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18 साल बाद भी नहीं मिल सकी चिकित्सकीय सुविधा

अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी Updated Fri, 24 Jun 2016 12:00 AM IST
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कभी इलाहाबाद का हिस्सा रहा कौशाम्बी अब अलग जिला बन चुका है। जनपद सृजित हुए 18 साल बीत चुके हैं। पर, अब भी यहां के लोग बिजली, पीने के पानी, स्वास्थ्य, परिवहन, अच्छी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं पर ही गौर करें, तो जिले की लगभग 17 लाख की आबादी को सस्ता-सुलभ इलाज मुहैया कराने को जिला संयुक्त अस्पताल समेत 30 से ज्यादा सरकारी अस्पताल खुले हैं, लेकिन इन अस्पतालों में दवा-डॉक्टर दोनों का टोटा बना है। ऐसे में अब भी यहां के लोगों को इलाज के लिए इलाहाबाद जाने की मजबूरी झेलनी पड़ रही है।

 कौशाम्बी को अप्रैल 1997 में जिला का दर्जा दिया गया था। 498 ग्रामसभाओं वाले इस जिले में रहने वाले लगभग 17 लाख लोगों को लगा था कि अलग जिला बनने से अब उन्हें बुनियादी सुविधाएं प्राप्त होंगी। लेकिन 18 साल बाद भी जिले की सूरत नहीं बदली है। स्वास्थ्य सुविधाओं पर ही नजर डालें, तो इन 18 सालों में जिला संयुक्त अस्पताल के अलावा कई सीएचसी, पीएचसी की स्थापना की गई। पर, इन अस्पतालों में डॉक्टर, दवा जैसी सुविधाएं नदारत हैं। 9 करोड़ रुपये की लागत से बने जिला संयुक्त अस्पताल में ही देखें तो हृदय रोग, नाक, कान, गला, चर्मरोग आदि के विशेषज्ञ चिकित्सक के साथ ही महिला चिकित्सक और बेहोशी के डाक्टर भी नहीं हैं।

वहीं पैथालाजिस्ट, एक्स-रे टेक्निशियन के अलावा जिला संयुक्त अस्पताल में नर्सों का भी टोटा बना हुआ है। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक के मुताबिक जिला अस्पताल में 27 डाक्टरों के स्थान पर सिर्फ 22 चिकित्सकों की तैनाती है। वहीं 36 में सिर्फ 6 नर्स हैं। इससे मरीजों के इलाज, उनकी देखभाल में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह से जिले की 3 सीएचसी, 7 पीएचसी और 29 न्यू पीएचसी में भी डॉक्टर और अन्य स्टाफ की कमी है। वहीं गांव में बने अस्पतालों में जो डाक्टर तैनात भी हैं, वे ड्यूटी से ही गायब रहते हैं।  

 जिला मुख्यालय से महज 8 किलोमीटर दूर स्थित टेंवा बाजार में करीब 5 साल पहले न्यू पीएचसी की स्थापना हुई थी। इस अस्पताल में सालो  से कोई डाक्टर ड्यूटी पर नहीं आ रहा है। आलम यह है कि स्थानीय लोग यह तक नहीं जानते हैं कि इस अस्पताल में डाक्टर कौन है? गांववालों के मुताबिक अस्पताल फार्मेसिस्ट और वार्ड ब्वाय के सहारे चलाया जा रहा है। न्यू पीएचसी ने सफाईकर्मी नहीं होने से भी दिक्कत है। मामले में सीएमओ यूबी सिंह का कहना है कि डा. सुमित त्रिपाठी अक्सर गैरहाजिर रहते थे, इसी से उन्हें वहां से हटाया गया है। उनके बाद डा. राजकमल की तैनाती की गई है। यदि वे ड्यूटी पर नहीं जाते हैं, तो जांच कराकर उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।   

 जनपद की सरकारी अस्पतालों में प्रतिवर्ष दवाओं के नाम पर करोड़ों का वारा-न्यारा होता है। अकेले जिला अस्पताल में ही दवाओं का सालाना बजट करीब 40 लाख रुपये का है। इसके बाद भी जिला संयुक्त अस्पताल समेत सभी सीएचसी, पीएचसी में जरूरी दवाओं की किल्लत बनी रहती है। सीएचसी कड़ा और पीएचसी मूरतगंज में तो तकरीबन महीनेभर से पैरासिटामाल, सेप्ट्रान, मेट्रोजील, ओआरएस जैसी दवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। इससे मरीजों अथवा उनके तीमारदारों को बुखार, जुकाम, खांसी, पेटदर्द की भी दवा बाजारों से खरीदनी पड़ रही है।

अस्पतालों में डाक्टरों के समय से ड्यूटी पर आने का निर्देश दिया गया है। ड्यूटी से गायब रहने वाले चिकित्सकों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। अस्पतालों में दवाओं की कमी चिकित्सा प्रभारियों द्वारा मांगपत्र भेजने में देरी से होती है। जहां से भी मांगपत्र आ रहा है, दवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।
डा. यूबी सिंह, सीएमओ कौशाम्बी
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