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कोशिशें तमाम, पर बढ़ नहीं रही बाघों की आबादी
अमर उजाला ब्यूरो/लखीमपुर खीरी।
Updated Fri, 29 Jul 2016 10:03 PM IST
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- जंगलों पर जैविक दबाव, टूटती जा रही खाद्य शृंखला
- घास के मैदानों की कमी से कम हो रहे शाकाहारी जीव
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाघों के संरक्षण के लिए हो रहे तमाम प्रयासों के बावजूद अपेक्षित सफलता मिलती नजर नहीं आ रही है। वन क्षेत्र में कमी न आने के बावजूद बाघों के प्राकृतिक आवास और भोजन में आ रही कमी बाघों की आबादी बढ़ने में बाधक बनी हुई है। दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के समय यहां करीब 70 बाघ थे। अब यहां 117 बाघ होने के दावे किए जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों पर विश्वास करें तो चालीस साल में 47 बाघों की वृद्धि हुई है। इस बढ़ोत्तरी को संतोषजनक माना जा सकता है, उत्साहजनक नहीं।
वर्ष 1987 में दुधवा नेशनल पार्क, किशनपुर सेंक्चुरी और कतर्निया घाट को दुधवा टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। इसके बाद बाघों के संरक्षण और संवर्धन के प्रयास तो हुए, लेकिन जंगलों पर बढ़ते जैविक दबाव और टूटती खाद्य श्रृंखला को बचाने के उतने प्रयास नहीं हुए जितने कि होने चाहिए थे। घास के मैदानों में हो रही कमी से बाघ के भोजन हिरनों और अन्य शाकाहारी जीवों में कमी आ रही है। इससे बाघ, तेंदुओं को भोजन की तलाश में जंगल से बाहर निकलना पड़ रहा है। इससे अक्सर बाघ और तेंदुए खतरे में पड़ जाते हैं।
टूट रही वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला
नेपाली नदियों से हर साल आने वाली बाढ़ से दुधवा नेशनल पार्क में वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला टूटने लगी है। घास के मैदानों की कमी होने से यहां विभिन्न प्रजातियों के हिरनों की आबादी में कमी आती जा रही है। जंगल में पर्याप्त भोजन न मिलने से बाघ और तेंदुए जंगल से बाहर आते हैं। जंगल के बाहर जानवरों का आना न इंसानों के लिए और न ही जानवरों के लिए सुरक्षित है।
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जंगलों पर बढ़ रहा है जैविक दबाव
दुधवा नेशनल पार्क के इर्द गिर्द 10 किलोमीटर के क्षेत्र में 185 गांव आबाद हैं। इन गांवों के लोग जलौनी लकड़ी, झोपड़ी बनाने के लिए थुनिया, थंबर और फूस आदि के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। इनका जंगलों में बराबर आना जाना रहता है। इसके अलावा इन ग्रामीणों के पालतू जानवर में जंगल में चरने के लिए जाते हैं। इससे बाघों के प्राकृतिक आवास में खलल पड़ता है।
बाघ संरक्षण के लिए यह हो रहे प्रयास
- जंगल से सटे लोगों की जंगलों पर निर्भरता कम करने के लिए जायका परियोजना का संचालन।
- बाघ के संरक्षण के लिए टाइगर कं जरवेशन अथारिटी का गठन। टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स के गठन की कवायद।
- जंगलों में घास के मैदानों का विकास।
- टाइगर रिजर्व के बफर जोन का विस्तार।
- कार्बेट नेशनल पार्क, दुधवा नेशनल पार्क और नेपाल से होते हुए बिहार के वाल्मीकि नेशनल पार्क तक बाघों को गलियारा देने के लिए तराई आर्क परियोजना।
दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों के संरक्षण और संवर्धन के के प्रयास फलीभूत हो रहे हैं। यहां बाघों की संख्या में बढ़ोत्तरी संतोषजनक है।
- सुनील चौधरी, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व
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- घास के मैदानों की कमी से कम हो रहे शाकाहारी जीव
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाघों के संरक्षण के लिए हो रहे तमाम प्रयासों के बावजूद अपेक्षित सफलता मिलती नजर नहीं आ रही है। वन क्षेत्र में कमी न आने के बावजूद बाघों के प्राकृतिक आवास और भोजन में आ रही कमी बाघों की आबादी बढ़ने में बाधक बनी हुई है। दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के समय यहां करीब 70 बाघ थे। अब यहां 117 बाघ होने के दावे किए जा रहे हैं। सरकारी आंकड़ों पर विश्वास करें तो चालीस साल में 47 बाघों की वृद्धि हुई है। इस बढ़ोत्तरी को संतोषजनक माना जा सकता है, उत्साहजनक नहीं।
वर्ष 1987 में दुधवा नेशनल पार्क, किशनपुर सेंक्चुरी और कतर्निया घाट को दुधवा टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। इसके बाद बाघों के संरक्षण और संवर्धन के प्रयास तो हुए, लेकिन जंगलों पर बढ़ते जैविक दबाव और टूटती खाद्य श्रृंखला को बचाने के उतने प्रयास नहीं हुए जितने कि होने चाहिए थे। घास के मैदानों में हो रही कमी से बाघ के भोजन हिरनों और अन्य शाकाहारी जीवों में कमी आ रही है। इससे बाघ, तेंदुओं को भोजन की तलाश में जंगल से बाहर निकलना पड़ रहा है। इससे अक्सर बाघ और तेंदुए खतरे में पड़ जाते हैं।
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टूट रही वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला
नेपाली नदियों से हर साल आने वाली बाढ़ से दुधवा नेशनल पार्क में वन्यजीवों की खाद्य श्रृंखला टूटने लगी है। घास के मैदानों की कमी होने से यहां विभिन्न प्रजातियों के हिरनों की आबादी में कमी आती जा रही है। जंगल में पर्याप्त भोजन न मिलने से बाघ और तेंदुए जंगल से बाहर आते हैं। जंगल के बाहर जानवरों का आना न इंसानों के लिए और न ही जानवरों के लिए सुरक्षित है।
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जंगलों पर बढ़ रहा है जैविक दबाव
दुधवा नेशनल पार्क के इर्द गिर्द 10 किलोमीटर के क्षेत्र में 185 गांव आबाद हैं। इन गांवों के लोग जलौनी लकड़ी, झोपड़ी बनाने के लिए थुनिया, थंबर और फूस आदि के लिए जंगलों पर निर्भर हैं। इनका जंगलों में बराबर आना जाना रहता है। इसके अलावा इन ग्रामीणों के पालतू जानवर में जंगल में चरने के लिए जाते हैं। इससे बाघों के प्राकृतिक आवास में खलल पड़ता है।
बाघ संरक्षण के लिए यह हो रहे प्रयास
- जंगल से सटे लोगों की जंगलों पर निर्भरता कम करने के लिए जायका परियोजना का संचालन।
- बाघ के संरक्षण के लिए टाइगर कं जरवेशन अथारिटी का गठन। टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स के गठन की कवायद।
- जंगलों में घास के मैदानों का विकास।
- टाइगर रिजर्व के बफर जोन का विस्तार।
- कार्बेट नेशनल पार्क, दुधवा नेशनल पार्क और नेपाल से होते हुए बिहार के वाल्मीकि नेशनल पार्क तक बाघों को गलियारा देने के लिए तराई आर्क परियोजना।
दुधवा टाइगर रिजर्व में बाघों के संरक्षण और संवर्धन के के प्रयास फलीभूत हो रहे हैं। यहां बाघों की संख्या में बढ़ोत्तरी संतोषजनक है।
- सुनील चौधरी, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व