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Kushinagar News: भोला का बेटा, दिनेश की बेटी को अब कोई नहीं कहेगा दिव्यांग
Tue, 02 Jun 2026 12:36 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Tue, 02 Jun 2026 12:36 AM IST
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मेडिकल कॉलेज कुशीनगर के डॉक्टरों के प्रयासों से टेढ़े-मेढ़े पैर वाले 700 बच्चों को मिली नई जिंदगी
पैरों पर खड़े हुए नौनिहाल, नाउम्मीद माता-पिता के चेहरों पर लौटी मुस्कान
जूतों की मदद से मिली पैरों को ताकत, अब जिंदगी की जंग में डटे रहेंगे बच्चे
लखनऊ और दिल्ली तक की दौड़ नहीं, अपने जिले में ही इलाज
आदित्य कुमार शाही
केस-1 लोग बोले, दिव्यांग बच्चा पैदा हुआ कुशीनगर के कसया के भलुही मदारी पट्टी निवासी बबीता देवी व भोला प्रसाद बताते हैं कि उनका बेटा जब पैदा हुआ तो उसके पैर का पंजा अंदर की तरफ मुड़ा हुआ था। जैसे ही गांव और परिवार के लोगों ने देखा, तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं। लोगों ने कहा दिव्यांग बच्चा पैदा हुआ है। हम मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग पहुंचे तो एक सप्ताह तक पैर पर विशेष प्लास्टर चढ़ाया गया। एक छोटा सा ऑपरेशन हुआ। खास किस्म के जूते दिए गए और आज मेरा बेटा भी दूसरे बच्चों की तरह कूदता-फांदता है। अभी डाॅक्टर ने कुछ समय तक उपचार व परामर्श लेते रहने की सलाह दी है।
केस-2 हमें लगा कि बेटी की पूरी जिंदगी बैसाखी के सहारे कटेगी
कसया ब्लॉक के लक्ष्मीपुर सपहां के दिनेश कुमार ने बताया कि जब बेटी पैदा हुई, तो उसके दोनों पैर अंदर की तरफ पूरी तरह मुड़े थे। चिंता सता रही थी कि बेटी की पूरी जिंदगी बैसाखियों या दूसरों के सहारे कटेगी। कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था। मायूस होकर हम मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग पहुंचे। करीब डेढ़ महीने तक हर सप्ताह बच्ची का प्लास्टर बदला गया और फिर विशेष जूते पहनने के लिए दिए गए। पहले जूते पहनाने पर बहुत रोती थी लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि यही जूते उसकी जिंदगी बदलेंगे और आज वह सामान्य बच्चों की तरह चलती-फिरती, खेलती-कूदती है।
पडरौना। ये दो मामले उम्मीद जगाते हैं..., सरकारी चिकित्सा संस्थानों में इलाज की गुणवत्ता पर भरोसा बढ़ाते हैं और हमारे डॉक्टरों की सफल कोशिशों की मिसाल भी पेश करते हैं। भोला या दिनेश ही नहीं बल्कि 700 ऐसे परिवारों की मुस्कान लौटाने का काम मेडिकल कॉलेज कुशीनगर के चिकित्सकों ने किया है। ये ऐसे परिवार थे जिनके बच्चों को लोग दिव्यांग कहने लगे थे। पैदाइश के साथ ही इनके पैर टेढ़े-मेढ़े थे। कूदना-फांदना तो दूर इन परिवारों ने बच्चों के चलने तक की उम्मीद छोड़ दी थी। इन बच्चों को क्लब फुट बीमारी थी। यह एक ऐसी समस्या है जिसमें बच्चे के पैर जन्म से ही अंदर की ओर मुड़े होते हैं। ध्यान न दिया जाए और समय पर इलाज न हो तो यह बीमारी जीवनभर के लिए दिव्यांगता का कारण बन सकती है। खास बात है कि इस बीमारी के लिए अब लखनऊ और दिल्ली तक की दौड़ नहीं लगानी पड़ती। अपने जिले में ही इलाज मिल रहा है।
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जागरूक रहें, समय पर इलाज कराएं
मेडिकल कॉलेज कुशीनगर के हड्डी रोग विशेषज्ञ डाॅ. गजेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि विशेष कार्यक्रम के तहत संचालित क्लब फुट क्लीनिक में तीन साल में 700 बच्चों का इलाज सफल रहा है। उपचार की लंबी प्रक्रिया में धैर्य की जरूरत होती है। सिलसिलेवार प्लास्टर चढ़ाने और विशेष जूतों के इस्तेमाल के बाद बच्चों के पैर पूरी तरह सामान्य हो जाते हैं। उपचार के बाद ये बच्चे न केवल खड़े हो पा रहे हैं, बल्कि बिना सहारे के चलना भी सीख रहे हैं। पोंसेटी तकनीक (प्लास्टर और मामूली सर्जरी) के जरिये इन बच्चों के पैरों को सीधा किया गया है। हर बुधवार को मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग में कैंप भी लगाया जाता है।
