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Kushinagar News: बुद्ध की धरा पर सूर्य की उपेक्षा...चार दशक बाद भी पर्यटन की प्रतीक्षा
Wed, 29 Jul 2026 01:28 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Wed, 29 Jul 2026 01:28 AM IST
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तुर्कपट्टी में सूर्य मंदिर में नीलमणि पत्थर वाली प्रतिमा।
गुरवलिया बाजार (कुशीनगर)। तुर्कपट्टी का गुप्तकालीन सूर्य मंदिर अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है। इस वर्ष भी 31 जुलाई को सूर्य मूर्ति प्राकट्य उत्सव में 151 नदियों के जल से भगवान सूर्य का महाभिषेक होगा। लखनऊ से उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, सुरेश खन्ना और प्रयागराज से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कलश यात्रा को रवाना कर आयोजन को प्रदेश स्तर की पहचान दी है। इसके बावजूद पर्यटन विकास के मोर्चे पर मंदिर की तस्वीर धुंधली बनी हुई है।
क्षेत्र के महुअवा बुजुर्ग स्थित सूर्य मंदिर की तुलना इसकी स्थापत्य और ऐतिहासिक महत्ता के कारण ओडिशा के विश्वप्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से की जाती है। अंतर केवल इतना है कि जहां कोणार्क विश्व पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन चुका है, वहीं तुर्कपट्टी का सूर्य मंदिर चार दशक बाद भी उपेक्षा का दंश झेल रहा है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस धरोहर के संरक्षण, प्रचार और पर्यटन विकास पर गंभीरता से काम किया गया होता तो यह मंदिर भी पूर्वांचल की धार्मिक पहचान का बड़ा केंद्र बन सकता था।
31 जुलाई 1981 को सूर्यग्रहण के दिन ग्रामीणों द्वारा की गई खुदाई में यहां भगवान सूर्य की दो प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। इनमें एक दुर्लभ काले नीलमणि पत्थर और दूसरी बलुई पत्थर की प्रतिमा थी।इतिहासकारों ने इन्हें गुप्तकालीन माना। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, ग्रामीण सुदामा को सपने में इस स्थान पर सूर्य प्रतिमा होने का संकेत मिला था, जिसके बाद तत्कालीन ग्राम प्रधान मथुरा शाही के नेतृत्व में खुदाई कराई गई। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 31 जुलाई को सूर्य मूर्ति प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है।
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1998 के बाद किसी डीएम ने नहीं ली सुध
-शुरुआती वर्षों में संस्कृति विभाग और स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से सूर्य महोत्सव का आयोजन हुआ। वर्ष 1998 में डीएम रहे वीके श्रीवास्तव के प्रयास से पर्यटन विभाग ने लगभग 25 लाख रुपये से मंदिर परिसर का सुंदरीकरण कराया था। इसके बाद विकास की गति लगभग थम गई। कुछ छिटपुट काम हुए, जिसमें यज्ञशाला, बैठने की जगह, पीने के पानी और विश्रामगृह शामिल हैं। तत्कालीन मंत्री शिवपाल यादव के आदेश पर महुअवा गांव में एक गेस्ट हाउस भी बना है।
विडंबना यह है कि हर वर्ष सूर्य मूर्ति प्राकट्य उत्सव का दायरा बढ़ता जा रहा है। इस वर्ष भी देश की 151 नदियों के जल से भगवान भास्कर का महाभिषेक होगा। तुर्कपट्टी का सूर्य मंदिर अब तक किसी प्रभावी पर्यटन सर्किट का हिस्सा नहीं बन पाया। यदि इसे कुशीनगर बौद्ध सर्किट, गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर, अयोध्या, वाराणसी और नेपाल के लुंबिनी से जोड़कर एक समेकित धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर विकसित किया जाए तो यह पूर्वांचल का सबसे बड़ा बहुआयामी धार्मिक पर्यटन मॉडल बन सकता है। इससे पर्यटकों का ठहराव बढ़ेगा, स्थानीय व्यापार, होटल, हस्तशिल्प, परिवहन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलेगी।
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कोट
यह गुप्तकालीन धरोहर भी है। हर साल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है। रोज शादियां तय होती हैं। हाल ही में एडीजी जोन आए थे। मंत्री व विधायक गण आते रहते हैं लेकिन मंदिर के विकास की गति नहीं बढ़ी। यदि सरकार इसे धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करे तो देश-विदेश से श्रद्धालु यहां पहुंचेंगे और क्षेत्र की पहचान भी बढ़ेगी। -विनोद तिवारी, मुख्य पुजारी, सूर्य मंदिर
उत्सव के दौरान हजारों श्रद्धालु आने से बाजार में रौनक बढ़ती है। पूरे वर्ष पर्यटन गतिविधियां न होने से व्यापार को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। यदि मंदिर और आसपास के क्षेत्र का समुचित विकास हो तथा इसे पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए तो स्थानीय दुकानदारों, होटल, परिवहन और छोटे कारोबारियों की आय कई गुना बढ़ सकती है। -पुरुषोत्तम वर्मा, व्यापारी
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क्षेत्र के महुअवा बुजुर्ग स्थित सूर्य मंदिर की तुलना इसकी स्थापत्य और ऐतिहासिक महत्ता के कारण ओडिशा के विश्वप्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर से की जाती है। अंतर केवल इतना है कि जहां कोणार्क विश्व पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन चुका है, वहीं तुर्कपट्टी का सूर्य मंदिर चार दशक बाद भी उपेक्षा का दंश झेल रहा है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस धरोहर के संरक्षण, प्रचार और पर्यटन विकास पर गंभीरता से काम किया गया होता तो यह मंदिर भी पूर्वांचल की धार्मिक पहचान का बड़ा केंद्र बन सकता था।
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31 जुलाई 1981 को सूर्यग्रहण के दिन ग्रामीणों द्वारा की गई खुदाई में यहां भगवान सूर्य की दो प्रतिमाएं प्राप्त हुई थीं। इनमें एक दुर्लभ काले नीलमणि पत्थर और दूसरी बलुई पत्थर की प्रतिमा थी।इतिहासकारों ने इन्हें गुप्तकालीन माना। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, ग्रामीण सुदामा को सपने में इस स्थान पर सूर्य प्रतिमा होने का संकेत मिला था, जिसके बाद तत्कालीन ग्राम प्रधान मथुरा शाही के नेतृत्व में खुदाई कराई गई। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 31 जुलाई को सूर्य मूर्ति प्राकट्य उत्सव मनाया जाता है।
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1998 के बाद किसी डीएम ने नहीं ली सुध
-शुरुआती वर्षों में संस्कृति विभाग और स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से सूर्य महोत्सव का आयोजन हुआ। वर्ष 1998 में डीएम रहे वीके श्रीवास्तव के प्रयास से पर्यटन विभाग ने लगभग 25 लाख रुपये से मंदिर परिसर का सुंदरीकरण कराया था। इसके बाद विकास की गति लगभग थम गई। कुछ छिटपुट काम हुए, जिसमें यज्ञशाला, बैठने की जगह, पीने के पानी और विश्रामगृह शामिल हैं। तत्कालीन मंत्री शिवपाल यादव के आदेश पर महुअवा गांव में एक गेस्ट हाउस भी बना है।
विडंबना यह है कि हर वर्ष सूर्य मूर्ति प्राकट्य उत्सव का दायरा बढ़ता जा रहा है। इस वर्ष भी देश की 151 नदियों के जल से भगवान भास्कर का महाभिषेक होगा। तुर्कपट्टी का सूर्य मंदिर अब तक किसी प्रभावी पर्यटन सर्किट का हिस्सा नहीं बन पाया। यदि इसे कुशीनगर बौद्ध सर्किट, गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर, अयोध्या, वाराणसी और नेपाल के लुंबिनी से जोड़कर एक समेकित धार्मिक पर्यटन कॉरिडोर विकसित किया जाए तो यह पूर्वांचल का सबसे बड़ा बहुआयामी धार्मिक पर्यटन मॉडल बन सकता है। इससे पर्यटकों का ठहराव बढ़ेगा, स्थानीय व्यापार, होटल, हस्तशिल्प, परिवहन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई गति मिलेगी।
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यह गुप्तकालीन धरोहर भी है। हर साल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ रही है। रोज शादियां तय होती हैं। हाल ही में एडीजी जोन आए थे। मंत्री व विधायक गण आते रहते हैं लेकिन मंदिर के विकास की गति नहीं बढ़ी। यदि सरकार इसे धार्मिक पर्यटन के रूप में विकसित करे तो देश-विदेश से श्रद्धालु यहां पहुंचेंगे और क्षेत्र की पहचान भी बढ़ेगी। -विनोद तिवारी, मुख्य पुजारी, सूर्य मंदिर
उत्सव के दौरान हजारों श्रद्धालु आने से बाजार में रौनक बढ़ती है। पूरे वर्ष पर्यटन गतिविधियां न होने से व्यापार को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। यदि मंदिर और आसपास के क्षेत्र का समुचित विकास हो तथा इसे पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाए तो स्थानीय दुकानदारों, होटल, परिवहन और छोटे कारोबारियों की आय कई गुना बढ़ सकती है। -पुरुषोत्तम वर्मा, व्यापारी