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Kushinagar News: स्मार्टफोन की लत से चिड़चिड़े हो रहे बच्चे
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पडरौना। डिजिटल दौर में जीवनशैली में आए बदलाव से बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं। इससे बच्चों का स्क्रीन टाइम मोबाइल, टीवी और टैबलेट देखने का समय लगातार बढ़ रहा है। घंटों मोबाइल पर आंखें टिकाए रखने से बच्चों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में बदलाव देखने को मिल रहे हैं। बच्चों में अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, जिद्दीपन, उग्रता और पढ़ाई में एकाग्रता की कमी सामने आ रही है। बाल रोग विशेषज्ञ अभिभावकों को सतर्क रहने तथा बच्चों को स्मार्टफोन की लत से दूर रखने की सलाह दे रहे हैं।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. हरिकेश्वर मिश्रा ने बताया कि बदले परिवेश में 3 से 12 वर्ष के बच्चों में मोबाइल देखने की आदत अब लत का रूप ले चुकी है। भोजन करने से लेकर सोने तक के समय में बच्चे मोबाइल मांग रहे हैं। इससे उनके मस्तिष्क के शारीरिक विकास पर खराब प्रभाव पड़ रहा है। लगातार मोबाइल देखने से बच्चों में आंखों में जलन, सिरदर्द, नींद न आना और अलग-थलग रहने जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। मोबाइल छीनने पर बच्चे आक्रोश व्यक्त करने लगते हैं, जिससे उनका पढ़ाई और रचनात्मक कार्यों में मन नहीं लगता।
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यदि बच्चा मोबाइल मिलने पर बहुत अधिक जिद, गुस्सा या आक्रामक व्यवहार करे तो इसे नजरअंदाज करें। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ से सलाह लें।बच्चों को डिजिटल लत के बचाकर ही उनके बेहतर स्वास्थ्य की नींव रखी जाती है। -डॉ. स्नेह कुमार, मानसिक रोग विभाग, मेडिकल कॉलेज कुशीनगर
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इन बातों का रखें ख्याल:
-स्क्रीन टाइम करें सीमित।
- मैदानी खेलों और आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें।
- अभिभावक खुद बने रोल मॉडल।
- बच्चों से पारिवारिक संवाद बढ़ाएं।
-उन्हें रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखें।
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केस (1)
मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में कुछ दिन पहले चार साल की बच्ची आई थी। उसे मोबाइल की लत थी। परिजन के मुताबिक, बच्ची की लत स्क्रीन देखकर ही खाना खाने की बताई जा रही थी। मोबाइल छीनने पर गुस्सा करती थी। इलाज के बाद उसके व्यवहार में सुधार आया।
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केस (2)
मोबाइल पर गेम खेलने की लत से जुड़े एक बच्चे को लेकर परिजन मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग आए थे। परिजन के मुताबिक, बच्चे को तेज-तेज आवाज में बोलकर गेम खेलने की लत लग गई थी। मना करने पर गुस्सा करने की शिकायत थी। नींद में भी बड़बड़ाने की लत थी। परिवार के लोगों को मल्टीमीडिया फोन की जगह की-पैड मोबाइल के प्रयोग की सलाह दी गई। जरूरी दवाएं भी दी गईं।
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बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. हरिकेश्वर मिश्रा ने बताया कि बदले परिवेश में 3 से 12 वर्ष के बच्चों में मोबाइल देखने की आदत अब लत का रूप ले चुकी है। भोजन करने से लेकर सोने तक के समय में बच्चे मोबाइल मांग रहे हैं। इससे उनके मस्तिष्क के शारीरिक विकास पर खराब प्रभाव पड़ रहा है। लगातार मोबाइल देखने से बच्चों में आंखों में जलन, सिरदर्द, नींद न आना और अलग-थलग रहने जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं। मोबाइल छीनने पर बच्चे आक्रोश व्यक्त करने लगते हैं, जिससे उनका पढ़ाई और रचनात्मक कार्यों में मन नहीं लगता।
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यदि बच्चा मोबाइल मिलने पर बहुत अधिक जिद, गुस्सा या आक्रामक व्यवहार करे तो इसे नजरअंदाज करें। ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ से सलाह लें।बच्चों को डिजिटल लत के बचाकर ही उनके बेहतर स्वास्थ्य की नींव रखी जाती है। -डॉ. स्नेह कुमार, मानसिक रोग विभाग, मेडिकल कॉलेज कुशीनगर
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इन बातों का रखें ख्याल:
-स्क्रीन टाइम करें सीमित।
- मैदानी खेलों और आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें।
- अभिभावक खुद बने रोल मॉडल।
- बच्चों से पारिवारिक संवाद बढ़ाएं।
-उन्हें रचनात्मक कार्यों में व्यस्त रखें।
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केस (1)
मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग में कुछ दिन पहले चार साल की बच्ची आई थी। उसे मोबाइल की लत थी। परिजन के मुताबिक, बच्ची की लत स्क्रीन देखकर ही खाना खाने की बताई जा रही थी। मोबाइल छीनने पर गुस्सा करती थी। इलाज के बाद उसके व्यवहार में सुधार आया।
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केस (2)
मोबाइल पर गेम खेलने की लत से जुड़े एक बच्चे को लेकर परिजन मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग आए थे। परिजन के मुताबिक, बच्चे को तेज-तेज आवाज में बोलकर गेम खेलने की लत लग गई थी। मना करने पर गुस्सा करने की शिकायत थी। नींद में भी बड़बड़ाने की लत थी। परिवार के लोगों को मल्टीमीडिया फोन की जगह की-पैड मोबाइल के प्रयोग की सलाह दी गई। जरूरी दवाएं भी दी गईं।
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