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दोआबा में सूख गए हजारों कुएं
अमर उजाला ब्यूरो, कौशाम्बी
Updated Tue, 07 Mar 2017 11:42 PM IST
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प्राकृतिक जल स्रोतों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। जिले में साढ़े पांच हजार कुएं हैं। इनमें से पांच हजार कुएं सूख चुके हैं। सूखे कुएं गर्मी के दिनों में ग्रामीणों का मुंह चिढ़ाते हैं। जल संरक्षण को लेकर तमाम बैठके हुईं, जागरूकता अभियान चले, लेकिन इन कुओं की सफाई कराकर नया जीवन देने की कोशिश कभी नहीं हुई। कुओं की हालत खस्ताहाल हो चुकी है।
जनपद के पांच हजार कुएं सूख चुके हैं। वर्ष 2009-10 में तत्कालीन डीएम लोकेश एम के कार्यकाल में जल दिवस की बैठक में इसका खुलासा हुआ था। इस बैठक में कुओं को बचाने के लिए तमाम तरह के दावे बोतल बंद पानी पीकर अफसरों ने की थी। बैठक खत्म होने के बाद इन कुओं के अस्तित्व को बचाने की कोई पहल नहीं हुई। हालांकि इसके बाद भी अफसर इन कुओं को बचाने का दावा करते रहे, लेकिन हकीकत यही है कि पांच हजार कुएं सूख चुके हैं।
इनमें एक बूंद पानी नहीं है। बरसात के दिनों में ही इनमें पानी रहता है। बरसात बाद यह कुएं पानी उगलने के बजाय उसे पी जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी बताया जा रहा है कि कुएं इस्तेमाल में नहीं है। यह वाजिब कारण है, लेकिन कई ऐसे गांव हैं, जहां कुएं इस्तेमाल में रहते हैं, लेकिन सूखने के बाद लोगों को पेयजल के लिए दूसरा इंतजाम करना पड़ता है। कुओं की सबसे बदतर स्थिति तराई क्षेत्र में है। किशुनपुर नहर पट्टी क्षेत्र में आने वाले कुएं पानी दे रहे हैं, लेकिन इन पर भी खतरा मंडराने लगा है।
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गंगा व यमुना की तराई में स्थिति खराब
गंगा व यमुना की तराई में कुओं की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। यमुना तराई इलाके के पहड़िया में दो, मेड़रहा में चार, उरई में दो, कनैली में चार, चुन्नी का पूरा में चार, छेकवा में छह, ऐंगवा में चार कुएं समेत आदि गांवों के भी कुएं एकदम सूख चुके हैं। यही हाल गंगा तराई इलाके के गांवों का है। गंगा की तराई में दारानगर व म्योहरा में दस, सिपाह तीन, हब्बू नगर में दो, घोसियाना में दो, तरसौरा में तीन, पूरामुफ्ती व कोखराज आदि इलाकों के कुएं सूख चुके हैं।
ग्राम पंचायतें दे सकती हैं नया जीवन
गांवों में स्थित कुएं इस्तेमाल में दोबारा आ सकते हैं, बशर्ते ग्राम पंचायतों को इसके लिए निधि का इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाए। राज्य व चौदहवें वित्त से इन कुओं में रकम खर्च की जा सकती है, लेकिन अधिकारी हैं कि पक्के कार्यों के अलावा दूसरे अन्य कार्यों के स्टीमेट को खारिज कर देते हैं।
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जनपद के पांच हजार कुएं सूख चुके हैं। वर्ष 2009-10 में तत्कालीन डीएम लोकेश एम के कार्यकाल में जल दिवस की बैठक में इसका खुलासा हुआ था। इस बैठक में कुओं को बचाने के लिए तमाम तरह के दावे बोतल बंद पानी पीकर अफसरों ने की थी। बैठक खत्म होने के बाद इन कुओं के अस्तित्व को बचाने की कोई पहल नहीं हुई। हालांकि इसके बाद भी अफसर इन कुओं को बचाने का दावा करते रहे, लेकिन हकीकत यही है कि पांच हजार कुएं सूख चुके हैं।
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इनमें एक बूंद पानी नहीं है। बरसात के दिनों में ही इनमें पानी रहता है। बरसात बाद यह कुएं पानी उगलने के बजाय उसे पी जाते हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह भी बताया जा रहा है कि कुएं इस्तेमाल में नहीं है। यह वाजिब कारण है, लेकिन कई ऐसे गांव हैं, जहां कुएं इस्तेमाल में रहते हैं, लेकिन सूखने के बाद लोगों को पेयजल के लिए दूसरा इंतजाम करना पड़ता है। कुओं की सबसे बदतर स्थिति तराई क्षेत्र में है। किशुनपुर नहर पट्टी क्षेत्र में आने वाले कुएं पानी दे रहे हैं, लेकिन इन पर भी खतरा मंडराने लगा है।
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गंगा व यमुना की तराई में स्थिति खराब
गंगा व यमुना की तराई में कुओं की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। यमुना तराई इलाके के पहड़िया में दो, मेड़रहा में चार, उरई में दो, कनैली में चार, चुन्नी का पूरा में चार, छेकवा में छह, ऐंगवा में चार कुएं समेत आदि गांवों के भी कुएं एकदम सूख चुके हैं। यही हाल गंगा तराई इलाके के गांवों का है। गंगा की तराई में दारानगर व म्योहरा में दस, सिपाह तीन, हब्बू नगर में दो, घोसियाना में दो, तरसौरा में तीन, पूरामुफ्ती व कोखराज आदि इलाकों के कुएं सूख चुके हैं।
ग्राम पंचायतें दे सकती हैं नया जीवन
गांवों में स्थित कुएं इस्तेमाल में दोबारा आ सकते हैं, बशर्ते ग्राम पंचायतों को इसके लिए निधि का इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाए। राज्य व चौदहवें वित्त से इन कुओं में रकम खर्च की जा सकती है, लेकिन अधिकारी हैं कि पक्के कार्यों के अलावा दूसरे अन्य कार्यों के स्टीमेट को खारिज कर देते हैं।