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Lakhimpur Kheri News: सैकड़ाें रुपये खर्च करने के बाद मिल रहा एक रुपये में इलाज
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जिला अस्पताल में चिकित्सकों को दिखाने के लिए लगी मरीजों की भीड़ संवाद
लखीमपुर खीरी। जिले की सीएचसी पर न तो विशेषज्ञ डॉक्टर हैं और न ही जांच की सुविधा। ऐसे में मरीजों को जिला मुख्यालय की दौड़ लगानी पड़ रही है। एक रुपये में मिलने वाले इलाज से पहले उन्हें सैकड़ों रुपये किराये में खर्च करने पड़ रहे हैं।
क्षेत्रफल के मामले में जिला खीरी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। मरीजों को इलाज के लिए लंबा फासला न तय करना पडे़, इसके लिए जिला अस्पताल के लिए अलावा जिले में 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। हालांकि अधिकांश स्वास्थ्य केंद्र चिकित्सक की कमी से जूझ रहे है।
जिले की कई ऐसी सीएचसी हैं, जहां कई वर्षों से मुख्य चिकित्सकों की कमी है। चिकित्सक न होने से सम्पन्न लोग तो प्राइवेट अस्पतालों का सहारा लेते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजाेर लोग कई किलोमीटर की दूरी तक करके जिला अस्पताल का रुख करते हैं।
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वहीं सीएचसी पर इलाज न मिल पाने के कारण जिला अस्पताल पर मरीजों का दबाव बढ़ रहा है। सोमवार को जिला अस्पताल में 1373 मरीज की ओपीडी रही। दूरदराज से आए मरीजों को अपनी बारी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा।
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इन सीएचसी पर इन चिकित्सकों की है कमी
निघासन : 10 साल से बाल रोग विशेषज्ञ, 13 साल से नेत्र चिकित्सक नहीं।
बिजुआ : नेत्र रोग विशेषज्ञ, फिजीशियन, ईएनटी, बाल रोग विशेषज्ञ, एनेस्थेसिया चिकित्सक, हड्डी रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ, स्त्रीरोग विशेषज्ञ नहीं।
मोहम्मदी : कई साल से नेत्र रोग विशेषज्ञ, दो साल से नहीं हड्डी रोग, मानसिक रोग चिकित्सक नहीं।
गोलागोकर्णनाथ : एक एमडी मेडिसिन, सर्जन, हड्डी रोग विशेषज्ञ, निश्चतेक नहीं।
खमरिया : पांच साल से बाल रोग विशेषज्ञ, सात साल से स्त्री रोग, चार साल से नेत्र चिकित्सक नहीं।
पसगवां : हड्डी रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ, निश्चेतक, नेत्र चिकित्सक, नेत्र सहायक, डेंटल हाईजिनिस्ट, क्षय रोग चिकित्सक व चेस्ट विशेषज्ञ नहीं।
मितौली : तीन साल से स्त्री व बाल रोग विशेषज्ञ, पिछले वर्ष से हड्डी रोग व दन्त चिकित्सक नहीं।
फूलबेहड़ : आंख, बाल रोग, हड्डी रोग के डाक्टर नहीं। दंत रोग विशेषज्ञ डाॅ. अंकिता हैं, लेकिन मशीन के आधे पुर्जे नहीं।
बेहजम : स्त्री रोग, हड्डी व आंख के डॉक्टर नहीं। डेन्टल हैं, लेकिन जिला अस्पताल में अटैच हैं। चार की जगह सिर्फ दो फार्मासिस्ट तैनात।
पलिया कलां : 11 साल से सर्जन, तीन साल से बाल रोग, छह साल से स्त्री रोग विशेषज्ञ, तीन साल से नेत्र रोग विशेषज्ञ, चार साल से डेंटल सर्जन नहीं।
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इतने मरीजों की होती है ओपीडी
गोलागोकर्णनाथ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिदिन करीब एक हजार मरीज अपने इलाज के लिए पहुंचते हैं। कई मुख्य रोग के चिकित्सक न होने के कारण मरीजों को लखीमपुर जाना पड़ता है। फूलबेहड़ सीएचसी में प्रतिदिन 200 से 250 मरीजों की ओपीडी होती है। निघासन सीएचएसी में भी करीब 250-300 मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। पलिया सीएचसी में भी प्रतिदिन करीब 400 से ऊपर मरीजों की ओपीडी रहती है।
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जिला अस्पताल व महिला अस्पताल में भी चिकित्सकों की कमी
जिला अस्पताल में कॉर्डियोलॉजिस्ट की कमी है। दूर गांव से इलाज के जिला अस्पताल आने वाले मरीजों को ह्रदय रोग के लिए लखनऊ तक चक्कर लगाना पड़ता है। वहीं जिला महिला अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ की कमी है। चिकित्सक की कमी के कारण जिला महिला अस्पताल में सोमवार को महिलाओं की भीड़ लगी रही। जिला महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. ज्योति मेहरोत्रा मरीजों को देखते हुए मिलीं।
