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Kaushambi News: श्रीअन्न...अभियान तो चलाया...परिणाम कम आया
Tue, 06 Jan 2026 12:57 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Tue, 06 Jan 2026 12:57 AM IST
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संजय सिंह, कनैली
मंझनपुर। कृषि विभाग ने श्रीअन्न (मोटे अनाज) के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान तो चलाया लेकिन अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सका। ज्वार, बाजरा, रागी, मडुवा, सावां, कोदो, कुटकी जैसी फसलों के लिए प्रोत्साहित किया। लेकिन किसान ज्वार, बाजरा तक सीमित रहे।
कृषि विभाग ने कोविड के बाद वर्ष 2021 से मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए किसान गोष्ठियों, गांवों में चौपाल, कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि भवन, डायट मैदान और सभी ब्लॉक में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए। किसानों को रागी और सावां के करीब 300-300 बैग बीज वितरित किए गए। लेकिन किसानों ने मोटे अनाज में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। उनका कहना है कि फसल सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं दिखी।
यह कहना गलत है कि हमारे प्रयास का असर नहीं हुआ। लोगों ने इसका उत्पादन किया है। लेकिन बेहद कम रहा। यहां ज्वार व बाजरे को लेकर किसान ज्यादा उत्सुक रहते हैं। जो फसल एक बार चलन से बाहर हो जाती है। उसको दोबारा लगाने में समय लगता है। -सत्येंद्र तिवारी, डीडी कृषि
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बीज तो मिला लेकिन फसल सुरक्षा का कोई ठोस इंतजाम नहीं था। मवेशी और नीलगाय रातों-रात फसल साफ कर देते हैं। नुकसान का डर रहता है इसलिए सावां या कोदो लगाने की हिम्मत नहीं हुई। - अरविंद बलुआ, ढोकसहा
बाजरा इसलिए बोया क्योंकि उसका बाजार और अनुभव दोनों हैं। बाकी मोटे अनाजों में भरोसा नहीं बन पाया। न तो खरीद की गारंटी दिखी, न नुकसान की भरपाई का विकल्प दिखा। बाजारे में फसल नहीं हुई तो भी मवेशी के लिए चारा जरूर होगा। - संजय सिंह, कनैली
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कृषि विभाग ने कोविड के बाद वर्ष 2021 से मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए किसान गोष्ठियों, गांवों में चौपाल, कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि भवन, डायट मैदान और सभी ब्लॉक में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए। किसानों को रागी और सावां के करीब 300-300 बैग बीज वितरित किए गए। लेकिन किसानों ने मोटे अनाज में बहुत कम दिलचस्पी दिखाई। उनका कहना है कि फसल सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं दिखी।
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यह कहना गलत है कि हमारे प्रयास का असर नहीं हुआ। लोगों ने इसका उत्पादन किया है। लेकिन बेहद कम रहा। यहां ज्वार व बाजरे को लेकर किसान ज्यादा उत्सुक रहते हैं। जो फसल एक बार चलन से बाहर हो जाती है। उसको दोबारा लगाने में समय लगता है। -सत्येंद्र तिवारी, डीडी कृषि
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बीज तो मिला लेकिन फसल सुरक्षा का कोई ठोस इंतजाम नहीं था। मवेशी और नीलगाय रातों-रात फसल साफ कर देते हैं। नुकसान का डर रहता है इसलिए सावां या कोदो लगाने की हिम्मत नहीं हुई। - अरविंद बलुआ, ढोकसहा
बाजरा इसलिए बोया क्योंकि उसका बाजार और अनुभव दोनों हैं। बाकी मोटे अनाजों में भरोसा नहीं बन पाया। न तो खरीद की गारंटी दिखी, न नुकसान की भरपाई का विकल्प दिखा। बाजारे में फसल नहीं हुई तो भी मवेशी के लिए चारा जरूर होगा। - संजय सिंह, कनैली

संजय सिंह, कनैली