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हिंदी के वैश्वविक विकास के लिए सहजता जरूरी

Thu, 09 Sep 2021 11:58 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 09 Sep 2021 11:58 PM IST
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Ease is necessary for the global development of Hindi
हिंदी हैं हम - फोटो : अमर उजाला

‘सरकारी कामकाज और बोलचाल दो अलग-अलग धड़ों में बंटी हिंदी, कैसे बने समृद्ध’ विषय पर ऑनलाइन हुई संगोष्ठी

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लखीमपुर खीरी। बृहस्पतिवार को अमर उजाला फाउंडेशन के ‘हिंदी हैं हम अभियान के तहत’ हिंदी की समृद्धि को लेकर एक ऑनलाइन संगोष्ठी हुई, जिसमें हिंदी कर्म से जुड़े जिले की प्रतिष्ठित विभूतियों ने अपने विचार रखे। इस दौरान ‘सरकारी कामकाज और बोलचाल दो अलग-अलग धड़ों में बंटी हिंदी, कैसे बने समृद्ध’ विषय पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने कहा कि सरकारी कामकाज की भाषा बेहद क्लिष्ट है, जिससे कई बार वह लोगों की समझ में नहीं आती। अगर यह सहज सरस हो सके तो हिंदी के वैश्वविक विकास में बड़ा योगदान हो सकता है। वक्ताओं ने कहा कि देशज और लोक भाषा का अपना महत्व है। देशज, सहज और बोलचाल की भाषा में गढ़े गए हिंदी साहित्य वैश्विक स्तर पर इसे बड़ा परिदृश्य दे सकते हैं। मलेशिया, त्रिनिनाद और नेपाल इसके सहज उदाहरण हैं।

तय करना होगा कि शुद्धता अपनानी है या स्वीकार्यता

दो बार भारतेंदु हरीशचंद्र पुरस्कार समेत कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित और धौरहरा के रहने वाले वरिष्ठ कहानी व उपन्यासकार संजीव जायसवाल ने संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए कहा कि सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि हमें शुद्धता अपनानी है या स्वीकार्यता बढ़ानी है। पूरे देश में अगर हिंदी को लागू करना है तो हमें बोलचाल की भाषा को पूरे देश में लागू करना होगा। बोलचाल में तो हमारी सहज भाषा रहती है, लेकिन लिखावट में हम विद्वता दिखाने लगते हैं।- संजीव जायसवाल, पूर्व आईआरपीएस अधिकारी, धौरहरा

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राजभाषा नहीं, राष्ट्रभाषा बने हिंदी

अगर हिंदी को सहेजने के सही परिदृश्य में सोचा गया होता तो हमें आज हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हिंदी दिवस नहीं मनाना पड़ता। हिंदी इतनी क्लिष्ट नहीं होनी चाहिये कि समझ में न आए। संविधान में हिंदी राजभाषा है, जबकि इसे राष्ट्रभाषा होना चाहिये था। सहज, सरल हिंदी की भाषा को आज नेपाल, त्रिनिनाद और मॉरीशस तक में मान्यता मिल रही है, लेकिन हमारे अपने देश में सरकारी हिंदी बेहद क्लिष्ट है। इसे जन जन की और राष्ट्र की भाषा बनाना होगा। - डॉ. मीनाक्षी तिवारी, प्राचार्य, गुरुनानक कन्या इंटर कॉलेज

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हिंदी की क्लिष्टता है, भाषा का सौंदर्यबोध

क्लिष्टता हिंदी को व्यापक और समृद्ध बनाती है। हिंदी भाषा में लालित्य को भी बनाए रखना है। इसलिए क्लिष्टता का अपना सौंदर्य है। लक्षणा और अभिव्यंजना का सरकारी कामकाज की भाषा में लोप होता है। वहीं हमारे लोकशब्द और तत्सम भाषा को भी महत्व देना है। दोनों का अपना अस्तित्व बना रहे, इसके लिये लिये सबसे बेहतर निदान यह है कि सभी स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य किया जाये, जिससे शुरुआत से ही छात्रों में भाषा का सौंदर्यबोध परिलक्षित होता रहेगा। - गौरव शुक्ल, साहित्यकार एवं अवधी सम्राट स्व. बंशीधर शुक्ल के पौत्र

बीच का निकले रास्ता, तो समृद्ध हो हिंदी

एक सर्वे के मुताबिक जहां जहां देशज भाषा में पढ़ाई हुई है। वहां छात्रों का परीक्षा परिणाम अन्य भाषाओं के मुकाबले 18 फीसदी ज्यादा आया है। कई बार अनुवाद ने भी हिंदी का बेड़ा गर्क किया है। जैसे सरकारी भाषा के शब्दों की उत्पत्ति के लिये अलग से आयोग है, वैसे ही बोलचाल और सरकारी भाषा में एक सेतु बनाने की जरूरत है। इसके लिए भी अलग से संस्था की जरूरत है, जो लोकभाषा और सरकारी कामकाज की भाषा में सेतु बना सके। - भारतेंदु प्रकाश त्रिवेदी, वरिष्ठ पत्रकार एवं संस्थापक मॉर्सेल,

राष्ट्रीयता के बोध जुड़े तो समृद्ध होगी हिंदी

सरकारी व्यवस्था में हिंदी का सबसे ज्यादा महत्व है। यहां पूरा कामकाज ही हिंदी में है। अगर हम हिंदी के साथ राष्ट्रीयता के भाव भी जोड़ सकें तो निश्चित ही उससे हिंदी और सशक्त और समृद्ध होकर राष्ट्रव्यापी होगी। साथ ही अमर उजाला के ‘हिंदी हैं हम’ जैसे अभियान लगातार होते रहने चाहिये। जिससे नई पीढ़ी हिंदी को दरकिनार न कर सके और हिंदी को अपनाने से अपने देश की राष्ट्रीयता के भाव के खुद को जोड़ सके।- स्वाति शुक्ला, एसडीएम, मोहम्मदी

मधुवन सी सारे जग में महकेगी हिंदी

हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा और अभिव्यक्ति का सरल माध्यम है, पर क्लिष्टता इसकी ग्राह्यता कम करती है। हिंदी के अस्तित्व पर कोई प्रश्न उत्पन्न हो रहा है। ऐसा प्रतीत नहीं होता। फादर कामिल बुल्के जैसे विदेशी भी हिंदी के प्रति अपना स्नेह और प्रेम प्रदर्शित करते हैं। यही कहना है कि ‘अभी और निखरेगी, अभी और संवरेगी, मधुवन सी सारे जग में महकेगी हिंदी’।- मधु श्रीवास्तव, अजमानी इंटरनेशनल स्कूल, लखीमपुर खीरी

भाषा की सरलता उसे व्यापक बनाती है

कोई भाषा तभी सर्वग्राही हो सकती है जब वह सरल हो और आम बोलचाल में प्रयुक्त होती हो। सरकारी हिंदी को वास्तव में इतना क्लिष्ट बना दिया गया है कि शासनादेशों को समझ पाना आम लोगों के बस की बात नहीं है। एक तरह से सरकारी तंत्र की वजह से हिंदी अपने गौरवशाली स्थान हासिल नहीं कर पा रही है। जो भाषा बोलचाल में हो वही लिखी जानी चाहिए और सरकारी भाषा के रूप में भी ऐसी ही सरल भाषा का प्रयोग होना चाहिए। - डॉ. आर के जायसवाल, अवकाश प्राप्त, डीआईओएस, लखीमपुर खीरी

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