वर्जन
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेषज्ञ नहीं होते हैं। वहां सिर्फ चिकित्साधिकारियों को तैनात किया जाता है। जहां कहीं चिकित्साधिकारियों की कमी है, उसके लिए शासन को लिखा गया है।
डॉ. संतोष गुप्ता, मुख्य चिकित्साधिकारी
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क्षेत्रफल के मामले में जिला खीरी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। मरीजों को इलाज के लिए लंबा फासला न तय करना पडे़, इसके लिए जिला अस्पताल के लिए अलावा जिले में 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र हैं। हालांकि अधिकांश स्वास्थ्य केंद्र चिकित्सक की कमी से जूझ रहे है।
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जिले की कई ऐसी सीएचसी हैं, जहां कई वर्षों से मुख्य चिकित्सकों की कमी है। चिकित्सक न होने से सम्पन्न लोग तो प्राइवेट अस्पतालों का सहारा लेते हैं, लेकिन आर्थिक रूप से कमजाेर लोग कई किलोमीटर की दूरी तक करके जिला अस्पताल का रुख करते हैं।
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वहीं सीएचसी पर इलाज न मिल पाने के कारण जिला अस्पताल पर मरीजों का दबाव बढ़ रहा है। सोमवार को जिला अस्पताल में 1373 मरीज की ओपीडी रही। दूरदराज से आए मरीजों को अपनी बारी के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा।
इन सीएचसी पर इन चिकित्सकों की है कमी
निघासन : 10 साल से बाल रोग विशेषज्ञ, 13 साल से नेत्र चिकित्सक नहीं।
बिजुआ : नेत्र रोग विशेषज्ञ, फिजीशियन, ईएनटी, बाल रोग विशेषज्ञ, एनेस्थेसिया चिकित्सक, हड्डी रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ, स्त्रीरोग विशेषज्ञ नहीं।
मोहम्मदी : कई साल से नेत्र रोग विशेषज्ञ, दो साल से नहीं हड्डी रोग, मानसिक रोग चिकित्सक नहीं।
गोलागोकर्णनाथ : एक एमडी मेडिसिन, सर्जन, हड्डी रोग विशेषज्ञ, निश्चतेक नहीं।
खमरिया : पांच साल से बाल रोग विशेषज्ञ, सात साल से स्त्री रोग, चार साल से नेत्र चिकित्सक नहीं।
पसगवां : हड्डी रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ, निश्चेतक, नेत्र चिकित्सक, नेत्र सहायक, डेंटल हाईजिनिस्ट, क्षय रोग चिकित्सक व चेस्ट विशेषज्ञ नहीं।
मितौली : तीन साल से स्त्री व बाल रोग विशेषज्ञ, पिछले वर्ष से हड्डी रोग व दन्त चिकित्सक नहीं।
फूलबेहड़ : आंख, बाल रोग, हड्डी रोग के डाक्टर नहीं। दंत रोग विशेषज्ञ डाॅ. अंकिता हैं, लेकिन मशीन के आधे पुर्जे नहीं।
बेहजम : स्त्री रोग, हड्डी व आंख के डॉक्टर नहीं। डेन्टल हैं, लेकिन जिला अस्पताल में अटैच हैं। चार की जगह सिर्फ दो फार्मासिस्ट तैनात।
पलिया कलां : 11 साल से सर्जन, तीन साल से बाल रोग, छह साल से स्त्री रोग विशेषज्ञ, तीन साल से नेत्र रोग विशेषज्ञ, चार साल से डेंटल सर्जन नहीं।
इतने मरीजों की होती है ओपीडी
गोलागोकर्णनाथ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिदिन करीब एक हजार मरीज अपने इलाज के लिए पहुंचते हैं। कई मुख्य रोग के चिकित्सक न होने के कारण मरीजों को लखीमपुर जाना पड़ता है। फूलबेहड़ सीएचसी में प्रतिदिन 200 से 250 मरीजों की ओपीडी होती है। निघासन सीएचएसी में भी करीब 250-300 मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। पलिया सीएचसी में भी प्रतिदिन करीब 400 से ऊपर मरीजों की ओपीडी रहती है।
जिला अस्पताल व महिला अस्पताल में भी चिकित्सकों की कमी
जिला अस्पताल में कॉर्डियोलॉजिस्ट की कमी है। दूर गांव से इलाज के जिला अस्पताल आने वाले मरीजों को ह्रदय रोग के लिए लखनऊ तक चक्कर लगाना पड़ता है। वहीं जिला महिला अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ की कमी है। चिकित्सक की कमी के कारण जिला महिला अस्पताल में सोमवार को महिलाओं की भीड़ लगी रही। जिला महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. ज्योति मेहरोत्रा मरीजों को देखते हुए मिलीं।
वर्जन
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेषज्ञ नहीं होते हैं। वहां सिर्फ चिकित्साधिकारियों को तैनात किया जाता है। जहां कहीं चिकित्साधिकारियों की कमी है, उसके लिए शासन को लिखा गया है।
डॉ. संतोष गुप्ता, मुख्य चिकित्साधिकारी