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पेट के बल होकर जाता था स्कूल, आज बना घर का सहारा

Thu, 08 Feb 2018 12:25 AM IST
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
कुश्ाीनगर (ब्यूरो) Updated Thu, 08 Feb 2018 12:25 AM IST
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goes to the throat of the stomach School, the house built today
दिव्यांग द्वारिका जायसवाल। - फोटो : कुश्ाीनगर ब्यूरो
पडरौना। अपनी छोटी उम्र में ही आगे बढ़ने की ललक साधारण परिवार में जन्मे दिव्यांग द्वारिका जायसवाल के हर कदम पर पड़ने वाले रोड़े भी उसके आगे बढ़ने की राह नहीं रोक सके। जन्म से ही पोलियो का शिकार होने के बावजूद द्वारिका आज पूरे परिवार का सहारा बना हुआ है और एक स्कूल में कंप्यूटर का अध्यापक रहते हुए वह अभी लोक सेवा आयोग की तैयारी में जुटा हुआ है।
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पडरौना नगर से सटे विशुनपुरा ब्लॉक के गांव डिबनी निवासी विश्वनाथ जायसवाल साइकिल मरम्मत का कार्य करते हैं। वर्ष 1995 में विश्वनाथ के घर बच्चे की किलकारी गूंजी लेकिन कुछ समय बाद ही डॉक्टर ने बताया कि वह पोलियो का शिकार है। इससे माता-पिता की उदासी बढ़ गई। समय के साथ ही द्वारिका ने पढ़ाई की ठान ली। परिवार वाले भी उसके जिद्द के आगे झुक गए और वह दोनों पैर से दिव्यांग द्वारिका पेट के बल होकर अपने गांव से दूसरे गांव खोटहीं के प्राथमिक विद्यालय में जाने लगा। 
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कक्षा सात से उत्तीर्ण होकर वह पहली बार अपने ट्राई साइकिल से पडरौना शहर में आया। हाईस्कूल व इंटर की शिक्षा शहर के हनुमान इंटर कॉलेज में ग्रहण किया। इसके बाद वह बीएससी गणित विषय में यूएनपीजी कॉलेज में नामांकन कराया। यहां उसे निराशा हाथ लगी और पढ़ाई छोड़ने की बजाए, उसने अपने हौसले के दम पर गोंडा में नामांकन कराया। वहीं पर बीएससी की डिग्री हासिल की और कंप्यूटर की शिक्षा लेने के बाद धीरे-धीरे पडरौना नगर के कई शिक्षण संस्थानों में पैठ बना लिया। कंप्यूटर डिप्लोमा की अच्छी जानकारी होने के का द्वारिका को नगर के सिस्टर निवेदिता पब्लिक स्कूल में कंप्यूटर पढ़ाने के लिए ऑफर मिला। 
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दो वर्ष हो गए द्वारिका को यहां पढ़ाते हुए। यहां के बच्चों के बुलाने पर घर जाकर ट्यूशन भी पढ़ाने लगा। आमदनी बढ़ने लगी, तो अपने दम पर घर की जिम्मेदारी भी संभाल ली और अब अपने हिस्से की कमाई घर भेजकर परिवार का भरण पोषण करता है। दिव्यांग की हिम्मत और उसके हौसले को देख समाज के लोग भी उसे सम्मानजनक दृष्टि से देखते हैं। उसके गांव के लोग अपने बच्चों को द्वारिका से सीख लेने की नसीहत देते हैं। अब वह लोक सेवा आयोग की तैयारी करने में जुट गया है।

दोनों पैर से दिव्यांग द्वारिका जायसवाल ने कहा कि शुरुआत में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। घर की गरीबी और पिता के परिश्रम को देख, मुझे बल मिला। दूसरे बच्चों को देख, मेरे भीतर भी कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा हुआ। वह बताता है कि फिलहाल पीसीएस की तैयारी लगा हूं, किस्मत ने साथ दिया, तो पीसीएस बनकर देश और समाज की सेवा करूंगा। उसका कहना है कि हौसले बुलंद हो, तो बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है। 
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