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काम धंधा यहीं मिलेगा तो कभी नहीं जाएंगे अपना गांव-घर छोड़कर

Sun, 07 Jun 2020 01:28 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 07 Jun 2020 01:28 AM IST
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If you get work here, you will never leave your village and home
लखीमपुर खीरी/बांकेगंज। कर्मभूमि चाहे जितनी सुखद और सुविधाजनक क्यों न हो, संकट के समय अपनी जन्मभूमि ही याद आती है। कोरोना संक्रमण के इस संकटकाल में देश के दूर-दराज शहरों में काम करने वाले प्रवासी श्रमिकों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। रोजी-रोटी के लिए उन्होंने जिन शहरों को अपनी कर्मभूमि बनाया था, मुसीबत के समय उन्हीं शहरों ने दगा दे दिया। अब वहां से अपने गांव-घर लौटकर उन्होंने राहत की सांस ली है। उनका कहना है कि अब यहीं काम-धंधा मिलता रहा तो रूखी-सूखी खाएंगे पर अपना गांव-घर छोड़कर बाहर कभी नहीं जाएंगे।
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लॉकडाउन लगने पर बड़े शहरों में फंसे सैकड़ों मजदूरों के सामने जब खाने-पीने और रहने का संकट पैदा हुआ तो जिसको जो साधन मिला उसी साधन से वे अपने गांवों की ओर लौट चले। जिन्हें कुछ नहीं मिला उन्होंने पैदल ही हजारों किलोमीटर लंबी सड़क नाप डाली। पत्नी, मासूम बच्चों और जरूरत के गृहस्थी के सामान को कंधों पर लादकर भले ही उनका यह सफर काफी मुश्किलों से भरा रहा हो, लेकिन गांव की डगर पर पहुंचते ही अपने गांव की ठंडी बयार के झोंकों ने उनकी सारी थकान मिटा दी। घर पहुंचकर उन्हें लगा कि जैसे अपनी मां की गोद में पहुंच गए हों, अब अधिकतर ने अपना गांव-घर छोड़कर न जाने की ठान ली है।
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फोटो- 06एलकेएच502
बांकेगंज कस्बे के निकट गंगापुर गांव निवासी प्रवासी श्रमिक नरायन का कहना है कि वे रोजगार की तलाश में परिवार समेत हरियाणा गए थे। लॉकडाउन में रोजगार ठप होने पर उनकी कमाई का जरिया भी बंद हो गया। बचत किए गए पैसों से कुछ दिनों तक काम चला, इसके बाद रहने और खाने-पीने का संकट पैदा हो गया। साधन न मिलने पर उन्होंने परिवार समेत पैदल सैकड़ों किलोमीटर सफर तय किया और आठ दिन बाद घर पहुंचे। उनका कहना है कि यहां मनरेगा से काम मिल गया है, काम धंधा मिलता रहे, चाहे कम पैसा मिले अपना गांव या घर नहीं छोड़ेंगे।
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फोटो- 06एलकेएच503
गांव गंगापुर के ही रामनरेश का कहना है कि वे परिवार समेत कमाई को दिल्ली गए थे। लॉकडाउन के बाद फैक्टरी बंद होने से वे बेरोजगार हो गए। करीब 20-25 दिन उन्होंने जैसे-तैसे बिताए। इसके बाद कमाए गए पैसे भी खत्म हो गए। जब घर आने के लिए कोई साधन नहीं मिला तो परिवार समेत पैदल ही आठ दिन बाद घर पहुंचे। उन्होंने कहा कि अब यहीं काम करेंगे, चाहे कम पैसा मिले उसी से काम चलाएंगे और अब परदेस जाने की नहीं सोचेंगे।
फोटो- 06एलेएच504
रामगोपाल ने कहा कि ऐसी बंदी कभी नहीं देखी। होली के बाद परिवार समेत हरियाणा की एक फैक्टरी में काम करने गए थे। लॉकडाउन के बाद फैक्टरी बंद होने से वे बेरोजगार हो गए। एक माह तक घर आने के लिए हाथ-पांव मारते रहें, लेकिन कोई साधन न मिलने पर दिन-रात भूखे-प्यासे पैदल चलकर घर पहुंचे। अब यहीं मनरेगा के तहत मिले काम को कर रहे हैं। काम-धंधा मिलता रहा तो यहीं काम करेंगे, बाहर जाने की कभी नहीं सोचेंगे।

फोटो- 06एलकेएच505
राधेश्याम का कहना है कि हरियाणा में मजदूरी करने गए थे। कोरोना संक्रमण के चलते मार्च के आखिरी सप्ताह में देश में लॉकडाउन हो गया। इसके बाद बमुश्किल पैदल घर पहुंचे। अब गांव के सभी प्रवासी श्रमिक मनरेगा के जरिए खुदाई किए जाने तालाबों, चकरोडों पर काम की तलाश दोपहर में ही परिवार के साथ पहुंच जाते हैं। बुरे वक्त में अपनी जन्म भूमि ही काम आई। जब गांव में काम मिल रहा है तो अब किसी हाल में परदेस नहीं जाएंगे।
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