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बदल रही जंगल की आबोहवा घट रही भालू की आबादी
Updated Fri, 13 Apr 2018 07:47 PM IST
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13एलकेएच 08
बदलती जंगल की आबोहवा
में घट रही भालू की आबादी
जंगल में आती बाढ़ उजाड़ रही भालुओं का आशियाना
- वानस्पतिक ढांचा बदलने से भोजन का भी संकट
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी।
दुधवा नेशनल पार्क, किशनपुर सेंक्चुरी और कर्तनिया घाट में भालू की आबादी लगातार घट रही है। दक्षिण खीरी वन प्रभाग के भीरा और मैलानी रेंज में भालू की बहुतायत थी, लेकिन अब इनकी संख्या काफी कम हो चुकी है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि भालू की आबादी घटने का मुख्य कारण जंगल की बदलती आबोहवा और जंगलों में बढ़ता इंसानी दखल है।
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह बताते हैं कि तराई के जंगलों में स्लॉथ बियर प्रजाति के भालू पाए जाते हैं। भालू शर्मीला जानवर होता है। यह झुंड में न रहकर अलग-अलग रहते हैं। भालू मनुष्य की तरह शाकाहारी और मांसाहारी दोनों होता है। भालू जंगली फलफूल जैसे बेर, महुआ आदि चाव से खाता है। यह शहद का भी काफी शौकीन होता है। भालू मधुमक्खियों के छत्तों से शहद निकालकर खा जाता है। यह दीमक को तो खाता ही है भूखे होने पर मरे हुए जानवरों का मांस भी खा जाता है। भालू की ऊंचाई करीब 65 सेमी और लंबाई साढ़े चार से साढ़े पांच फुट तक होती है। नर भालू का वजन 127 किलो से लेकर 145 किलोग्राम तक होता है, जबकि मादा का वजन 65 किलोग्राम के आसपास होता है।
भालू का ब्रीडिंग सीजन गर्मियों में होता है। इनका गर्भकाल सात माह का होता है। दो से तीन साल तक बच्चे मां के साथ ही रहते हैं। मादा छोटे बच्चों को अपनी पीठ पर लाद कर चलती है। भालू की औसत उम्र 40 साल होती है। इसकी शारीरिक संरचना भी मनुष्य से काफी मिलती जुलती है। इसके पगमार्क भी इंसानों की तरह ही बनते हैं। यह ठंडे स्थानों पर रहना पसंद करते हैं।
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बढ़ती गर्मी और बाढ़
ने उजाड़ा आशियाना
पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से दुधवा नेशनल पार्क और किशनपुर सेंक्चुरी में नेपाली नदियों से बाढ़ का पानी आने के कारण दुधवा का वानस्पतिक ढंाचा बदल रहा है। भालू मिट्टी खोदने के बाद मांद बनाकर रहता है। बाढ़ गुजरने के बाद लंबे अरसे तक कई इलाकों में पानी भरा रहने से भालुओं की मांद में पानी भर जाता है। इससे उनके आवास का संकट पैदा हो रहा है। बाढ़ की वजह से जो वानस्पतिक ढांचा बदला है उससे भालू के भोजन का संकट भी पैदा हुआ है। इधर, लगातार गर्मी बढ़ने से अब तराई की धरती भी भालुओं के अनुकूल नहीं रह गई है।
भालू की आबादी एक नजर में
वनक्षेत्र वर्ष 2010 2013 2016
दुधवा नेशलन पार्क 108 92 102
दक्षिण खीरी 05 02 00
भालू लुप्त हो रही प्रजाति श्रेणी का जीव है। इसके संरक्षण के लिए भी सार्थक प्रयास होने चाहिए। आगरा में भालू के लिए बने रेस्क्यू सेंटर में पल रहे भालुओं को भालू की मौजूदगी वाले जंगल में छोड़ा जाना चाहिए। ताकि उनकी आबादी में इजाफा हो सके। जंगल में आने वाली बाढ़ से भालुओं के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंच रहा है। इसे संरक्षित और समुचित सुधार करने की जरूरत है।
-डॉ. वीपी सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ
दुधवा नेशनल पार्क में चल रहे संरक्षण कार्यक्रम के तहत दुधवा में भालुओं की संख्या में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2013 में दुधवा में 92 भालू थे, 2016 में इनकी संख्या बढ़कर 102 हो गई है जो अच्छा संकेत है।
- महावीर कौजलगि, उपनिदेशक, दुधवा नेशनल पार्क
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बदलती जंगल की आबोहवा
में घट रही भालू की आबादी
जंगल में आती बाढ़ उजाड़ रही भालुओं का आशियाना
- वानस्पतिक ढांचा बदलने से भोजन का भी संकट
अमर उजाला ब्यूरो
लखीमपुर खीरी।
दुधवा नेशनल पार्क, किशनपुर सेंक्चुरी और कर्तनिया घाट में भालू की आबादी लगातार घट रही है। दक्षिण खीरी वन प्रभाग के भीरा और मैलानी रेंज में भालू की बहुतायत थी, लेकिन अब इनकी संख्या काफी कम हो चुकी है। वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि भालू की आबादी घटने का मुख्य कारण जंगल की बदलती आबोहवा और जंगलों में बढ़ता इंसानी दखल है।
वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह बताते हैं कि तराई के जंगलों में स्लॉथ बियर प्रजाति के भालू पाए जाते हैं। भालू शर्मीला जानवर होता है। यह झुंड में न रहकर अलग-अलग रहते हैं। भालू मनुष्य की तरह शाकाहारी और मांसाहारी दोनों होता है। भालू जंगली फलफूल जैसे बेर, महुआ आदि चाव से खाता है। यह शहद का भी काफी शौकीन होता है। भालू मधुमक्खियों के छत्तों से शहद निकालकर खा जाता है। यह दीमक को तो खाता ही है भूखे होने पर मरे हुए जानवरों का मांस भी खा जाता है। भालू की ऊंचाई करीब 65 सेमी और लंबाई साढ़े चार से साढ़े पांच फुट तक होती है। नर भालू का वजन 127 किलो से लेकर 145 किलोग्राम तक होता है, जबकि मादा का वजन 65 किलोग्राम के आसपास होता है।
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भालू का ब्रीडिंग सीजन गर्मियों में होता है। इनका गर्भकाल सात माह का होता है। दो से तीन साल तक बच्चे मां के साथ ही रहते हैं। मादा छोटे बच्चों को अपनी पीठ पर लाद कर चलती है। भालू की औसत उम्र 40 साल होती है। इसकी शारीरिक संरचना भी मनुष्य से काफी मिलती जुलती है। इसके पगमार्क भी इंसानों की तरह ही बनते हैं। यह ठंडे स्थानों पर रहना पसंद करते हैं।
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बढ़ती गर्मी और बाढ़
ने उजाड़ा आशियाना
पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से दुधवा नेशनल पार्क और किशनपुर सेंक्चुरी में नेपाली नदियों से बाढ़ का पानी आने के कारण दुधवा का वानस्पतिक ढंाचा बदल रहा है। भालू मिट्टी खोदने के बाद मांद बनाकर रहता है। बाढ़ गुजरने के बाद लंबे अरसे तक कई इलाकों में पानी भरा रहने से भालुओं की मांद में पानी भर जाता है। इससे उनके आवास का संकट पैदा हो रहा है। बाढ़ की वजह से जो वानस्पतिक ढांचा बदला है उससे भालू के भोजन का संकट भी पैदा हुआ है। इधर, लगातार गर्मी बढ़ने से अब तराई की धरती भी भालुओं के अनुकूल नहीं रह गई है।
भालू की आबादी एक नजर में
वनक्षेत्र वर्ष 2010 2013 2016
दुधवा नेशलन पार्क 108 92 102
दक्षिण खीरी 05 02 00
भालू लुप्त हो रही प्रजाति श्रेणी का जीव है। इसके संरक्षण के लिए भी सार्थक प्रयास होने चाहिए। आगरा में भालू के लिए बने रेस्क्यू सेंटर में पल रहे भालुओं को भालू की मौजूदगी वाले जंगल में छोड़ा जाना चाहिए। ताकि उनकी आबादी में इजाफा हो सके। जंगल में आने वाली बाढ़ से भालुओं के प्राकृतिक आवास को नुकसान पहुंच रहा है। इसे संरक्षित और समुचित सुधार करने की जरूरत है।
-डॉ. वीपी सिंह, वन्यजीव विशेषज्ञ
दुधवा नेशनल पार्क में चल रहे संरक्षण कार्यक्रम के तहत दुधवा में भालुओं की संख्या में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2013 में दुधवा में 92 भालू थे, 2016 में इनकी संख्या बढ़कर 102 हो गई है जो अच्छा संकेत है।
- महावीर कौजलगि, उपनिदेशक, दुधवा नेशनल पार्क