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ज्ञानपुर की गीता बनी वीरांगना, गांव में खुशी
महेवागंज खीरी
Updated Tue, 31 Mar 2015 12:25 AM IST
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ज्ञानपुर की गीता इन दिनों चर्चा में हैं। रविवार को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथों रानी लक्ष्मी बाई वीरता पुरस्कार से नवाजी गईं गीता यहां की असली वीरांगना हैं। गांव के बच्चे और महिलाएं इन्हें अचार वाली दीदी के नाम से पुकारते हैं। स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के जरिए मुकाम हासिल करने वाली गीता मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह की मुखिया हैं। करीब बारह महिलाएं इसमें सक्रिय सदस्य हैं।
गीता को पुरस्कार मिलने की खबर मात्र से ही पूरा गांव झूम उठा। गीता अभी घर भले ही न पहुंची हों पर गांव में खुशी का माहौल है। समूह से जुड़ी महिलाओं ने सोमवार को एक दूसरे को मिठाई खिलाकर जश्न मनाया। गांव की पतली गली और छप्पर वाले अपने घर में तैयार अचार, जैम और मुरब्बा जैसे उत्पादों की देश-प्रदेश में खुशबू बिखेरने वाली पांच बच्चों की मां गीता समूह की महिलाओं को भी उतना ही श्रेय देती हैं।
वर्षों से स्वयं सहायता समूह की हैं मुखिया
करीब पंद्रह वर्ष से वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। समूह के सदस्यों ने बैंक से कर्ज लेकर भैंस पालन शुरू किया था। डेयरी से आमदनी भी हुई इससे बैंक का कर्जा अदा हुआ। समूह की सदस्य रामदेवी ने बताया कि गीता दी ने इसके बाद कुछ अलग करने की ठानी। अचार, मुरब्बा बनाने की हमें ट्रेनिंग दी। सभी ने मिलकर हाथ बंटाया और आज उसका फल सब के सामने है।
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पुत्र वधू भी बंटाती है हाथ
मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह से जुड़ी रामदेवी, माया देवी, सुनीता, रामप्यारी, राधाश्री जैसी कई महिलाओं के परिश्रम और लगन की बदौलत आज गांव का नाम रोशन हुआ है। सदस्यों की माने तो गीता की पुत्रवधू मंजू देवी की मेहनत भी रंग लाई है। वह घर की देखभाल के साथ अपनी सास का भी हाथ बंटाती है।
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गीता को पुरस्कार मिलने की खबर मात्र से ही पूरा गांव झूम उठा। गीता अभी घर भले ही न पहुंची हों पर गांव में खुशी का माहौल है। समूह से जुड़ी महिलाओं ने सोमवार को एक दूसरे को मिठाई खिलाकर जश्न मनाया। गांव की पतली गली और छप्पर वाले अपने घर में तैयार अचार, जैम और मुरब्बा जैसे उत्पादों की देश-प्रदेश में खुशबू बिखेरने वाली पांच बच्चों की मां गीता समूह की महिलाओं को भी उतना ही श्रेय देती हैं।
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वर्षों से स्वयं सहायता समूह की हैं मुखिया
करीब पंद्रह वर्ष से वह स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं। समूह के सदस्यों ने बैंक से कर्ज लेकर भैंस पालन शुरू किया था। डेयरी से आमदनी भी हुई इससे बैंक का कर्जा अदा हुआ। समूह की सदस्य रामदेवी ने बताया कि गीता दी ने इसके बाद कुछ अलग करने की ठानी। अचार, मुरब्बा बनाने की हमें ट्रेनिंग दी। सभी ने मिलकर हाथ बंटाया और आज उसका फल सब के सामने है।
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पुत्र वधू भी बंटाती है हाथ
मां दुर्गा स्वयं सहायता समूह से जुड़ी रामदेवी, माया देवी, सुनीता, रामप्यारी, राधाश्री जैसी कई महिलाओं के परिश्रम और लगन की बदौलत आज गांव का नाम रोशन हुआ है। सदस्यों की माने तो गीता की पुत्रवधू मंजू देवी की मेहनत भी रंग लाई है। वह घर की देखभाल के साथ अपनी सास का भी हाथ बंटाती है।