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होली पर थारू महीने भर करते हैं मस्ती
बेलरायां
Updated Tue, 10 Mar 2015 05:46 PM IST
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रंग और उमंग का त्योहार होली बीते चार दिन गुजर चुके हैं, लेकिन जंगल में बसे थारू गांवों में एक-दूसरे को रंग से सराबोर करने का दौर अभी थमा नहीं है। दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों में सदियों से आबाद आदिवासी होली पूरे एक माह तक जोशो-खरोश के साथ मनाते हैं। इस बीच पारंपरिक लोक नृत्य, लोकगीतों के साथ रंग गुलाल चलता है।
तहसील निघासन का एक बड़ा भाग उत्तर खीरी वन प्रभाग और दुधवा नेशनल पार्क के सघन वनों से आच्छादित है। इन जंगलों के बीच सदियों से आदिवासी थारू जनजाति के लोग रह रहे हैं। आधुनिक बयार से यद्यपि अब इन थारूओं के तन और मन अछूते नही रह गए हैं। अपने को महाराणा प्रताप का वंशज कहलाने वाले यह थारू अब भी प्राचीन परंपराओं, रूढ़ियों और अंधविश्वासों से बंधे हुए है। इनमें चार त्योहार इन्हीं की भाषा में चराई, कजरी तीज, देवारी और होरी के नाम से प्रमुख हैं।
होली के मौके पर थारू जांड मंदिरा पीने के बाद सिंधरा (मछली) खाते हैं। इस तरह थारू करीब एक माह तक होली मनाते हैं। अपनी परंपरागत आकर्षक पोशाक में थारू महिलाएं और पुरुष टोली बनाकर ढोलक, मृदंग, झांझ आदि वाद्ययंत्रों पर लुभावने होली गीत गाकर लोकनृत्य करते हैं। अपनी सीधी सरल भाषा में जब यह थारू होली गीत गाते हैं, तो देखने-सुनने वाले लोग भी थिरक उठते हैं।
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थारू नवयुवक और नवयुवतियां अपनी विशिष्ट वेशभूषा में शृंगार रस से पगे विभिन्न भाव भरे गीत गाते हुए ढोल एवं मृदंग की थाप पर नृत्य करते हैं। इनके ढोलक बजाने का ढंग और हाथ में मोरपंख या रूमाल लेकर नृत्य करते समय उनकी भाव भंगिमाएं मनोरम एवं रोचक लगती हैं।
होली के मौके पर थारू नवविवाहिताएं भी अपने मायके आ जाती हैं और अपनी पुरानी सखी सहेलियों के साथ दिल खोलकर होली खेलतीं हैं। होली पर जहां एक दूसरे पर जमकर रंग डालने की प्रथा है, वहीं होली पर घरों की विशेष सफाई, पुताई, रंगाई की जाती है।
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तहसील निघासन का एक बड़ा भाग उत्तर खीरी वन प्रभाग और दुधवा नेशनल पार्क के सघन वनों से आच्छादित है। इन जंगलों के बीच सदियों से आदिवासी थारू जनजाति के लोग रह रहे हैं। आधुनिक बयार से यद्यपि अब इन थारूओं के तन और मन अछूते नही रह गए हैं। अपने को महाराणा प्रताप का वंशज कहलाने वाले यह थारू अब भी प्राचीन परंपराओं, रूढ़ियों और अंधविश्वासों से बंधे हुए है। इनमें चार त्योहार इन्हीं की भाषा में चराई, कजरी तीज, देवारी और होरी के नाम से प्रमुख हैं।
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होली के मौके पर थारू जांड मंदिरा पीने के बाद सिंधरा (मछली) खाते हैं। इस तरह थारू करीब एक माह तक होली मनाते हैं। अपनी परंपरागत आकर्षक पोशाक में थारू महिलाएं और पुरुष टोली बनाकर ढोलक, मृदंग, झांझ आदि वाद्ययंत्रों पर लुभावने होली गीत गाकर लोकनृत्य करते हैं। अपनी सीधी सरल भाषा में जब यह थारू होली गीत गाते हैं, तो देखने-सुनने वाले लोग भी थिरक उठते हैं।
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थारू नवयुवक और नवयुवतियां अपनी विशिष्ट वेशभूषा में शृंगार रस से पगे विभिन्न भाव भरे गीत गाते हुए ढोल एवं मृदंग की थाप पर नृत्य करते हैं। इनके ढोलक बजाने का ढंग और हाथ में मोरपंख या रूमाल लेकर नृत्य करते समय उनकी भाव भंगिमाएं मनोरम एवं रोचक लगती हैं।
होली के मौके पर थारू नवविवाहिताएं भी अपने मायके आ जाती हैं और अपनी पुरानी सखी सहेलियों के साथ दिल खोलकर होली खेलतीं हैं। होली पर जहां एक दूसरे पर जमकर रंग डालने की प्रथा है, वहीं होली पर घरों की विशेष सफाई, पुताई, रंगाई की जाती है।