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Kushinagar News: मासूम के साथ शारीरिक शोषण के दोषी को उम्रकैद
Thu, 04 Dec 2025 01:46 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Thu, 04 Dec 2025 01:46 AM IST
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पडरौना। अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश, विशेष न्यायालय ने तीन वर्ष की बच्ची के साथ शारीरिक शोषण करने वाले आरोपी को दोषी माना है। न्यायालय ने आरोपी को आजीवन करावास की सजा सुनाते हुए पांच लाख रुपये अर्थदंड से दंडित किया है। न्यायालय ने अर्थदंड की 80 फीसदी धनराशि पीड़िता को प्रतिकर के रूप में देने का आदेश दिया है। थाना नेबुआ नौरंगिया थाना क्षेत्र एक गांव निवासी व्यक्ति ने 23 जून 2020 को पुलिस को तहरीर देकर बताया था कि उनकी तीन वर्षीय बेटी के साथ अभियुक्त सत्येंद्र निवासी मलार बिंदवालिया टोला कापढ़ी थाना नेबुआ नौरंगिया आम खिलाने के बहाने अपने घर लेगए। वहां आरोपी बेटी के साथ शारीरिक शोषण किया।
बेटी को ढूंढते हुए करीब 10 मिनट बाद पत्नी कमरे में पहुंची तो कि बेटी कमरे में अचेत पड़ी है। उसे तत्काल जिला चिकित्सालय ले जाकर इलाज कराया गया। विवेचना के बाद पुलिस ने अभियुक्त सत्येंद्र के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत किया। मामले की सुनवाई करते हुए अपर जिला में सत्र न्यायाधीश विशेष न्यायालय दिनेश कुमार ने प्रस्तुत साक्ष्य और गवाहों के अधार पर आरोपी को दोषी करार दिया है।
उन्होंने अभियुक्त को आजीवन कारावास और 5,00,000 रुपये अर्थदंड से दंडित किया है। न्यायालय ने निर्णय में यह टिप्पणी की गई कि भारतीय संस्कृति सृजन संवेदना की संस्कृति है। इसका मुहूर्त रूप है नई जिसका समूचा अस्तित्व सृजन एवं संवेदना की स्पंदनों भावनाओं से मानवीयता पुष्पित पल्लवित होती रहती है।
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बेटी को ढूंढते हुए करीब 10 मिनट बाद पत्नी कमरे में पहुंची तो कि बेटी कमरे में अचेत पड़ी है। उसे तत्काल जिला चिकित्सालय ले जाकर इलाज कराया गया। विवेचना के बाद पुलिस ने अभियुक्त सत्येंद्र के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत किया। मामले की सुनवाई करते हुए अपर जिला में सत्र न्यायाधीश विशेष न्यायालय दिनेश कुमार ने प्रस्तुत साक्ष्य और गवाहों के अधार पर आरोपी को दोषी करार दिया है।
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उन्होंने अभियुक्त को आजीवन कारावास और 5,00,000 रुपये अर्थदंड से दंडित किया है। न्यायालय ने निर्णय में यह टिप्पणी की गई कि भारतीय संस्कृति सृजन संवेदना की संस्कृति है। इसका मुहूर्त रूप है नई जिसका समूचा अस्तित्व सृजन एवं संवेदना की स्पंदनों भावनाओं से मानवीयता पुष्पित पल्लवित होती रहती है।
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