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दोआबा में भी दो जगह पड़े थे भगवान श्री कृष्ण के चरण

Mon, 30 Aug 2021 03:57 PM IST
इलाहाबाद ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, कौशांबी
अमर उजाला नेटवर्क, कौशांबी Published by: इलाहाबाद ब्यूरो Updated Mon, 30 Aug 2021 03:57 PM IST
सार

बांके बिहारी का जिक्र होते ही मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल से लेकर द्वारका तक का नाम आ जाता है। पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक कन्हैया का बड़ा नजदीक रिश्ता दोआबा से भी रहा। सबसे पहली बात श्री कृष्ण की शिक्षा दीक्षा की।

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Lord Krishna's feet were lying in two places in Doaba too.
Lord Krishna's feet were lying in two places in Doaba too. - फोटो : KAUSHAMBI

विस्तार

बांके बिहारी भगवान श्रीकृष्ण के पवित्र कदम गंगा-यमुना के बीच बसे दोआबा में भी पडे़ थे। श्रीकृष्ण से जुड़े दोआबा के दो स्थलों का जिक्र पौराणिक ग्रंथों में मिलता है। जैन संप्रदाय के लोग श्रीकृष्ण को अपना तीर्थंकर मानते हैं। उनका यह भी मानना है कि श्रीकृष्ण अपने जीवन काल के अंतिम दिनों में कौशाम्बी में ही रहे और यहीं एक बहेलिया के तीर का शिकार होकर गोलोकवासी हो गए थे। कौशाम्बी के एक मंदिर में मौजूद पद चिन्हों को बांके बिहारी का मान कर जैनी पूरी आस्था के साथ पूजा करते हैं। श्रीकृष्ण के गुरु संदीपन का आश्रम भी गंगा किनारे कोखराज के पास है। कहा जाता है कि शिक्षा लेने के लिए श्रीकृष्ण बचपन में संदीपन आश्रम आए थे। सोमवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है।
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बांके बिहारी का जिक्र होते ही मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल से लेकर द्वारका तक का नाम आ जाता है। पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक कन्हैया का बड़ा नजदीक रिश्ता दोआबा से भी रहा। सबसे पहली बात श्री कृष्ण की शिक्षा दीक्षा की। पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक कन्हैया को बचपन में ऋषि संदीपन ने शिक्षा दीक्षा दी थी। ऋषि संदीपन का आश्रम जीटी रोड से दो किलोमीटर उत्तर गंगा के सुरम्य किनारे कोखराज के पास है। इसे संदीपन आश्रम के नाम से जाना जाता है। ऋषि के नाम से ही गंगा तट को संदीपन घाट का नाम मिला है। कहते हैं इसी आश्रम में ऋषि संदीपन पूरे आर्यावर्त के छात्रों को शिक्षा-दीक्षा देते थे। ग्रंथों में बताया गया कि बचपन में कन्हैया ने इसी आश्रम में बाल गोपालों के साथ शिक्षा दीक्षा ग्रहण की थी।
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संदीपन घाट पर अभी भी संत महात्मा आकर कन्हैया व ऋषि संदीपन को याद करते हैं। श्रीकृष्ण की दूसरी याद यमुना किनारे से जुड़ी है। यमुना किनारे ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल में श्रीकृष्ण का एक मंदिर है। जैन संप्रदाय के लोग श्रीकृष्ण को अपना तीर्थंकर मानते हैं। उनका मानना है कि जीवन के अंतिम दिनों में श्रीकृष्ण कौशाम्बी आए थे। उन्होंने काफी समय इस पवित्र भूमि पर गुजारा। जैनियों में मान्यता है कि श्रीकृष्ण कौशाम्बी में ही एक बहेलिया के तीर का शिकार होकर गोलोकवासी हुए। उनके जीवन के अंतिम दिनों का गवाह यमुना किनारे का एक मंदिर है। इसमे उभरे पदचिन्ह को श्रीकृष्ण का मानकर पूरी आस्था से पूजन करते हैं।
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