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हाथियों की चिंघाड़ से दुधवा पार्क गुलजार पर किसान हो रहे तबाह

Thu, 12 Aug 2021 12:42 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 12 Aug 2021 12:42 AM IST
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Farmers are being devastated at Dudhwa Park Gulzar due to elephant trumpet
बीते वर्षों में करंट लगने से और ट्रेनों की चपेट में आकर हो चुकी है कई हाथियों की मौत
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दो साल पहले डीटीआर में हुई वैज्ञानिक गणना में मिले थे 149 हाथी, 25 हाथी हैं पालतू
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व का जंगल हाथियों के लिए बेहद अनुकूल प्राकृतवास है, लेेकिन दुधवा में बढ़ रही हाथियों की आबादी किसानों के लिए मुसीबत बन रही है। जंगल से सटे किसानों के खेतों में हाथियों के उत्पात से किसानों की फसलें तबाह हो रही हैं। उनकी उत्पाती स्वभाव ही अक्सर इन हाथियों के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। पिछले वर्षों में कई हाथी करंट लगने से तो कई हाथियों की ट्रेन से कटकर मौत हो चुकी है।
दो साल पहले दुधवा टाइगर रिजर्व में हुई जंगली हाथियों की वैैैज्ञानिक गणना में यहां 149 हाथी पाए गए थे। दुधवा में 25 पालतू हाथी भी हैं, जो सैलानियों को जंगल की सैर कराने के साथ-साथ जंगल की सुरक्षा के लिए पेट्रोलिंग भी करते हैं।
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इसके अलावा हर साल नेपाल से हाथियों के दल कुछ समय के लिए यहां प्रवास के लिए आते हैं। इन दिनों भी नेपाल के शुक्लाफांटा वन्यजीव विहार से निकलकर आए जंगली हाथी करीब 24 दिनों तक दुधवा टाइगर रिजर्व में डेरा डाले रहे। हालांकि अब यह हाथी यहां से निकलकर पीलीभीत टाइगर रिजर्व पहुंच चुके हैं। इन हाथियों ने किशनपुर सेंक्चुरी और बफर जोन जंगल के आसपास के खेतों में धान गन्ने की फसलों को जमकर नुकसान पहुंचाया है। बेलरायां, मझगईं और पलिया रेंज के आसपास का क्षेत्र दुधवा में रहने वाले हाथियों से सबसे ज्यादा प्रभावित है।
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हाथी अपने स्वभाव के अनुसार रात के समय जंगल से निकलकर किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन हाथियों का जंगल से बाहर निकलना कभी-कभी उनके लिए जानलेवा साबित होता है। कई बार किसान हाथियों से फसलों को बचाने के लिए खेतों में करंट प्रवाहित तारों की बाड़ लगा देते हैं। यह तार हाथियों की मौत का कारण बन जाते हैं। वर्ष 2018 में मझगई रेंज के बौधिया गांव में करंट प्रवाहित तारों से करंट लगने से तीन हाथियों की मौत हो गई थी। उसी साल 18 जुलाई उत्तर निघासन रेंज के रघुवर वन ब्लॉक में एचटी लाइन में करंट लगने से जंगली हाथी की मौत हो गई थी।
2019 में 28 जुलाई को पलिया रेंज में घोला गांव के निकट गन्ने के खेत में लगे ट्रांसफार्मर के करंट से एक जंगली हाथी की मौत हो गई थी। उसी साल 28 सितंबर को दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन के उत्तर निघासन रेंज में खैरटिया गांव के पास करंट लगने से हाथी की मौत हो गई थी।
यही नहीं पिछले 20-25 साल के अंदर पांच जंगली हाथियों की ट्रेन से कटकर मौत हो चुकी है। पांच जनवरी 98 को एक हाथी की ट्रेन से कटकर मौत हो गई। 31 मई को ट्रेन की चपेट में आकर तीन हाथियों की एक साथ मौत हो गई थी। इनमें एक मादा और दो नर हाथी थे। 22 अगस्त 2013 को भी कर्तनियाघाट वन्यजीव विहार इलाके में एक हाथी की मौत हो गई थी। इससे पहले भी ट्रेन की चपेट में आने से कई हाथियों की मौत हो चुकी है।

जेनेटिक मेमोरी के जरिए हाथी चुनते हैं अपना रूट
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक बताते हैं कि हाथी संयुक्त परिवार में रहते हैं। अपने बच्चों की सुरक्षा के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। हाथियों की याददाश्त बहुत प्रबल होती है। हाथियों पर किए गए एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि इनमें जेनिटिक मेमोरी होती है। हाथी जिस रास्ते से एक बार आवागमन करते हैं उसकी स्मृति उनकी संतानों के दिमाग में भी बनी रहती है और वे उसी रास्ते से आवागमन करते हैं। नेपाल से दुधवा टाइगर रिजर्व में आने वाले हाथियों को हर बार एक रास्ते से आते जाते देखा गया है।
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