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खीरी में बसपा की सियासी जमीन पर गहराया संकट
अमित गुप्ता लखीमपुर खीरी।
Updated Fri, 17 Mar 2017 11:26 PM IST
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बसपा
- फोटो : amar ujala
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जातिगत समर्थन हासिल करने में भी प्रत्याशी रहे नाकाम
दलित और मुस्लिम वोटों का गणित भी रहा बेअसर
लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद बसपा को विधानसभा चुनाव में संजीवनी मिलने की उम्मीद थी, जो नतीजे के आने के बाद धराशाई हो गई है। जिले की आठों सीटों से बसपा का सूपड़ा साफ हुआ ही, लेकिन कहीं मुकाबले में भी जगह नहीं बना सकी। यह पोजीशन पार्टी नेताओं के लिए चिंता का सबब बन गई है, क्योंकि वर्ष 2012 में उनके खाते में तीन सीटे आईं थी। इस लिहाज से लोकसभा 2019 में होने वाले चुनाव के लिए अभी से बसपा नेताओं को नए सिरे से जमीन तैयार करने की जरूरत पड़ेगी।
मोदी लहर के आगे सपा, कांग्रेस और बसपा के माहिर खिलाड़ी भी तिनके की तरह बिखर गए हैं, जो अभी कुछ दिनों तक शॉक में रहेंगे। प्रदेश भर के नतीजों में सबसे बड़ा झटका बसपा सुप्रीमो मायावती को लगा है, जिसका असर लखीमपुर की आठों विधानसभा सीटों पर दिखा है। इस बार लखीमपुर से ब्राह्मण, निघासन से ठाकुर, पलिया से वैश्य, मोहम्मदी से मुस्लिम, गोला से कुर्मी प्रत्याशी उतारे थे। जबकि धौरहरा से पूर्व विधायक शमशेर बहादुर के अलावा श्रीनगर और कस्ता सुरक्षित सीट पर एससी उम्मीदवार उतारे थे। प्रत्याशियों को भी दलित-मुस्लिम गठजोड़ के साथ अपनी जाति के समर्थन से जीत का भरोसा था, लेकिन परिणाम इसके एकदम उलट रहे। इतना ही नहीं बसपा के लिए हालात इस कदर बिगड़े कि आठ सीटों में उनके प्रत्याशी तीसरे नंबर पर पहुंच गए, जो सबसे बड़ा चिंता का कारण बन गया है। नतीजों ने साफ किया कि प्रत्याशियों को जातिगत वोट तो मिला नहीं, बल्कि कैडर वोट में भी भाजपा सेंधमारी कर ले गई। जबकि मुस्लिमों मतों में बिखराव हो गया। लिहाजा पिछले 2012 चुनाव में तीन सीट जीतने के साथ ही कस्ता, श्रीनगर, लखीमपुर सीटों पर दूसरे स्थान पर रहने वाली बसपा एक झटके में तीसरे स्थान पर लुढ़क गई। बात यहीं तक नहीं रुकी, बल्कि श्रीनगर, मोहम्मदी को छोड़कर अन्य सात सीटों पर बसपा मुकाबले में ही नहीं आ सकी। ऐसा इसलिए भी हुआ कि जिन कैडर वोटों पर बसपा अपना एकाधिकार समझती थी, उन्होंने भी तवज्जो न मिलने पर मनमुताबिक प्रत्याशी को वोट दिया है।
तो कम हो जाएगी होड़
बसपा से टिकट पाने के लिए होने वाली होड़ भी अब थमती नजर आ रही। क्योंकि अच्छी खासी रकम खर्च कर प्रत्याशियों ने जिस जीत की उम्मीद की थी, जिसमें उन्हें भारी हार का सामना करना पड़ा है। सूत्रों की माने तो आगामी चुनावों में पैसे देकर टिकट खरीदने की प्रथा पर विराम लग सकता है।
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हमें सभी सीटों पर कैडर वोट मिला है। लोकसभा चुनाव में पूरे दमखम से बसपा चुनाव लड़ेगी। हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी, जिसके अनुसार आगे की रणनीति बनाएंगे।
