{"_id":"70-97481","slug":"Kushinagar-97481-70","type":"story","status":"publish","title_hn":"रानी तारामती को आंचल फाड़ते देख दर्शक भावुक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
रानी तारामती को आंचल फाड़ते देख दर्शक भावुक
Kushinagar
Updated Sun, 26 Oct 2014 05:30 AM IST
विज्ञापन
फाजिलनगर/कुशीनगर। दीपावली से गोवर्द्धन पूजा तक चलने वाले तीन दिवसीय जोकवा महोत्सव के दूसरे दिन शुक्रवार की रात सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र और तारामती नाटक के मंचन के दौरान जब तारामती ने अपना आंचल फाड़ा तो दर्शक भावुक हो गए। इस नाटक की सांस्कृतिक संगम सलेमपुर के कलाकारों की ओर से उत्कृष्ट प्रस्तुति की गई। विकट परिस्थितियों में भी राजा हरिश्चंद्र ने अपने संकल्प को नहीं तोड़ा। मंचन का शुभारंभ सपा जिलाध्यक्ष रामअवध यादव और पूर्व विधायक विश्वनाथ सिंह ने फीता काटकर किया।
नाटक के प्रस्तुतकर्ता वाई शंकर मूर्ति, परिकल्पना और निर्देश मानवेंद्र त्रिपाठी का रहा। मंचन के क्रम में राजा हरिश्चंद्र स्वप्न में अपना संपूर्ण राजपाट महर्षि विश्वामित्र को दान में दे देते हैं। दूसरे दिन महर्षि राजा के दरबार में उपस्थित होते हैं। उन्हें अपने दरबार में उपस्थित देख राजा हरिश्चंद्र आश्चर्यचकित हो उठते हैं और आने का प्रयोजन पूछते हैं। इसके बाद महर्षि विश्वामित्र उन्हें दक्षिणा में एक हजार स्वर्ण मुद्राएं देने की बात कहते हैं। राजा जब अपने अनुचर से राजकीय खजाने से स्वर्ण मुद्राएं लाने को आदेश देते है तो महर्षि राजा को याद दिलाते हैं कि आपने अपना संपूर्ण राज मुझे पहले ही दान में दे दिया है तो खजाने पर आपका कहां अधिकार रहा। इसके बाद राजा उनसे कुछ दिन की मोहलत मांगते हैं, लेकिन एक हजार स्वर्ण मुद्राओं की व्यवस्था नहीं हो पाती है और अंत में हरिश्चंद्र पत्नी और बेटे समेत अपने को बेंचकर महर्षि को दक्षिणा देते हैं। राजा हरिश्चंद्र को राजा डोम और उनकी पत्नी तारामती और बेटे रोहिताश्व को एक पंडित खरीद लेते हैं और उनके निर्देश पर सभी लोग काम करने लगते हैं। हरिश्चंद्र श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार करने वाले लोगों से कर की वसूली करते हैं और तारामती तथा पुत्र रोहित पंडित के घर काम करते हैं।
इनकी परीक्षा लेने के क्रम में एक दिन पूजा के लिए फूल तोड़ते समय रोहित को सांप डंस लेता है। उसके बाद विलाप करती मां तारामती बालक के अंतिम संस्कार के लिए उसी श्मशान घाट पर पहुंचती हैं, जहां राजा हरिश्चंद्र तैनात हैं। फर्ज से बंधे राजा अपनी पत्नी से बालक के शव को दफनाने के बदले कर मांगते हैं तो उनकी पत्नी रोने लगती हैं। कहती हैं कि यह आपका ही बेटा है तो वे बताते हैं कि यहां मैं दूसरे का नौकर हूं, उनके निर्देश का पालन कर रहां हूं। बेबस तारामती कर देने के लिए अपनी आंचल फाड़ने लगती है। यह दृश्य देख देवलोक से पुष्प वर्षा होने लगती है। मंच पर महर्षि विश्वामित्र प्रकट होते हैं, रोहित को जिंदा करते हैं और कहते हैं कि राजन आपकी परीक्षा खत्म हुई और उनका राजपाट लौटा देते हैं। इस अवसर पर महोत्सव आयोजन समिति के संरक्षक शिवनाथ यादव, विजय यादव, जिला पंचायत सदस्य विजय यादव, ग्राम प्रधान रामाशीष जायसवाल, राकेश जायसवाल, राहुल कुमार सिंह आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
विज्ञापन
नाटक के प्रस्तुतकर्ता वाई शंकर मूर्ति, परिकल्पना और निर्देश मानवेंद्र त्रिपाठी का रहा। मंचन के क्रम में राजा हरिश्चंद्र स्वप्न में अपना संपूर्ण राजपाट महर्षि विश्वामित्र को दान में दे देते हैं। दूसरे दिन महर्षि राजा के दरबार में उपस्थित होते हैं। उन्हें अपने दरबार में उपस्थित देख राजा हरिश्चंद्र आश्चर्यचकित हो उठते हैं और आने का प्रयोजन पूछते हैं। इसके बाद महर्षि विश्वामित्र उन्हें दक्षिणा में एक हजार स्वर्ण मुद्राएं देने की बात कहते हैं। राजा जब अपने अनुचर से राजकीय खजाने से स्वर्ण मुद्राएं लाने को आदेश देते है तो महर्षि राजा को याद दिलाते हैं कि आपने अपना संपूर्ण राज मुझे पहले ही दान में दे दिया है तो खजाने पर आपका कहां अधिकार रहा। इसके बाद राजा उनसे कुछ दिन की मोहलत मांगते हैं, लेकिन एक हजार स्वर्ण मुद्राओं की व्यवस्था नहीं हो पाती है और अंत में हरिश्चंद्र पत्नी और बेटे समेत अपने को बेंचकर महर्षि को दक्षिणा देते हैं। राजा हरिश्चंद्र को राजा डोम और उनकी पत्नी तारामती और बेटे रोहिताश्व को एक पंडित खरीद लेते हैं और उनके निर्देश पर सभी लोग काम करने लगते हैं। हरिश्चंद्र श्मशान घाट पर अंतिम संस्कार करने वाले लोगों से कर की वसूली करते हैं और तारामती तथा पुत्र रोहित पंडित के घर काम करते हैं।
विज्ञापन
इनकी परीक्षा लेने के क्रम में एक दिन पूजा के लिए फूल तोड़ते समय रोहित को सांप डंस लेता है। उसके बाद विलाप करती मां तारामती बालक के अंतिम संस्कार के लिए उसी श्मशान घाट पर पहुंचती हैं, जहां राजा हरिश्चंद्र तैनात हैं। फर्ज से बंधे राजा अपनी पत्नी से बालक के शव को दफनाने के बदले कर मांगते हैं तो उनकी पत्नी रोने लगती हैं। कहती हैं कि यह आपका ही बेटा है तो वे बताते हैं कि यहां मैं दूसरे का नौकर हूं, उनके निर्देश का पालन कर रहां हूं। बेबस तारामती कर देने के लिए अपनी आंचल फाड़ने लगती है। यह दृश्य देख देवलोक से पुष्प वर्षा होने लगती है। मंच पर महर्षि विश्वामित्र प्रकट होते हैं, रोहित को जिंदा करते हैं और कहते हैं कि राजन आपकी परीक्षा खत्म हुई और उनका राजपाट लौटा देते हैं। इस अवसर पर महोत्सव आयोजन समिति के संरक्षक शिवनाथ यादव, विजय यादव, जिला पंचायत सदस्य विजय यादव, ग्राम प्रधान रामाशीष जायसवाल, राकेश जायसवाल, राहुल कुमार सिंह आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन