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कभी नहीं हुई फसलों की ऐसी बर्बादी
ब्यूरो/अमर उजाला कौशाम्बी
Updated Fri, 10 Apr 2015 12:28 AM IST
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मंझनपुर/चरवा। कौशाम्बी की चायल तहसील के चरवा गांव का किसान है संतोष भारतीय। उसके पास नाममात्र की जमीन है। गांव के ही एक काश्तकार का चार बीघा खेत बंटाई पर लेकर वह कई बरस से खेती कर रहा है। यही उसकी जीविका का साधन है। इस साल भी उसने पूरे चार बीघे में गेहूं की खेती की थी। खेती में करीब 28 हजार रुपये खर्च हुआ था। उम्मीद थी कि इन चार बीघे खेत में कम से कम 48 कुंतल गेहूं पैदा होगा। पर, मड़ाई करने पर सिर्फ छह कुंतल पैदावार हुई। यह देख वह सदमे में है। उसे समझ में नहीं आ रहा है कि पत्नी-बच्चों के निवाले का इंतजाम कहां से करे। काश्तकार को बंटाई का 16 हजार और खाद, बीज, जुताई, सिंचाई का पैसा कहां से चुकता करे।
मार्च महीने में कुदरत के कहर से बर्बाद हुए संतोष अकेले नहीं हैं। चरवा के संतोष भारतीय जैसी ही बर्बादी गांव के राम नारायण, विशाल, देशराज, कमलेश प्रजापति, राजेंद्र कुमार, राजेंद्र दूबे, नरेश रैदास, राकेश भारतीय, रायभान का पुरा गांव के अनूप, अशोक पांडेय, काजू गांव के फूलचंद्र, उमेश आदि की भी है। बेमौसम की भीषण बारिश और ओलों की मार से सभी के खेतों में लहलहाती फसलें जमींदोज हो गई।
गिरी गेहूं की फसलों की बाल में दाने ही नहीं है। संतोष, लल्ला आदि ने बताया कि फसलें गिरने के बाद भी उन्हें उम्मीद थी कि आधी पैदावार ही मारी गई है। पर, जब शुक्रवार की सुबह उन लोगों ने खेतों में गिरी फसलों को समेटकर उसकी मड़ाई कराई, तो उपज देख उनके होश उड़ गए। संतोष ने बताया कि पिछली साल भी उसने गांव के काश्तकार से बटाई पर लेकर चार बीघा खेत में गेहूं की बुआई की थी। बताया कि पिछले साल प्रति बीघा 12 कुंतल की पैदावार हुई थी। लगा था कि सालभर के निवाले का इंतजाम के अलावा वह करीब 50 हजार रुपये का गेहूं बेच लेगा। इससे काश्तकार को खेत की बटाई का 16 हजार रुपये दे देगा। साथ ही जुताई, सिंचाई, खाद का पैसा चुकता करने के बाद भी उसके पास कुछ पैसे बच जाएंगे।
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कौशाम्बी के रायभान का पुरा (चरवा) गांव निवासी अशोक पांडेय बड़े काश्तकार हैं। उन्होंने इस बार 30 बीघे में गेहूं की खेती की थी। बुधवार की रात उन्होंने फसल की मड़ाई करवाई। बताया कि दाना नहीं सिर्फ भूसा ही भूसा निकला है। जो दाने निकले भी हैं। वे इतने पतले, कमजोर हैं। जिसके पैदावार होना न होना बराबर है। उनका कहना है कि बेमौसम की बारिश ने उन्हें पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। इस बर्बादी की भरपाई होने में कई साल लगेंगे।
मौसम की मार से पहले आलू, फिर गेहूं की फसल गंवाने वाले किसानों को अब निवाले के इंतजाम के लिए ही भटकना होगा। चरवा के देशराज प्रजापति ने बताया कि उसके पास दो बीघा खेत है। इसमें बोई गई गेहूं की फसल बेमौसम की बारिश में गिरकर बर्बाद हो चुकी है। इतनी भी उपज नहीं हुई है, जिससे 2-4 महीने की रोटी का इंतजाम हो सके। बताया कि मई में उसके बेटे की शादी है। इसकी खुशियां मौसम की मार में मिट चुकी है। दिन-रात एक ही चिंता है कि बच्चों के निवाले की व्यवस्था कैसे होगी। बता दें कि देशराज खेती से सालभर के निवाले का इंतजाम कर लेता था। साथ ही मिट्टी का बर्तन बनाकर तेल, साबुन की व्यवस्था हो जाती थी।
कौशाम्बी में रबी के सीजन में ज्यादातर किसान गेहूं और आलू की ही खेती करते हैं। सिराथू तहसील के दरियापुर जीता गांव के किसान पंचमलाल, फूलचंद्र, गुरु प्रसाद, गोविंदपुर गांव के मिर्रा, भागू का पुरा गांव के जगरूप, ताज मल्लाहन गांव के उत्तम, चायल तहसील के रायभान का पुरा गांव के अशोक पांडेय आदि किसान फसलें बर्बाद होने से साधन सहकारी समिति से उधार ली गई खाद और केसीसी के ऋण की अदायगी को लेकर परेशान हैं। अशोक ने बताया कि उसने केसीसी से 5 लाख रुपये का ऋण खेती के लिए लिया था। इसी तरह से दरियापुर के पंचम के नाम 90 हजार का केसीसी ऋण और और चरवा के राजेंद्र के नाम एक लाख का केसीसी ऋण है।
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मार्च महीने में कुदरत के कहर से बर्बाद हुए संतोष अकेले नहीं हैं। चरवा के संतोष भारतीय जैसी ही बर्बादी गांव के राम नारायण, विशाल, देशराज, कमलेश प्रजापति, राजेंद्र कुमार, राजेंद्र दूबे, नरेश रैदास, राकेश भारतीय, रायभान का पुरा गांव के अनूप, अशोक पांडेय, काजू गांव के फूलचंद्र, उमेश आदि की भी है। बेमौसम की भीषण बारिश और ओलों की मार से सभी के खेतों में लहलहाती फसलें जमींदोज हो गई।
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गिरी गेहूं की फसलों की बाल में दाने ही नहीं है। संतोष, लल्ला आदि ने बताया कि फसलें गिरने के बाद भी उन्हें उम्मीद थी कि आधी पैदावार ही मारी गई है। पर, जब शुक्रवार की सुबह उन लोगों ने खेतों में गिरी फसलों को समेटकर उसकी मड़ाई कराई, तो उपज देख उनके होश उड़ गए। संतोष ने बताया कि पिछली साल भी उसने गांव के काश्तकार से बटाई पर लेकर चार बीघा खेत में गेहूं की बुआई की थी। बताया कि पिछले साल प्रति बीघा 12 कुंतल की पैदावार हुई थी। लगा था कि सालभर के निवाले का इंतजाम के अलावा वह करीब 50 हजार रुपये का गेहूं बेच लेगा। इससे काश्तकार को खेत की बटाई का 16 हजार रुपये दे देगा। साथ ही जुताई, सिंचाई, खाद का पैसा चुकता करने के बाद भी उसके पास कुछ पैसे बच जाएंगे।
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कौशाम्बी के रायभान का पुरा (चरवा) गांव निवासी अशोक पांडेय बड़े काश्तकार हैं। उन्होंने इस बार 30 बीघे में गेहूं की खेती की थी। बुधवार की रात उन्होंने फसल की मड़ाई करवाई। बताया कि दाना नहीं सिर्फ भूसा ही भूसा निकला है। जो दाने निकले भी हैं। वे इतने पतले, कमजोर हैं। जिसके पैदावार होना न होना बराबर है। उनका कहना है कि बेमौसम की बारिश ने उन्हें पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। इस बर्बादी की भरपाई होने में कई साल लगेंगे।
मौसम की मार से पहले आलू, फिर गेहूं की फसल गंवाने वाले किसानों को अब निवाले के इंतजाम के लिए ही भटकना होगा। चरवा के देशराज प्रजापति ने बताया कि उसके पास दो बीघा खेत है। इसमें बोई गई गेहूं की फसल बेमौसम की बारिश में गिरकर बर्बाद हो चुकी है। इतनी भी उपज नहीं हुई है, जिससे 2-4 महीने की रोटी का इंतजाम हो सके। बताया कि मई में उसके बेटे की शादी है। इसकी खुशियां मौसम की मार में मिट चुकी है। दिन-रात एक ही चिंता है कि बच्चों के निवाले की व्यवस्था कैसे होगी। बता दें कि देशराज खेती से सालभर के निवाले का इंतजाम कर लेता था। साथ ही मिट्टी का बर्तन बनाकर तेल, साबुन की व्यवस्था हो जाती थी।
कौशाम्बी में रबी के सीजन में ज्यादातर किसान गेहूं और आलू की ही खेती करते हैं। सिराथू तहसील के दरियापुर जीता गांव के किसान पंचमलाल, फूलचंद्र, गुरु प्रसाद, गोविंदपुर गांव के मिर्रा, भागू का पुरा गांव के जगरूप, ताज मल्लाहन गांव के उत्तम, चायल तहसील के रायभान का पुरा गांव के अशोक पांडेय आदि किसान फसलें बर्बाद होने से साधन सहकारी समिति से उधार ली गई खाद और केसीसी के ऋण की अदायगी को लेकर परेशान हैं। अशोक ने बताया कि उसने केसीसी से 5 लाख रुपये का ऋण खेती के लिए लिया था। इसी तरह से दरियापुर के पंचम के नाम 90 हजार का केसीसी ऋण और और चरवा के राजेंद्र के नाम एक लाख का केसीसी ऋण है।