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पहले दीपावली दिल से होती थी अब दिखावे से

Wed, 03 Nov 2021 11:58 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Wed, 03 Nov 2021 11:58 PM IST
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Earlier Deepawali used to be from the heart, now by appearances
दिवाली की पूर्व संध्या पर घरों में की गई सजावट।
पहले की दिवाली थी ईकोफ्रेंडली, अब पटाखों से प्रदूषण फैलाने की मचती है होड़
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लखीमपुर खीरी। दिवाली के मौके पर पहले भले ही इतना धूम धड़ाका न होता हो, लेकिन लोग दिल से त्योहार मनाते थे। आज की दिवाली में दिखावा ज्यादा जोश कम है। यह कहना है उन बुजुर्गों का जिन्होंने तीन पीढ़ियों को दिवाली मनाते देखा है। बुजुर्ग यह भी कहते हैं कि पहले की दीवाली पूरी तरह ईकोफ्रेंडली होती थी। मिट्टी के दीयों से घरों को रोशन किया जाता था, जिससे बरसात के मौसम में होने वाले कीड़े-मकोड़े दीपक की लौ के साथ खत्म हो जाते थे। बिजली की झालरों का चलन कम था। आतिशबाजी पहले भी होती थी, लेकिन उस समय की आतिशबाजी में इतना प्रदूषण नहीं होता था।
पिछले पचास वर्षों में त्योहार मनाने की परंपराओं में भी काफी अंतर आया है। घरों की साफ-सफाई और दूसरी तैयारियां महीने भर पहले से ही शुरू हो जाती थीं। बहुत तामझाम नहीं होता था, लेकिन लोगों का उत्साह उनके चेहरे पर झलकता था। मिट्टी के दीयों से घर रोशन होते थे। उपहार के रूप में लोग मिठाइयों का आदान प्रदान करते थे। आज त्योहार में दिखावा ज्यादा उत्साह कम दिखता है।
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- बंशीधर राज, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष
समय के साथ परंपराएं बदलती हैं रीति रिवाज बदलते हैं। दिवाली मनाने के तौर तरीके भी बदले हैं। मिट्टी के दीयों का इस्तेमाल केवल परंपरा निभाने के लिए हो रहा है। उनकी जगह बिजली की रंग बिरंगी झालरों ने ले ली है। अब लोग पहले की अपेक्षा ज्यादा उत्साह के साथ दिवाली मना रहे हैं। लोगों की आमदनी में इजाफा हुआ तो त्योहार का उल्लास भी बढ़ा है। दिवाली पूजन में भी भव्यता बढ़ी है।
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- प्रेम शंकर अग्रवाल, प्रमुख व्यवसायी
त्योहार और उत्सव इंसानों में नई ऊर्जा और उमंग का संचार करते हैं। दिवाली तो रोशनी और खुशी का त्योहार है। आज से पचास साल पहले जिस उत्साह के साथ दिवाली मनाई जाती थी, उस उत्साह में और ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। कभी कोई समस्या आती भी है तो भी लोग उन समस्याओं को दरकिनार कर उत्साह के साथ दिवाली मनाना नई पीढ़ी की जीवंतता और जीवटता का प्रमाण है।

- सत्यधर शुक्ल, कवि
दिवाली के उत्साह में कभी कोई फर्क नहीं आया है। तौर तरीके जरूर बदले हैं। अब दिवाली त्योहार कम उत्सव ज्यादा लगता है। इसमें दिखावा भी बढ़ा है। पहले दिवाली पूरी तरह ईकोफ्रेंडली होती थी। आज दिवाली पर पटाखों से बेतहाशा प्रदूषण होता है। ज्यादा आतिशबाजी करना भी दिखावे का ही एक अंग है। पहले दिवाली दिल से होती थी दिखावे से नहीं। हालांकि परंपराओं में बदलाव आना आम बात है।
- डॉ. रामपाल सिंह, रिटायर्ड शिक्षक
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