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Kushinagar News: बौद्ध महातीर्थ स्थल बनेगा पुरैना घाट 3.65 करोड़ से कराया जाएगा सुंदरीकरण
Fri, 07 Feb 2025 11:47 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Fri, 07 Feb 2025 11:47 PM IST
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जौरा बाजार। फाजिलनगर विकास खंड अंतर्गत रहसू जनोबीपट्टी का पुरैना घाट (ककुत्था) बहुत जल्द ही बौद्धों का महा तीर्थ स्थल बनेगा। इसी के साथ देश विदेश के बौद्ध अनुयायियों की संख्या भी बढ़ेगी। इससे सरकार को राजस्व की प्राप्ति होगी। यहां निर्माण के लिए शासन की ओर से 3.65 करोड़ की परियोजना की स्वीकृति मिली है। पर्यटन विभाग निर्माण कार्य भी शुरू करा दिया है।
ऐसी मान्यता है कि महात्मा बुद्ध जीवन के अंतिम यात्रा में निर्वाण के लिए कुशीनगर पंहुचने के पूर्व भगवान बुद्ध ने अंतिम बार स्नान और जलपान करने के पश्चात शिष्य चुंद को यही अंतिम उपदेश दिया था। पुरैना घाट नामक प्राचीन नदी का यह वही स्थान है, जिसका बौद्ध साहित्य में उल्लेख किया गया है। कुशीनगर पंहुचने के लिए बुद्ध की अंतिम यात्रा मगध और वैशाली से हुई थी।
वैशाली से चलकर भंडग्राम, जंबूग्राम, आम्रग्राम (वर्तमान समय में सभी बिहार प्रांत के गोपालगंज जिले में भोगनगर (बदुरांव) पावा (वीरभारी उसमानपुर) घोड़ धाप (बकुलहर) होते हुए ककुत्था पर पहुंचे थे। उस समय अतिसार जन्य गरिष्ठ भोजन शिष्य चुंद की ओर से तथागत को दिया गया था। इसके कारण वे अतिसार रोग का शिकार हो गए थे। फिर भी शिष्य चुंद उनकी अंतिमम यात्रा में पावा (वीर भारी) से लेकर ककुत्था तक साथ रहे। भोजन देने का कलंक उनके सिर पर था और उसके लिए कलंकित मंतव्य को ध्यान में रखकर ही उनके शांति के लिए महात्मा बुद्ध ककुत्था के पूर्वी तट पर स्थित रसाल वन में उपदेश देते हुए उन्हें निष्कलंकता का वरदान देकर उन्हें विदा किया था।
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ऐसी मान्यता है कि महात्मा बुद्ध जीवन के अंतिम यात्रा में निर्वाण के लिए कुशीनगर पंहुचने के पूर्व भगवान बुद्ध ने अंतिम बार स्नान और जलपान करने के पश्चात शिष्य चुंद को यही अंतिम उपदेश दिया था। पुरैना घाट नामक प्राचीन नदी का यह वही स्थान है, जिसका बौद्ध साहित्य में उल्लेख किया गया है। कुशीनगर पंहुचने के लिए बुद्ध की अंतिम यात्रा मगध और वैशाली से हुई थी।
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वैशाली से चलकर भंडग्राम, जंबूग्राम, आम्रग्राम (वर्तमान समय में सभी बिहार प्रांत के गोपालगंज जिले में भोगनगर (बदुरांव) पावा (वीरभारी उसमानपुर) घोड़ धाप (बकुलहर) होते हुए ककुत्था पर पहुंचे थे। उस समय अतिसार जन्य गरिष्ठ भोजन शिष्य चुंद की ओर से तथागत को दिया गया था। इसके कारण वे अतिसार रोग का शिकार हो गए थे। फिर भी शिष्य चुंद उनकी अंतिमम यात्रा में पावा (वीर भारी) से लेकर ककुत्था तक साथ रहे। भोजन देने का कलंक उनके सिर पर था और उसके लिए कलंकित मंतव्य को ध्यान में रखकर ही उनके शांति के लिए महात्मा बुद्ध ककुत्था के पूर्वी तट पर स्थित रसाल वन में उपदेश देते हुए उन्हें निष्कलंकता का वरदान देकर उन्हें विदा किया था।
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