फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Lakhimpur Kheri News ›   Bring light to those forgotten in the light of freedom

आजादी की रोशनी में भूल गए रोशनी लाने वालों को

Fri, 12 Aug 2016 11:51 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/लखीमपुर खीरी।
अमर उजाला ब्यूरो/लखीमपुर खीरी। Updated Fri, 12 Aug 2016 11:51 PM IST
विज्ञापन
Bring light to those forgotten in the light of freedom
freedom - फोटो : amar ujala
जरा याद करो कुर्बानी
विज्ञापन

इतिहास में अमर, स्मृतियों से विलीन हो रहे शहीद

स्वाधीनता आंदोलन में जिले के अनेक सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति दी है। इनमें से स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में केवल कुछ का ही उल्लेख है। कई ऐसे भी शहीद हैं जिनका न तो इतिहास में उल्लेख है न ही उनकी याद में कोई स्मारक आज तक बन पाया है। आजादी की सुनहरी रोशनी में रोशनी देने वालों को ही हम भूलते जा रहे हैं। आजादी के बाद ब्लाक कार्यालयों पर स्वाधीनता स्तंभ बनाए गए थे। जिन पर क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दर्ज हैं। इन स्वाधीनता स्तंभों का भी अब कोई पुरसाहाल नहीं है।  
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक राजा लोने सिंह की गढ़ी के खंडहर ही उनका अप्रत्यक्ष स्मारक है। मितौली में उनके नाम से खुला इंटर कॉलेज उनकी याद दिलाता है। लेकिन उसी संग्राम के योद्धा राजा इंद्र विक्रम सिंह और सुरेंद्र विक्रम सिंह को पूरी तरह भुला दिया गया है। असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान फांसी पर झूलने वाले नसीरुद्दीन मौजी को भी आजादी के पचास साल बाद पहचान मिली। राजनरायन मिश्र के स्मारक जिला मुख्यालय और उनके पैतृक गांव भीखमपुर में हैं। भले ही यह स्मारक उपेक्षित हों लेकिन अस्तित्व में हैं। 
विज्ञापन

इनके अलावा जिले में देवतादीन, नत्थू लाल और रंपा तेली जैसे ऐसे शहीद हैं। जिनका शौर्य स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में महज चंद पंक्तियों में दर्ज किया गया है। आजादी के 69 साल बीत जाने के बाद भी उनको कोई स्मारक तक नसीब नहीं हो पाया है। और तो और लोग जिले के अधिकतर लोगों को उनकी शहादत के बारे में कुछ भी नहीं मालूम है। 
विज्ञापन
विज्ञापन

वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान करहुंवा गांव के देवतादीन को दो वर्ष की कैद और 100 रुपया जुर्माना की सजा मिली। सजा काटने के दौरान अंग्रेजों की यातनाएं सहते हुए देवतादीन ने जेल में ही दम तोड़ दिया। इसी तरह भैठिया के नत्थू लाल व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के दौरान 1940-41 में 50 रुपया जुर्माना और एक साल की सजा दी गई। जेल में अंग्रेजों की यातनाएं सहते हुए उनकी मौत हो गई।  संसारपुर गांव के रंपा तेली भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान 1942 में कुकुहापुर में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। अंग्रेज पुलिस की एक टुकड़ी ने वहां पहुंचकर आंदोलनकारियों पर लाठियां बरसाईं और उन्हें तितर-वितर करने के लिए गोलियां चलाईं। रंपा तेली अपनी जगह से नहीं हिले। पुलिस की एक गोली रंपा तेली के सीने में जा धंसी और वहीं पर उनकी मौत हो गई।

भले ही इन शहीदों को कोई याद न करे लेकिन यह सच है कि गुलामी के अंधेरों में गुम होकर भी देश को आजादी की रोशनी दिलाने में इनका योगदान है। यह बात इतिहास के पन्नों में हमेशा अमर रहेगी। आज जब प्रधानमंत्री ने शहीदों को सम्मान देने के लिए तिरंगा यात्रा शुरू की है तो कम से कम इन भूले बिसरे और गुमनाम शहीदों को तो याद  ही किया जाना चाहिए।  
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed