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हिंदी को मिलना चाहिए राष्ट्रभाषा का दर्जा
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लखीमपुर खीरी। हिंदी सिर्फ भाषा तक ही सीमित नहीं है बल्कि आम लोगों के दिलों में एक खास जगह बनाए हुए है। आपसी संवाद में मधुरता को स्थापित करने के लिए हिंदी एक बेहतर व सुलझा हुआ माध्यम है। यही वजह है कि जनमानस में भावनात्मक रिश्तों को स्थापित करने के लिए लोग बोलचाल में हिंदी का इस्तेमाल करते हैं। बावजूद इसके हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन सकी है। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहिए।
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हिंदी को अब तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका है। हिंदी सिर्फ राजभाषा ही बनकर रह गई है जो बड़े दुख की बात है। देश की करीब 80 प्रतिशत से अधिक आबादी हिंदी बोलती है और समझती है। इसके बावजूद हिंदी भाषा भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रभाषा बनने के लिए तरस रही है। इससे ज्यादा खेद की बात हम लोगों के लिए क्या होगी। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले संविधान द्वारा इसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया जाए और फिर रोजगार से लेकर व्यापार में इसे अनिवार्य किया जाए।
-देशराज वर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी, युवराजदत्त महाविद्यालय लखीमपुर
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एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ देश की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है। बहुत सरल, सहज और सुगम भाषा होने के साथ हिंदी विश्व की संभवत: पहली वैज्ञानिक भाषा है जिसे दुनिया भर में समझने, बोलने और चाहने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। विश्व में यह तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है जो हमारे पारंपरिक ज्ञान, प्राचीन सभ्यता और आधुनिक प्रगति के बीच एक सेतु भी है। मगर, इसके बावजूद आज हिंदी भाषा उपेक्षित है। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि इसे सरकारी और निजी कार्यालयों में पूर्ण रूप से अनिवार्य कर रोजगार व कारोबार से जोड़ा जाए।
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-डॉ. आरके जायसवाल, रिटायर्ड डीआईओएस
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हिंदी को अब तक राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल सका है। हिंदी सिर्फ राजभाषा ही बनकर रह गई है जो बड़े दुख की बात है। देश की करीब 80 प्रतिशत से अधिक आबादी हिंदी बोलती है और समझती है। इसके बावजूद हिंदी भाषा भारतीय संविधान द्वारा राष्ट्रभाषा बनने के लिए तरस रही है। इससे ज्यादा खेद की बात हम लोगों के लिए क्या होगी। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले संविधान द्वारा इसे राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया जाए और फिर रोजगार से लेकर व्यापार में इसे अनिवार्य किया जाए।
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-देशराज वर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर हिंदी, युवराजदत्त महाविद्यालय लखीमपुर
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एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ देश की पहचान है बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है। बहुत सरल, सहज और सुगम भाषा होने के साथ हिंदी विश्व की संभवत: पहली वैज्ञानिक भाषा है जिसे दुनिया भर में समझने, बोलने और चाहने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। विश्व में यह तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है जो हमारे पारंपरिक ज्ञान, प्राचीन सभ्यता और आधुनिक प्रगति के बीच एक सेतु भी है। मगर, इसके बावजूद आज हिंदी भाषा उपेक्षित है। हिंदी को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है कि इसे सरकारी और निजी कार्यालयों में पूर्ण रूप से अनिवार्य कर रोजगार व कारोबार से जोड़ा जाए।
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-डॉ. आरके जायसवाल, रिटायर्ड डीआईओएस