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Kushinagar News: बुद्ध की स्मृतियाें को नहीं मिली विशिष्ट पहचान, निराश लाैट रहे विदेशी मेहमान
Fri, 07 Feb 2025 11:44 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Fri, 07 Feb 2025 11:44 PM IST
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कुशीनगर/गुरवलिया बाजार। महात्मा बुद्ध की जीवन से जुड़ी तमाम स्मृतियों को समेटने वाले कुशीनगर का नाम सुनते ही बड़े शहरों के साथ विदेशी मेहमानों के जहन में एक बड़े पर्यटन स्थल की इमेज बनी रहती है। कुशीनगर में घूमने का उत्साह रखकर योजनाबद्ध तरीके से कुशीनगर पहुंचने वाले पर्यटकों की उम्मीदें वहां पहुंचते ही दम तोड़ देती हैं।
भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण मंदिर का दर्शन करने के बाद जब पर्यटक बुद्ध से जुड़ी स्मृतियों को तलाशने की कोशिश करते हैं तो उन्हें निराशा हाथ लगती है। अंतिम भोजन स्थली फाजिलनगर सठियांव के साथ दूसरे स्थलों की ब्रांडिंग तो खूब की, लेकिन इसका विकास वैसे नहीं किया गया। ऐसे में टूरिस्ट यहां पहुंचने के बाद निराश होकर लौटते हैं। कुशीनगर जिले की पहचान भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर और अंतिम भोजन स्थली फाजिलनगर सठियांव लगायत दर्जनों स्थलों से है। मगर, कनेक्टिविटी में परेशानी, सूचना प्रसारण की कमी, स्थलीय संसाधनों का अभाव और स्थानीय गतिविधियों के कारण पर्यटकों को परेशानी झेलनी पड़ती है। ऐसे में यहां पहुंचने के बाद ही उनका मोहभंग हो जाता है। हालांकि, बुद्ध सर्किट से जोड़कर इन स्थलों के विकास की योजना कई बार बनी, कुछ विकास भी हुए, लेकिन यह स्थल एक सूत्र में नहीं बंध सके। जिससे पर्यटकों को आकर्षित करने के बाद भी इसका फायदा लेने में कुशीनगर फिसड्डी साबित हुआ है। कुशीनगर आने वाले पर्यटक निजी वाहन बुक कर फाजिलनगर और अन्य जगहों पर जा सकते हैं या बसों के माध्यम से वह फाजिलनगर और फिर वहां से उतरने के बाद दो किमी चलकर सठियांव पहुंच सकते हैं। पावानगर फाजिलनगर पहुंचने वाले सभी विदेशी सैलानी दिक्कतों का सामना करते हुए फाजिलनगर और आसपास के बदुराव, सुमही बुजुर्ग, फरेंदहा, उस्मानपुर, बकुलहर, कुकुत्था नदी आदि जगहों पर दर्शन के लिए तो जाते हैं, लेकिन उन्हें तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्हें परिवहन, खाने-पीने और आसपास के लोगों के व्यवहार के कारण तमाम दिक्कतें होती हैं। कुशीनगर के बाद फाजिलनगर के बाद सारनाथ, गया, बोधगया और वाराणसी का रुख कर लेते हैं। सठियांव गांव में बनी भगवान की बुद्ध की अंतिम भोजन स्थली को चमकदार बनाकर एक सूत्र में अन्य बुद्ध से जुड़े स्थलों से जोड़कर विकास की योजना बनी थी और इसके लिए बाकायदा कार्य भी हुए। नगर पंचायत फाजिलनगर 23 दिसंबर 2019 को अस्तित्व में आ गय। इस दौरान पर्यटन विकास के लिए पूर्ण बोरा ने पहल की तो फाजिलनगर की सूरत बदल गई।
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भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण मंदिर का दर्शन करने के बाद जब पर्यटक बुद्ध से जुड़ी स्मृतियों को तलाशने की कोशिश करते हैं तो उन्हें निराशा हाथ लगती है। अंतिम भोजन स्थली फाजिलनगर सठियांव के साथ दूसरे स्थलों की ब्रांडिंग तो खूब की, लेकिन इसका विकास वैसे नहीं किया गया। ऐसे में टूरिस्ट यहां पहुंचने के बाद निराश होकर लौटते हैं। कुशीनगर जिले की पहचान भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर और अंतिम भोजन स्थली फाजिलनगर सठियांव लगायत दर्जनों स्थलों से है। मगर, कनेक्टिविटी में परेशानी, सूचना प्रसारण की कमी, स्थलीय संसाधनों का अभाव और स्थानीय गतिविधियों के कारण पर्यटकों को परेशानी झेलनी पड़ती है। ऐसे में यहां पहुंचने के बाद ही उनका मोहभंग हो जाता है। हालांकि, बुद्ध सर्किट से जोड़कर इन स्थलों के विकास की योजना कई बार बनी, कुछ विकास भी हुए, लेकिन यह स्थल एक सूत्र में नहीं बंध सके। जिससे पर्यटकों को आकर्षित करने के बाद भी इसका फायदा लेने में कुशीनगर फिसड्डी साबित हुआ है। कुशीनगर आने वाले पर्यटक निजी वाहन बुक कर फाजिलनगर और अन्य जगहों पर जा सकते हैं या बसों के माध्यम से वह फाजिलनगर और फिर वहां से उतरने के बाद दो किमी चलकर सठियांव पहुंच सकते हैं। पावानगर फाजिलनगर पहुंचने वाले सभी विदेशी सैलानी दिक्कतों का सामना करते हुए फाजिलनगर और आसपास के बदुराव, सुमही बुजुर्ग, फरेंदहा, उस्मानपुर, बकुलहर, कुकुत्था नदी आदि जगहों पर दर्शन के लिए तो जाते हैं, लेकिन उन्हें तमाम दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उन्हें परिवहन, खाने-पीने और आसपास के लोगों के व्यवहार के कारण तमाम दिक्कतें होती हैं। कुशीनगर के बाद फाजिलनगर के बाद सारनाथ, गया, बोधगया और वाराणसी का रुख कर लेते हैं। सठियांव गांव में बनी भगवान की बुद्ध की अंतिम भोजन स्थली को चमकदार बनाकर एक सूत्र में अन्य बुद्ध से जुड़े स्थलों से जोड़कर विकास की योजना बनी थी और इसके लिए बाकायदा कार्य भी हुए। नगर पंचायत फाजिलनगर 23 दिसंबर 2019 को अस्तित्व में आ गय। इस दौरान पर्यटन विकास के लिए पूर्ण बोरा ने पहल की तो फाजिलनगर की सूरत बदल गई।
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