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जर्जर हो गए करोड़ों के मिनी सचिवालय
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Sat, 15 Oct 2016 12:13 AM IST
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जिले में बने करोड़ों रुपये की लागत से मिनी सचिवालय जर्जर हो गए हैं। कई गांवों में इनका केवल ढांचा बना है। देखरेख के अभाव में ग्रामीण इन सचिवालयों का खिड़की और दरवाजा भी उखाड़ ले गए हैं। इससे जिस मकसद से इनका निर्माण कराया गया था, वह पूरा न हो सका।
पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि योजना (बीआरजीएफ) के तहत जिले में मिनी सचिवालय बनाए गए थे। इनमें दरियापुर, तरना, जरैनी, बिगहरा उस्मानपुर, मोहम्मदपुर, जलालपुर भर्ती, चकपिनहा, मकदूमपुर, रेही, जवई, शेरगढ़, बरेठी, आमदपुर गांव शामिल हैं। जरैनी में मिनी सचिवालय गांव से काफी दूर बनाया गया था। जिसका परिणाम यह रहा कि गांव के लोग खिड़की, दरवाजा के साथ ही यहां की ईट तक उठा ले गए। अब यहां केवल मिनी सचिवालय का ढांचा बचा है।
यह स्थिति तब हुई जब इन्हें ग्राम पंचायतों के हवाले कर दिया गया। ग्राम प्रधान इनकी देखरेख नहीं कर पा रहे हैं। इस सचिवालय को बनवाने के पीछे सरकार की मंशा थी कि गांव के सभी कार्य यहां से हों। इसके अलावा बैठक आदि भी यहां कराई जाए। ग्राम पंचायत से संचालित योजनाओं का ब्यौरा यहीं रखा जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ग्राम प्रधानों की लापरवाही की भेंट ये सचिवालय चढ़ गए। एक मिनी सचिवालय 14 लाख रुपये की लागत से बनवाया गया था।
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गुणवत्ता पर भी उठते रहे सवाल
जनपद में बने मिनी सचिवालय की गुणवत्ता को लेकर सवाल हमेशा उठते रहे हैं। ग्रामीणों ने इसकी शिकायत भी की थी। इसकी जांच के लिए टीएसी टीम भी गठित हुई थी। जांच में तमाम खामियां भी उजागर हुई थीं। इसके बाद भी बिना कमियों को दूर कराए अधिकारियों ने मनमाने तरीके से इन सचिवालयों को ग्राम पंचायतों को हैंडओवर कर दिया, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
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पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि योजना (बीआरजीएफ) के तहत जिले में मिनी सचिवालय बनाए गए थे। इनमें दरियापुर, तरना, जरैनी, बिगहरा उस्मानपुर, मोहम्मदपुर, जलालपुर भर्ती, चकपिनहा, मकदूमपुर, रेही, जवई, शेरगढ़, बरेठी, आमदपुर गांव शामिल हैं। जरैनी में मिनी सचिवालय गांव से काफी दूर बनाया गया था। जिसका परिणाम यह रहा कि गांव के लोग खिड़की, दरवाजा के साथ ही यहां की ईट तक उठा ले गए। अब यहां केवल मिनी सचिवालय का ढांचा बचा है।
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यह स्थिति तब हुई जब इन्हें ग्राम पंचायतों के हवाले कर दिया गया। ग्राम प्रधान इनकी देखरेख नहीं कर पा रहे हैं। इस सचिवालय को बनवाने के पीछे सरकार की मंशा थी कि गांव के सभी कार्य यहां से हों। इसके अलावा बैठक आदि भी यहां कराई जाए। ग्राम पंचायत से संचालित योजनाओं का ब्यौरा यहीं रखा जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ग्राम प्रधानों की लापरवाही की भेंट ये सचिवालय चढ़ गए। एक मिनी सचिवालय 14 लाख रुपये की लागत से बनवाया गया था।
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गुणवत्ता पर भी उठते रहे सवाल
जनपद में बने मिनी सचिवालय की गुणवत्ता को लेकर सवाल हमेशा उठते रहे हैं। ग्रामीणों ने इसकी शिकायत भी की थी। इसकी जांच के लिए टीएसी टीम भी गठित हुई थी। जांच में तमाम खामियां भी उजागर हुई थीं। इसके बाद भी बिना कमियों को दूर कराए अधिकारियों ने मनमाने तरीके से इन सचिवालयों को ग्राम पंचायतों को हैंडओवर कर दिया, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।