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बाघों की गिनती के लिए जंगल में लगाए गए 250 कैमरे

Sat, 29 Jan 2022 11:34 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sat, 29 Jan 2022 11:34 PM IST
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250 cameras installed in the forest to count tigers
बाघों की गिनती के लिए लगा कैमरा। - फोटो : KUSHINAGAR
बाघों की गिनती के लिए जंगल में लगाए गए 250 कैमरे
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वाल्मीकि टाइगर रिजर्व में 50 से अधिक बताई जा रही है बाघों की संख्या
खड्डा (कुशीनगर)। काफी जटिल व धैर्य का कार्य है बाघों की गिनती करना। बाहरी व नए शावकों के साथ जंगल के बाघों की गणना के लिए उनके शरीर की धारियों का मिलान करने के लिए आधुनिक तरीके से प्रत्येक बाघ को एक कोड नाम दिया जाता है। इसके अलावा उनके पदचिह्न व मल से भी पहचान की जाती है। वैसे तो वन विभाग हर वर्ष गणना करता है, लेकिन इसकी संख्या हर चार वर्ष पर सार्वजनिक की जाती है। इस समय बिहार के वाल्मीकि नगर टाइगर रिजर्व में 50 से अधिक बाघ होने की उम्मीद की जा रही है।
बाघ का नाम सुनते ही लोगों में भय और रोमांच का संचार हो जाता है। लोगों के मन में बाघ की तरह-तरह की छवि उभरती है। यूपी से सटे बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के 990 वर्ग किलोमीटर के जंगल में बाघों की संख्या कितनी है, इसके लिए 250 से ज्यादा अत्याधुनिक ट्रैप कैमरा लगाए गए हैं। ये कैमरे बाघों के विचरण करने और रहने वाले संभावित स्थानों पर इस तरह लगाए जाते हैं, जिसमें आसानी से तस्वीर कैद हो जाए। इन तस्वीरों को सॉफ्टवेयर के माध्यम से वर्गीकृत किया जाता है। मनुष्यों की फिंगरप्रिंट की तरह बाघों की शरीर की धारियों में भी भिन्नता होती है। इसके माध्यम से ही इनकी पहचान कर एक कोड नाम दिया जाता है।
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बाल्मीकि टाइगर रिजर्व के वन संरक्षक एचके राय ने बताया कि बाघों के टेक्निकल संख्या में नाम (कोड ) रखे गए हैं। जैसे टी-1, टी-2, टी-3 आदि संख्या होती है।इनके उपनाम भी होते हैं, जिसे वनकर्मी बाघ के व्यवहार व रहन-सहन, पसंदीदा निवास स्थान को देखकर रख देते हैं। जंगल की सीमा पड़ोसी देश नेपाल के चितवन प्राणी उद्यान और यूपी के महराजगंज जिले के सोहगीबरवां वन्यजीव अभयारण्य से जुड़ा हुआ है। उन जंगल के बाघ भी चले आते हैं। कैमरे में तस्वीर मिलती है तो ऐसे मेहमान बाघों को भी एन श्रेणी में रखकर नाम दिया जाता है।
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‘सॉफ्टवेयर के माध्यम से नए-पुराने बाघ की होती है पहचान’
वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर के प्रबंधक कमलेश मौर्या का कहना है कि मनुष्यों के फिंगरप्रिंट की तरह बाघों के शरीर पर बनी प्राकृतिक धारियां भिन्न होती हैैं। इसके सहारे सॉफ्टवेयर के माध्यम से इनके नए-पुराने की पहचान की जाती है। तस्वीर के लिए जंगल में लगे हर ट्रेप कैमरे का एक आईडी नंबर होता है, जो जीपीएस से लैस होता है। इससे बाघों की लोकेशन समेत अन्य गतिविधियों की जानकारी मिल जाती है। हर सप्ताह कैमरे में कैद तस्वीर का निरीक्षण किया जाता है। बाघों के जारी कोड नेम व नंबर से मिलान कर पता लगाया जाता है, कि बाघ नया है या पहले से मौजूद है। पहले बाघों की गणना के लिए काफी दिक्कत होती थी। उस समय बाघ के पदचिह्न, मल, डीएनए आदि के माध्यम से पता लगाया जाता था कि कौन नया व कौन पूुाना बाघ है, लेकिन विज्ञान ने काफी आसान कर दिया है। इसके बावजूद बाघों की गणना करना जटिलता से भरा है।
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