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आजादी के 70 साल बाद भी बदहाल है शहीद का गांव
Updated Sat, 09 Dec 2017 12:02 AM IST
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आजादी के 70 साल बाद भी बदहाल है शहीद का गांव
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, लखीमपुर खीरी
भीखमपुर (लखीमपुर खीरी)।
जंगे आजादी में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले शहीद राजनरायन मिश्र का गांव भीखमपुर आजादी के 70 साल बाद भी उपेक्षित है। गांव के विकास की बात जाने दीजिए शहीद की प्रतिमा को छत तक नसीब नहीं हो पाई है। मूलभूत सुविधाओं से वंचित भीखमपुर गांव में न तो एक अदद इंटर कालेज है और न ही स्वास्थ्य के लिए प्राथमिक चिकित्सालय।
भीखमपुर गांव में स्वास्थ्य के नाम पर महज एक आयुर्वेदिक अस्पताल, शिक्षा के नाम पर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय है, जबकि माध्यमिक शिक्षा के लिए राजकीय स्कूल का निर्माण कराया जा रहा है। दो आंगनबाड़ी सेंटरों में एक भी अभी तक नहीं बन पाया है। प्राथमिक स्कूल तक जाने के लिए कोई रास्ता तक नहीं है। जल निकासी के लिए गांव में बनी नालियां चौक पड़ी हैं। गंदगी के कारण मच्छरों का प्रकोप झेलना यहां के लोगों की मजबूरी बन चुकी है।
वर्ष 1944 में राजनरायन मिश्र को हुई थी फांसी
भीखमपुर गांव के राजनरायन मिश्र को स्वतंत्रता आंदोलन में खिलाफत आंदोलन के दौरान महमूदाबाद के जिलेदार की हत्या के आरोप में नौ दिसंबर 1944 को लखनऊ जेल में फांसी पर लटका दिया गया था। उस समय राजनरायन मिश्र की उम्र सिर्फ 24 साल थी। राजनरायन की फांसी स्वतंत्रता आंदोलन की अंतिम फांसी थी। दो अक्टूबर 1984 में पूर्व विधायक कमाल अहमद रिजवी ने गांव में शहीद राजनरायन की प्रतिमा तो स्थापित कर दी लेकिन अभी तक प्रतिमा को छत तक नसीब नहीं हो पाई है।
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किसी ने महसूस नहीं किया भीखमपुर का दर्द
गांव में सबसे बुजुर्ग 90 वर्षीय हनुमान प्रसाद मिश्र का कहना है कि शहीद राजनारायण के नाम से शासन प्रशासन ने कुछ नही किया। वर्ष 1984 में उनके नाम से बना स्कूल आज बदहाल है उसको मान्यता तक नहीं है।
बीस वर्षीय युवा शोभित का कहना है कि शिक्षा को लेकर गांव में सरकार की ओर से कुछ नही किया गया। प्राथमिक स्कूल में बच्चों के लिये रास्ता तक नहीं है उनको दूसरे के खेतों में पगडंडी से जाना पड़ता है।
गांव के 76 वर्षीय शिवगोविंद का कहना है कि गांव में सड़क और नालियों की प्रमुख समस्या है। सड़क के साथ नालियां नही बनाई गईं। पिछले वर्ष जनेश्वर मिश्र योजना के अंतर्गत बनी सड़कों के साथ नालियां नहीं बनीं, जिससे गांव में जलभराव की समस्या बनी हुई है।
युवा राघवेंद्र का कहना है कि गांव में मरीजों के इलाज के लिये केवल एक आयुर्वेदिक अस्पताल है, उसमें भी कोई डॉक्टर नहीं है। ग्रामीणों का कब्जा रहने से गंदगी रहती है। एक अस्पताल की आशा गांव के लोग बहुत दिनों से लगाए बैठे हैं एएनएम सेंटर की स्थिति भी बदहाल है।
प्रधान प्रतिनिधि राजीव कुमार पांडे ने बताया कि आजादी के बाद गांव उनके नाम से कुछ ऐसा नही हुआ जो शहीद की यादगार बने। 30 वर्ष से ज्यादा समय विद्युतीकरण हो जाने के बाद गांव के तार जर्जर अवस्था मे झूल रहे हैं। विद्युत विभाग इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है।
शहीद राजनरायन मिश्र की शहादत को जिला ही नहीं पूरा देश सलाम करता है। उनके गांव की उपेक्षा दुखद है। गांव का भ्रमण करने के बाद गांव के विकास के लिए जो बन पड़ेगा करने का प्रयास किया जाएगा। शहीद के सम्मान का पूरा ध्यान रखा जाएगा।
