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Lakhimpur Kheri News: राजनीति और आस्था का संगम है धौरहरा का ठुठवा मेला

Fri, 15 Nov 2024 01:09 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 15 Nov 2024 01:09 AM IST
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Dhaurahra's Thuthwa fair is a confluence of politics and faith
मेले में सजने लगी दुकानें-संवाद
धौरहरा। जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर ठुठवा मेला अपने आप में अनोखा है। यह एक तरह से राजनीति और आस्था का संगम है। कभी इस घाघरा नदी की तलहटी पर राजाओं के शिविर लगते थे, वहीं साधु-संत यहां कल्पवास करते थे। चार सौ वर्ष पुराने इस मेले में बहुत कुछ बदलाव हुआ है। अब राजाओं के शिविर की जगह राजनीतिक दलों के पंडाल लगते हैं। आज भी लोग कल्पवास करते नदी किनारे करते नज़र आते हैं।
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धौरहरा का ब्लॉक ईसानगर कभी जांगड़ा राजाओं की राजधानी हुआ करता था। यहां के राजा सरयू नदी (घाघरा नदी) के किनारे अपने मित्र राजाओं के साथ शिविर लगाकर कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान-दान किया करते थे। यहां साधु-संतों के साथ स्थानीय लोग भी कल्पवास करते थे। कुश्तियां होती थीं, जिनमें मित्र राजाओं के साथ आने वाले पहलवान भी जो आजमाइश किया करते थे।
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राजतंत्र समाप्त हुआ पर इस ठुठवा मेले की परंपरा बरकरार रही। इसी जागड़ा वंश के वंशज रहे राजा सरस्वती प्रताप सिंह, जो प्रदेश के कैबिनेट मंत्री भी रहे, मेले में शिविर लगाकर अपनी वंश परंपरा निभाते रहे। चूंकि राजा सरस्वती प्रताप सिंह राजनेता थे, जब मेले में उनके दल का शिविर लगा तो जनता से सामंजस्य बैठाने के लिए अन्य दल भी अपना शिविर लगाने लगे। कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले इस मेले में आने वाले श्रद्धालु स्नान दान के अलावा नदी किनारे भंडारा भी चलाते हैं। काफी समय बीतने के बाद भी यह परंपरा आज भी कायम है। (संवाद)
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जांगड़ा राजा रंजीत सिंह ने की थी मेले की शुरुआत
ईसानगर के जांगड़ा राजा रंजीत सिंह ने देवउत्थानी एकादशी में भगवान विष्णु की नदी किनारे पूजा कर कार्तिक पूर्णिमा से मेले की शुरूआत चार सौ वर्ष पहले की थी। ईसानगर के बुजुर्गों के मुताबिक इस परंपरा को इनके वंशज राजा भुवनेश्वरी प्रताप सिंह, राजा राजेंद्र प्रताप सिंह, राजा इंद्र बहादुर सिंह, राजा रघुराज प्रताप सिंह, फिर पूर्व कैबिनेट मंत्री राजा सरस्वती प्रताप सिंह ने आगे बढ़ाया। अब मेला प्रशासन की देखरेख में चल रहा है।


इस मेले की नहीं है कोई स्थायी कमेटी
किसी भी मेला आयोजन के लिए कमेटी होती पर ईसानगर क्षेत्र में लगने वाले इस ठुठवा मेला की कोई कमेटी नहीं है। परंपरागत तरीके से इस मेले का प्रबंधन धौरहरा का हलवाई समाज करता आ रहा है। इस ऐतिहासिक मेले के महत्व को ध्यान में रखकर प्रशासन खुद इस मेला की जिम्मेदारी निभाता है। इस मेले के लिए फ्लड पीएसी बल के साथ काफी संख्या में पुलिस तैनात रहती है। जिले के आलाधिकारी भी इस मेले में पहुंचते हैं।




कृषि यंत्र, फर्नीचर और बर्तन के साथ खूब बिकती है खीर मोहन
मेले में मुख्य रूप से बर्तन, फर्नीचर, सौंदर्य प्रसाधन के अलावा धौरहरा की मशहूर मिठाई खीर मोहन खूब बिकती है। धौरहरा की खीर मोहन भी गांजर की शान मानी जाती है। मेले में आने वाले लोगों को खीर मोहन खूब भाती है।
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