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संकट में हैं प्रकृति के सफाईकर्मी

Sat, 06 Sep 2014 05:32 AM IST
Lakhimpur
Lakhimpur Updated Sat, 06 Sep 2014 05:32 AM IST
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डेक्लोफेनिक दवा बन रही काल, प्राकृतिक आवास में आ रही कमी से भी घट रहे गिद्ध
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लखीमपुर खीरी। प्रकृति के सफाई कर्मी कहे जाने वाले गिद्ध संकट में हैं। उनकी घटती संख्या पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारिस्थितिकी तंत्र से गिद्धों का विलुप्त होना हमारी खाद्य शृंखला के लिए घातक है। गिद्धों की घटती संख्या के चलते मृत शरीरों के निस्तारण की समस्या जटिल हो रही है।
पक्षियों पर गहन अध्ययन करने वाले दक्षिण खीरी वन प्रभाग में डिप्टी रेंजर अशोक कश्यप बताते हैं कि गिद्धों की 22 प्रजातियां होती हैं। इनमें से 15 पूर्वी देशों और सात पश्चिमी देशों में पाई जाती हैं। गिद्ध की चोंच लंबी अंकुशनुमा होती है इससे वह मृत जानवर के शव को नोचकर खाने के बाद भी स्वच्छ रहते हैं। गिद्ध अपना भोजन करने के तुरंत बाद स्नान करना पसंद करते हैं। उत्तर प्रदेश में इजिप्सियन वल्चर, जिप्स इन्डिकस वल्चर, व्हाइट नेक्ड वल्चर, स्लेंडर विल्ड वल्चर, किंग वल्चर, ग्रिफान वल्चर, सिनेरियस वल्चर और हिमालयन ग्रिफान वल्चर आठ प्रजातियों के गिद्ध मिलते हैं।
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अशोक कश्यप बताते हैं कि पशु चिकित्सा में बुखार, सूजन और दर्द के इलाज के लिए उपयोग में लाई जाने वाली डेक्लोफेनिक दवा गिद्धों के लिए घातक साबित हो रही है। इस दवा का सेवन करने वाले जानवरों के मरने पर जब उनका मांस गिद्ध खाते हैं तो उनके गुर्दों मे गाउट नामक रोग हो जाता है जो गिद्धों के लिए प्राणघातक होता है। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते गिद्ध उड़ान नहीं भर पाते हैं। बढ़ते तापमान के कारण शरीर में पानी की कमी होने से यूरिक एसिड के कारण इनके हृदय, लीवर और किडनी में कण जम जाने से इनकी मृत्यु हो जाती है।
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वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह ने बताया कि गिद्धों की कई प्रजातियां संकट ग्रस्त हैं। अनेक प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। गिद्धों के संरक्षण के लिए तराई को डेक्लाफेनिक फ्री जोन बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके सकारात्मक परिणाम आने शुरू हो गए हैं। यही कारण है कि तराई में गिद्धों की आबादी बढ़ना शुरू हो गई है।

डीएफओ साउथ नीरज कुमार का कहना है कि गिद्धों के संरक्षण के लिए उनके प्राकृतिक आवास विशेषकर घोंसले बनाने के लिए विशालकाय पेड़ों के संरक्षण की जरूरत है। यदि हमने वन्यजीवों और वनस्पतियों के संरक्षण, संवर्धन और सुरक्षा पर ध्यान न दिया तो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्थिति काफी भयावह हो जाएगी।
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