं स्वच्छता मिशन के तहत पेयजल की गुणवत्ता जांच के नाम पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाए गए, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला है। मसलन जिले में कितने हैंडपंप की जांच हुई और नतीजों में कितने हैंडपंप दूषित पाए गए? इसके आंकड़े विभागीय अधिकारियों के पास नहीं हैै। जिला सलाहकार रामनरेश ने बताया कि ब्लाकों से जांच रिपोर्ट देर से प्राप्त हुई थी। इसलिए अभी संकलित रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी।
गांवों में जल की गुणवत्ता जांच पूरी हो चुकी है, लेकिन रिपोर्ट में कई खामियां पाई गईं है। तत्कालीन अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। 2013 के बाद से गांवों को फील्ड टेस्टिंग किट नहीं दी गई हैं, जिससे पुन: जांच नहीं कराई जा सकी है।
- अनिल कुमार सिंह, जिला विकास अधिकारी