- शैलेंद्र सिंह, डीएम खीरी
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जंगे आजादी में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले शहीद राजनरायन मिश्र का गांव भीखमपुर आजादी के 70 साल बाद भी उपेक्षित है। गांव के विकास की बात जाने दीजिए शहीद की प्रतिमा को छत तक नसीब नहीं हो पाई है। मूलभूत सुविधाओं से वंचित भीखमपुर गांव में न तो एक अदद इंटर कालेज है और न ही स्वास्थ्य के लिए प्राथमिक चिकित्सालय।
भीखमपुर गांव में स्वास्थ्य के नाम पर महज एक आयुर्वेदिक अस्पताल, शिक्षा के नाम पर प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय है, जबकि माध्यमिक शिक्षा के लिए राजकीय स्कूल का निर्माण कराया जा रहा है। दो आंगनबाड़ी सेंटरों में एक भी अभी तक नहीं बन पाया है। प्राथमिक स्कूल तक जाने के लिए कोई रास्ता तक नहीं है। जल निकासी के लिए गांव में बनी नालियां चौक पड़ी हैं। गंदगी के कारण मच्छरों का प्रकोप झेलना यहां के लोगों की मजबूरी बन चुकी है।
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वर्ष 1944 में राजनरायन मिश्र को हुई थी फांसी
भीखमपुर गांव के राजनरायन मिश्र को स्वतंत्रता आंदोलन में खिलाफत आंदोलन के दौरान महमूदाबाद के जिलेदार की हत्या के आरोप में नौ दिसंबर 1944 को लखनऊ जेल में फांसी पर लटका दिया गया था। उस समय राजनरायन मिश्र की उम्र सिर्फ 24 साल थी। राजनरायन की फांसी स्वतंत्रता आंदोलन की अंतिम फांसी थी। दो अक्टूबर 1984 में पूर्व विधायक कमाल अहमद रिजवी ने गांव में शहीद राजनरायन की प्रतिमा तो स्थापित कर दी लेकिन अभी तक प्रतिमा को छत तक नसीब नहीं हो पाई है।
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किसी ने महसूस नहीं किया भीखमपुर का दर्द
गांव में सबसे बुजुर्ग 90 वर्षीय हनुमान प्रसाद मिश्र का कहना है कि शहीद राजनारायण के नाम से शासन प्रशासन ने कुछ नही किया। वर्ष 1984 में उनके नाम से बना स्कूल आज बदहाल है उसको मान्यता तक नहीं है।
बीस वर्षीय युवा शोभित का कहना है कि शिक्षा को लेकर गांव में सरकार की ओर से कुछ नही किया गया। प्राथमिक स्कूल में बच्चों के लिये रास्ता तक नहीं है उनको दूसरे के खेतों में पगडंडी से जाना पड़ता है।
गांव के 76 वर्षीय शिवगोविंद का कहना है कि गांव में सड़क और नालियों की प्रमुख समस्या है। सड़क के साथ नालियां नही बनाई गईं। पिछले वर्ष जनेश्वर मिश्र योजना के अंतर्गत बनी सड़कों के साथ नालियां नहीं बनीं, जिससे गांव में जलभराव की समस्या बनी हुई है।
युवा राघवेंद्र का कहना है कि गांव में मरीजों के इलाज के लिये केवल एक आयुर्वेदिक अस्पताल है, उसमें भी कोई डॉक्टर नहीं है। ग्रामीणों का कब्जा रहने से गंदगी रहती है। एक अस्पताल की आशा गांव के लोग बहुत दिनों से लगाए बैठे हैं एएनएम सेंटर की स्थिति भी बदहाल है।
प्रधान प्रतिनिधि राजीव कुमार पांडे ने बताया कि आजादी के बाद गांव उनके नाम से कुछ ऐसा नही हुआ जो शहीद की यादगार बने। 30 वर्ष से ज्यादा समय विद्युतीकरण हो जाने के बाद गांव के तार जर्जर अवस्था मे झूल रहे हैं। विद्युत विभाग इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है।
शहीद राजनरायन मिश्र की शहादत को जिला ही नहीं पूरा देश सलाम करता है। उनके गांव की उपेक्षा दुखद है। गांव का भ्रमण करने के बाद गांव के विकास के लिए जो बन पड़ेगा करने का प्रयास किया जाएगा। शहीद के सम्मान का पूरा ध्यान रखा जाएगा।
- शैलेंद्र सिंह, डीएम खीरी