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Kaushambi News: पति को लगी चोट तो खुद संभाली परिवार की जिम्मेदारी
Sat, 24 Oct 2026 12:26 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Sat, 24 Oct 2026 12:26 AM IST
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घर में फुल्की बनाती शांति देवी। स्रोत: विभाग
मुश्किलें कितनी भी बड़ी हों, हौसला बुलंद हो तो रास्ते निकल ही आते हैं। पिपरकुंडी गांव की शांति देवी इसकी मिसाल हैं। गरीबी से जूझ रहे परिवार पर पति हादसे का शिकार हुए तो संकट विकट हो गया। पति का पैर टूटने से वह काम करने में असमर्थ हो गए। ऐसे में शांति देवी ने हार न मानते हुए खुद परिवार की जिम्मेदारी उठाई। आज फुल्की (गोलगप्पे) का कारोबार उनके परिवार के भरण-पोषण का सहारा बना है।
शांति देवी बताती हैं कि परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी। उनकी तीन बेटियां हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। बेटा नहीं है और पति ओमप्रकाश उर्फ राजू करीब दो साल पहले सड़क हादसे में पैर टूटने के बाद से कोई काम नहीं कर पाते। ऐसे में घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गई। संवाद
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छह महिलाओं के साथ बढ़ाया कारोबार
शांति देवी करीब दो साल पहले समूह से जुड़ीं और इसके बाद फुल्की बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत में मुश्किलें आईं, लेकिन धीरे-धीरे काम आगे बढ़ने लगा। अब गांव की छह महिलाएं उनके साथ इस कारोबार में सहयोग करती हैं। सभी को उनके काम के हिसाब से मेहनताना मिलता है। समूह के माध्यम से तैयार फुल्की को बाजार में ऑर्डर के अनुसार दुकानों तक पहुंचाई जाती हैं।
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मेहनत बनी परिवार का सहारा
शांति देवी के मुताबिक, इस कारोबार से हर महीने करीब 20 से 25 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है। वह कहती हैं कि पति के काम करने में असमर्थ होने के कारण परिवार चलाने की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। फुल्की का कारोबार ही अब उनके परिवार की उम्मीद है। विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी मेहनत और आत्मनिर्भर बनने की कोशिश दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा है।
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शांति देवी बताती हैं कि परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही कमजोर थी। उनकी तीन बेटियां हैं, जिनकी शादी हो चुकी है। बेटा नहीं है और पति ओमप्रकाश उर्फ राजू करीब दो साल पहले सड़क हादसे में पैर टूटने के बाद से कोई काम नहीं कर पाते। ऐसे में घर चलाने की पूरी जिम्मेदारी उन पर आ गई। संवाद
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छह महिलाओं के साथ बढ़ाया कारोबार
शांति देवी करीब दो साल पहले समूह से जुड़ीं और इसके बाद फुल्की बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत में मुश्किलें आईं, लेकिन धीरे-धीरे काम आगे बढ़ने लगा। अब गांव की छह महिलाएं उनके साथ इस कारोबार में सहयोग करती हैं। सभी को उनके काम के हिसाब से मेहनताना मिलता है। समूह के माध्यम से तैयार फुल्की को बाजार में ऑर्डर के अनुसार दुकानों तक पहुंचाई जाती हैं।
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मेहनत बनी परिवार का सहारा
शांति देवी के मुताबिक, इस कारोबार से हर महीने करीब 20 से 25 हजार रुपये की आमदनी हो जाती है। वह कहती हैं कि पति के काम करने में असमर्थ होने के कारण परिवार चलाने की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। फुल्की का कारोबार ही अब उनके परिवार की उम्मीद है। विपरीत परिस्थितियों में भी उनकी मेहनत और आत्मनिर्भर बनने की कोशिश दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा है।

घर में फुल्की बनाती शांति देवी। स्रोत: विभाग