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हैंडपंपों का पानी विषाक्त, मिल रहे बैक्टीरिया
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
Updated Tue, 10 Apr 2018 11:38 PM IST
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हैंडपंप।
- फोटो : कुश्ाीनगर ब्यूरो
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पडरौना। साधारण हैंडपंपों का पानी पीने योग्य नहीं रह गया है। क्योंकि इस नल के पानी में बैक्टीरिया पाए जाने लगे हैं। यह बात जल निगम की तरफ से ट्रायल के तौर पर कराई गई जांच में सामने आई है। जनपद के अलग-अलग हिस्सों से लिए गए जनवरी में साधारण हैंडपंपों के 260 नमूनों में से 29 में वैक्टीरिया पाए गए हैं। इसके बाद विभाग ने पानी की जांच के लिए प्रत्येक ब्लॉक को चार-चार हजार शीशियां भेजी हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी पेयजल के लिए साधारण हैंडपंप का इस्तेमाल होता है। ज्यादातर गरीब तबके के लोग इसी नल का पानी पीते हैं। महज 40 फीट की गहराई पर ही जमीन से पानी आ जाने के कारण लोग इस हैंडपंप को आसानी से लगवा लेते हैं। लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता कि जिले के भूगर्भ जल का पहला लेयर पूरी तरह दूषित हो चुका है। ऐसे में इसका पानी पीना एईएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम), टायफाइड, डायरिया हेपेटाइटिस ए और ई (पीलिया) सहित कई घातक बीमारियों को न्यौता देना है।
जल निगम विभाग की तरफ से सभी ब्लॉकों को एक माह पूर्व चार-चार हजार ऐसी शीशियां भेजी गई हैं, जिनमें पानी रखकर उसकी शुद्घता की जांच की जा सकती है। इन्हें सचिवों के माध्यम से गांवों में जांच कराने को कहा गया है लेकिन कर्मचारियों की लापरवाही के कारण बहुत कम जांच हो पाए हैं। अधिकारी भी इसके प्रति सचेत नहीं दिख रहे हैं।
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इंसेफेलाइटिस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए चार साल पहले तत्कालीन डीएम रिग्जियान सैंफिल ने साधारण हैंडपंपों को उखड़वाने का व्यापक अभियान चलाया था। ऐसे हैंडपंपों पर लाल रंग के क्रास का निशान लगा दिया गया और उन्हें उखड़वा दिया गया था। इस वर्ष जनवरी से अब तक 23 बच्चे इंसेफेलाइटिस की चपेट में आ चुके हैं, जिनमें छह की मौत हो चुकी है।
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ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी पेयजल के लिए साधारण हैंडपंप का इस्तेमाल होता है। ज्यादातर गरीब तबके के लोग इसी नल का पानी पीते हैं। महज 40 फीट की गहराई पर ही जमीन से पानी आ जाने के कारण लोग इस हैंडपंप को आसानी से लगवा लेते हैं। लेकिन शायद उन्हें यह नहीं पता कि जिले के भूगर्भ जल का पहला लेयर पूरी तरह दूषित हो चुका है। ऐसे में इसका पानी पीना एईएस (एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम), टायफाइड, डायरिया हेपेटाइटिस ए और ई (पीलिया) सहित कई घातक बीमारियों को न्यौता देना है।
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जल निगम विभाग की तरफ से सभी ब्लॉकों को एक माह पूर्व चार-चार हजार ऐसी शीशियां भेजी गई हैं, जिनमें पानी रखकर उसकी शुद्घता की जांच की जा सकती है। इन्हें सचिवों के माध्यम से गांवों में जांच कराने को कहा गया है लेकिन कर्मचारियों की लापरवाही के कारण बहुत कम जांच हो पाए हैं। अधिकारी भी इसके प्रति सचेत नहीं दिख रहे हैं।
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इंसेफेलाइटिस के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए चार साल पहले तत्कालीन डीएम रिग्जियान सैंफिल ने साधारण हैंडपंपों को उखड़वाने का व्यापक अभियान चलाया था। ऐसे हैंडपंपों पर लाल रंग के क्रास का निशान लगा दिया गया और उन्हें उखड़वा दिया गया था। इस वर्ष जनवरी से अब तक 23 बच्चे इंसेफेलाइटिस की चपेट में आ चुके हैं, जिनमें छह की मौत हो चुकी है।
एक्सीएन प्रमोद कुमार के अनुसार अलग अलग हिस्सों से ट्रायल के तौर पर साधारण हैंडपंपों के पानी की जांच कराई गई। 260 सैंपल की जांच में 29 नमूनों में वैक्टीरिया मिले हैं। इसके बाद प्रत्येक ब्लॉक में पानी की जांच के लिए चार-चार हजार शीशियां भेजी गई हैं। शुद्घ पेयजल के सेवन के प्रति जागरुक करने के लिए ग्राम प्रधानों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। कार्यशालाएं आयोजित हो रही हैं। छोटे हैंडपंप का पानी कम गहराई से निकलता है तथा दूषित पानी भी आस-पास ही एकत्र होता है, जिससे यह ज्यादा नुकसानदायक है। इसलिए लोग साधारण हैंडपंप का पानी न पीएं।