-अजय चौधरी, जिलाध्यक्ष, बसपा
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दलित और मुस्लिम वोटों का गणित भी रहा बेअसर
लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद बसपा को विधानसभा चुनाव में संजीवनी मिलने की उम्मीद थी, जो नतीजे के आने के बाद धराशाई हो गई है। जिले की आठों सीटों से बसपा का सूपड़ा साफ हुआ ही, लेकिन कहीं मुकाबले में भी जगह नहीं बना सकी। यह पोजीशन पार्टी नेताओं के लिए चिंता का सबब बन गई है, क्योंकि वर्ष 2012 में उनके खाते में तीन सीटे आईं थी। इस लिहाज से लोकसभा 2019 में होने वाले चुनाव के लिए अभी से बसपा नेताओं को नए सिरे से जमीन तैयार करने की जरूरत पड़ेगी।
मोदी लहर के आगे सपा, कांग्रेस और बसपा के माहिर खिलाड़ी भी तिनके की तरह बिखर गए हैं, जो अभी कुछ दिनों तक शॉक में रहेंगे। प्रदेश भर के नतीजों में सबसे बड़ा झटका बसपा सुप्रीमो मायावती को लगा है, जिसका असर लखीमपुर की आठों विधानसभा सीटों पर दिखा है। इस बार लखीमपुर से ब्राह्मण, निघासन से ठाकुर, पलिया से वैश्य, मोहम्मदी से मुस्लिम, गोला से कुर्मी प्रत्याशी उतारे थे। जबकि धौरहरा से पूर्व विधायक शमशेर बहादुर के अलावा श्रीनगर और कस्ता सुरक्षित सीट पर एससी उम्मीदवार उतारे थे। प्रत्याशियों को भी दलित-मुस्लिम गठजोड़ के साथ अपनी जाति के समर्थन से जीत का भरोसा था, लेकिन परिणाम इसके एकदम उलट रहे। इतना ही नहीं बसपा के लिए हालात इस कदर बिगड़े कि आठ सीटों में उनके प्रत्याशी तीसरे नंबर पर पहुंच गए, जो सबसे बड़ा चिंता का कारण बन गया है। नतीजों ने साफ किया कि प्रत्याशियों को जातिगत वोट तो मिला नहीं, बल्कि कैडर वोट में भी भाजपा सेंधमारी कर ले गई। जबकि मुस्लिमों मतों में बिखराव हो गया। लिहाजा पिछले 2012 चुनाव में तीन सीट जीतने के साथ ही कस्ता, श्रीनगर, लखीमपुर सीटों पर दूसरे स्थान पर रहने वाली बसपा एक झटके में तीसरे स्थान पर लुढ़क गई। बात यहीं तक नहीं रुकी, बल्कि श्रीनगर, मोहम्मदी को छोड़कर अन्य सात सीटों पर बसपा मुकाबले में ही नहीं आ सकी। ऐसा इसलिए भी हुआ कि जिन कैडर वोटों पर बसपा अपना एकाधिकार समझती थी, उन्होंने भी तवज्जो न मिलने पर मनमुताबिक प्रत्याशी को वोट दिया है।
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तो कम हो जाएगी होड़
बसपा से टिकट पाने के लिए होने वाली होड़ भी अब थमती नजर आ रही। क्योंकि अच्छी खासी रकम खर्च कर प्रत्याशियों ने जिस जीत की उम्मीद की थी, जिसमें उन्हें भारी हार का सामना करना पड़ा है। सूत्रों की माने तो आगामी चुनावों में पैसे देकर टिकट खरीदने की प्रथा पर विराम लग सकता है।
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हमें सभी सीटों पर कैडर वोट मिला है। लोकसभा चुनाव में पूरे दमखम से बसपा चुनाव लड़ेगी। हार के कारणों की समीक्षा की जाएगी, जिसके अनुसार आगे की रणनीति बनाएंगे।
-अजय चौधरी, जिलाध्यक्ष, बसपा