संकल्प : ढूंढे जा रहे ऐसे बच्चे, ताकि दिव्यांगता से बचाया जा सके
क्लब फुट से ग्रसित बच्चों की पहचान अधिकतर प्रसव केंद्र पर ही हो जाती है। यदि बच्चा यहां छूट जाता है तो आशा-एएनएम नियमित टीकाकरण कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की टीम के जरिये पकड़ में आ जाता है। जिले में आरबीएसके की 28 टीमें हैं, जो गांव-गांव जाकर जन्मजात बीमारियों की जांच करती हैं।
इन बातों का रखें ध्यान
- जन्म के शुरुआती महीनों (शून्य से तीन माह) में ही इलाज शुरू होना चाहिए।
- उपचार में देरी होने पर हड्डियां सख्त हो जाती हैं
- नियमित फॉलोअप कराएं, ताकि शारीरिक विकास की निगरानी की जा सके।
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पैरों पर खड़े हुए नौनिहाल, नाउम्मीद माता-पिता के चेहरों पर लौटी मुस्कान
जूतों की मदद से मिली पैरों को ताकत, अब जिंदगी की जंग में डटे रहेंगे बच्चे
लखनऊ और दिल्ली तक की दौड़ नहीं, अपने जिले में ही इलाज
आदित्य कुमार शाही
केस-1 लोग बोले, दिव्यांग बच्चा पैदा हुआ कुशीनगर के कसया के भलुही मदारी पट्टी निवासी बबीता देवी व भोला प्रसाद बताते हैं कि उनका बेटा जब पैदा हुआ तो उसके पैर का पंजा अंदर की तरफ मुड़ा हुआ था। जैसे ही गांव और परिवार के लोगों ने देखा, तरह-तरह की बातें शुरू कर दीं। लोगों ने कहा दिव्यांग बच्चा पैदा हुआ है। हम मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग पहुंचे तो एक सप्ताह तक पैर पर विशेष प्लास्टर चढ़ाया गया। एक छोटा सा ऑपरेशन हुआ। खास किस्म के जूते दिए गए और आज मेरा बेटा भी दूसरे बच्चों की तरह कूदता-फांदता है। अभी डाॅक्टर ने कुछ समय तक उपचार व परामर्श लेते रहने की सलाह दी है।
केस-2 हमें लगा कि बेटी की पूरी जिंदगी बैसाखी के सहारे कटेगी
कसया ब्लॉक के लक्ष्मीपुर सपहां के दिनेश कुमार ने बताया कि जब बेटी पैदा हुई, तो उसके दोनों पैर अंदर की तरफ पूरी तरह मुड़े थे। चिंता सता रही थी कि बेटी की पूरी जिंदगी बैसाखियों या दूसरों के सहारे कटेगी। कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था। मायूस होकर हम मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग पहुंचे। करीब डेढ़ महीने तक हर सप्ताह बच्ची का प्लास्टर बदला गया और फिर विशेष जूते पहनने के लिए दिए गए। पहले जूते पहनाने पर बहुत रोती थी लेकिन डॉक्टरों ने कहा कि यही जूते उसकी जिंदगी बदलेंगे और आज वह सामान्य बच्चों की तरह चलती-फिरती, खेलती-कूदती है।
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मेडिकल कॉलेज कुशीनगर के हड्डी रोग विशेषज्ञ डाॅ. गजेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि विशेष कार्यक्रम के तहत संचालित क्लब फुट क्लीनिक में तीन साल में 700 बच्चों का इलाज सफल रहा है। उपचार की लंबी प्रक्रिया में धैर्य की जरूरत होती है। सिलसिलेवार प्लास्टर चढ़ाने और विशेष जूतों के इस्तेमाल के बाद बच्चों के पैर पूरी तरह सामान्य हो जाते हैं। उपचार के बाद ये बच्चे न केवल खड़े हो पा रहे हैं, बल्कि बिना सहारे के चलना भी सीख रहे हैं। पोंसेटी तकनीक (प्लास्टर और मामूली सर्जरी) के जरिये इन बच्चों के पैरों को सीधा किया गया है। हर बुधवार को मेडिकल कॉलेज के हड्डी रोग विभाग में कैंप भी लगाया जाता है।
संकल्प : ढूंढे जा रहे ऐसे बच्चे, ताकि दिव्यांगता से बचाया जा सके
क्लब फुट से ग्रसित बच्चों की पहचान अधिकतर प्रसव केंद्र पर ही हो जाती है। यदि बच्चा यहां छूट जाता है तो आशा-एएनएम नियमित टीकाकरण कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की टीम के जरिये पकड़ में आ जाता है। जिले में आरबीएसके की 28 टीमें हैं, जो गांव-गांव जाकर जन्मजात बीमारियों की जांच करती हैं।
इन बातों का रखें ध्यान
- जन्म के शुरुआती महीनों (शून्य से तीन माह) में ही इलाज शुरू होना चाहिए।
- उपचार में देरी होने पर हड्डियां सख्त हो जाती हैं
- नियमित फॉलोअप कराएं, ताकि शारीरिक विकास की निगरानी की जा सके।