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Lakhimpur Kheri News: शिव क्षेत्र के प्राचीन 12 कोसी परिक्रमा मार्ग को खोलने की मांग
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गोला गोकर्णनाथ। अनुसंधान एवं विकास समिति के पदाधिकारियों ने छोटी काशी शिव क्षेत्र के प्राचीन 12-कोसी परिक्रमा मार्ग के खोले जाने की मांग की है।
अनुसंधान एवं विकास समिति के अध्यक्ष रविसुत शुक्ल, महासचिव यतीश शुक्ला, उपाध्यक्ष श्रीकांत तिवारी और कोषाध्यक्ष शिप्रा खरे ने शासन, प्रशासन से इस ऐतिहासिक धार्मिक महत्व के परिक्रमा मार्ग को आरंभ किए जाने की मांग की है। उन्होंने बताया कि 1877 के गजेटियर (वॉल्यूम दो) में इस मंदिर और उसके आसपास की परंपराओं का विस्तृत वर्णन मिलता है।
महादेव मंदिर और उससे जुड़ी परंपराओं की विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है। इस क्षेत्र की परिधि पर चार प्रमुख द्वार स्थित थे। पश्चिम में मोहम्मदी के निकट गोमती नदी के तट पर स्थित गजमोजननाथ, उत्तर में शाहपुर, परगना भूड़ में गदाईनाथ, पूर्व में लखीमपुर के पास देवकलीनाथ और दक्षिण-पश्चिम में परगना मोहम्मदी में बड्खर मंदिर तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को इन चार द्वारों से होकर गुजरने की परंपरा थी।
इन द्वारों से प्रवेश कर गोला गोकर्णनाथ पहुंचते थे। फाल्गुन माह और सावन मास में शिव क्षेत्र की बारह कोसी परिक्रमा कर मंदिर में पूजा करते थे। मंदिर की चारों दिशाओं में चार छोटे मंदिर अर्थात उप तीर्थ स्थित थे। पूर्व में भद्र कुंड, उत्तर में पनाहा (साल के जंगल में स्थित एक छोटा मंदिर) दक्षिण में किरनगर (जंगल में स्थित एक मंदिर) पश्चिम में अहमदनगर में कुंड।
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महादेव मंदिर के चारों ओर लगभग छह किलोमीटर की दूरी से 36 किलोमीटर की परिक्रमा की प्रथा थी। इस परिक्रमा को सक्रा विया कहा गया है। श्रद्धालु अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए दंडवत परिक्रमा करते थे। यह परिक्रमा 1905 से पहले बंद हो गई। वर्तमान समय के कई बड़े गांव जैसे अहमदनगर, छतौनिया, धिरावां, घरथनिया, कोटवारा, भुड़वारा आदि परिक्रमा मार्ग पर स्थित थे। समिति के पदाधिकारियों ने प्राचीन परिक्रमा मार्ग खुलवाने और इसे कॉरिडोर निर्माण के क्रम में शामिल करने की मांग की।
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अनुसंधान एवं विकास समिति के अध्यक्ष रविसुत शुक्ल, महासचिव यतीश शुक्ला, उपाध्यक्ष श्रीकांत तिवारी और कोषाध्यक्ष शिप्रा खरे ने शासन, प्रशासन से इस ऐतिहासिक धार्मिक महत्व के परिक्रमा मार्ग को आरंभ किए जाने की मांग की है। उन्होंने बताया कि 1877 के गजेटियर (वॉल्यूम दो) में इस मंदिर और उसके आसपास की परंपराओं का विस्तृत वर्णन मिलता है।
महादेव मंदिर और उससे जुड़ी परंपराओं की विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है। इस क्षेत्र की परिधि पर चार प्रमुख द्वार स्थित थे। पश्चिम में मोहम्मदी के निकट गोमती नदी के तट पर स्थित गजमोजननाथ, उत्तर में शाहपुर, परगना भूड़ में गदाईनाथ, पूर्व में लखीमपुर के पास देवकलीनाथ और दक्षिण-पश्चिम में परगना मोहम्मदी में बड्खर मंदिर तक पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को इन चार द्वारों से होकर गुजरने की परंपरा थी।
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इन द्वारों से प्रवेश कर गोला गोकर्णनाथ पहुंचते थे। फाल्गुन माह और सावन मास में शिव क्षेत्र की बारह कोसी परिक्रमा कर मंदिर में पूजा करते थे। मंदिर की चारों दिशाओं में चार छोटे मंदिर अर्थात उप तीर्थ स्थित थे। पूर्व में भद्र कुंड, उत्तर में पनाहा (साल के जंगल में स्थित एक छोटा मंदिर) दक्षिण में किरनगर (जंगल में स्थित एक मंदिर) पश्चिम में अहमदनगर में कुंड।
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महादेव मंदिर के चारों ओर लगभग छह किलोमीटर की दूरी से 36 किलोमीटर की परिक्रमा की प्रथा थी। इस परिक्रमा को सक्रा विया कहा गया है। श्रद्धालु अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए दंडवत परिक्रमा करते थे। यह परिक्रमा 1905 से पहले बंद हो गई। वर्तमान समय के कई बड़े गांव जैसे अहमदनगर, छतौनिया, धिरावां, घरथनिया, कोटवारा, भुड़वारा आदि परिक्रमा मार्ग पर स्थित थे। समिति के पदाधिकारियों ने प्राचीन परिक्रमा मार्ग खुलवाने और इसे कॉरिडोर निर्माण के क्रम में शामिल करने की मांग की।