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Lakhimpur Kheri News: 1857 की याद में अलीगंज में दूसरे दिन खेली जाती है होली
Sun, 01 Mar 2026 11:17 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Sun, 01 Mar 2026 11:17 PM IST
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राम प्रकाश शुक्ला पूर्व प्रधान
- फोटो : संवाद
अलीगंज। कस्बा अलीगंज में होली की परंपरा कुछ अलग है। यहां रंग खेलने की रस्म मुख्य होली के अगले दिन निभाई जाती है। बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की एक ऐतिहासिक घटना से जुड़ी है, जब रंग वाले दिन अंग्रेजों से संघर्ष हुआ था। उसी की स्मृति में यहां दूसरे दिन रंग खेला जाता है।
त्योहार के अवसर पर स्व. मुकुंदरम शुक्ला (राजा साहब) के आवास पर लोग एकत्रित होते हैं। यहां ठंडाई का दौर चलता है और सामूहिक रूप से ‘धमाल’ निकाली जाती है। यह धमाल रामप्रकाश के घर से शुरू होकर पूरे गांव में होती हुई होलिका स्थल तक पहुंचती है।
ग्रामीण ढोल, मंजीरा और पारंपरिक ‘लिली घोड़ी’ के साथ होली गीत गाते हुए जुलूस की शक्ल में चलते हैं। होलिका स्थल की परिक्रमा के बाद लोग धूली वंदन कर एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर गले मिलते हैं।
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अलीगंज निवासी विष्णु कुमार मिश्र बताते हैं कि पहले अलीगंज, सरांय, रमुआपुर और कुसमौरी गांवों के लोग एकत्र होकर यहीं रंग खेलते थे। अंग्रेजी शासन के दौरान 1857 में रंग वाले दिन ही युद्ध हुआ, जिसके बाद परंपरा बदल दी गई।
विद्यासागर दीक्षित के अनुसार 1857 में प्राचीन हनुमान मंदिर पर मूर्ति खंडित करने का प्रयास किया गया था। खंडित मूर्ति आज भी मंदिर में सुरक्षित है। यह घटना भी रंग वाले दिन की ही है, तभी से अलीगंज में दूसरे दिन रंग खेलने की परंपरा चली आ रही है। संवाद
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त्योहार के अवसर पर स्व. मुकुंदरम शुक्ला (राजा साहब) के आवास पर लोग एकत्रित होते हैं। यहां ठंडाई का दौर चलता है और सामूहिक रूप से ‘धमाल’ निकाली जाती है। यह धमाल रामप्रकाश के घर से शुरू होकर पूरे गांव में होती हुई होलिका स्थल तक पहुंचती है।
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ग्रामीण ढोल, मंजीरा और पारंपरिक ‘लिली घोड़ी’ के साथ होली गीत गाते हुए जुलूस की शक्ल में चलते हैं। होलिका स्थल की परिक्रमा के बाद लोग धूली वंदन कर एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर गले मिलते हैं।
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अलीगंज निवासी विष्णु कुमार मिश्र बताते हैं कि पहले अलीगंज, सरांय, रमुआपुर और कुसमौरी गांवों के लोग एकत्र होकर यहीं रंग खेलते थे। अंग्रेजी शासन के दौरान 1857 में रंग वाले दिन ही युद्ध हुआ, जिसके बाद परंपरा बदल दी गई।
विद्यासागर दीक्षित के अनुसार 1857 में प्राचीन हनुमान मंदिर पर मूर्ति खंडित करने का प्रयास किया गया था। खंडित मूर्ति आज भी मंदिर में सुरक्षित है। यह घटना भी रंग वाले दिन की ही है, तभी से अलीगंज में दूसरे दिन रंग खेलने की परंपरा चली आ रही है। संवाद

राम प्रकाश शुक्ला पूर्व प्रधान- फोटो : संवाद